श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 3: ब्रह्मादिकी आयु और कालका स्वरूप  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.3.2 
श्रीपराशर उवाच
शक्तय: सर्वभावानामचिन्त्यज्ञानगोचरा:।
यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्या भावशक्तय:।
भवन्ति तपतां श्रेष्ठ पावकस्य यथोष्णता॥ २॥
 
 
अनुवाद
श्री पराशरजी बोले - हे तपस्वियों में श्रेष्ठ मैत्रेय! समस्त भाव-विषयों की शक्तियाँ अचिन्त्य ज्ञान का विषय हैं; [उनमें कोई युक्ति काम नहीं करती] अतः अग्नि और ताप की शक्ति के समान सनातन सृष्टिरूपी ब्रह्म की शक्तियाँ भी स्वाभाविक हैं॥2॥
 
Shri Parasharji said – O Maitreya, the best among ascetics! The powers of all emotional objects are the subject of unthinkable knowledge; [No trick works in them] Therefore, like the power of fire and heat, the powers of Brahma in the form of eternal creation are also natural. 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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