श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 20: प्रह्लादकृत भगवत्-स्तुति और भगवान‍्का आविर्भाव  »  श्लोक 33-34
 
 
श्लोक  1.20.33-34 
ततो राज्यद्युतिं प्राप्य कर्मशुद्धिकरीं द्विज।
पुत्रपौत्रांश्च सुबहूनवाप्यैश्वर्यमेव च॥ ३३॥
क्षीणाधिकार: स यदा पुण्यपापविवर्जित:।
तदा स भगवद्धॺानात्परं निर्वाणमाप्तवान‍्॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
हे द्विज! फिर प्रारब्धक्षयकारिणी राज्यलक्ष्मी, अनेक पुत्र-पौत्रादि और परम ऐश्वर्य को प्राप्त करके, कर्मों का अधिकार क्षीण हो जाने पर पुण्य और पाप से रहित हुए प्रभु का ध्यान करके परम निर्वाण को प्राप्त हुआ॥33-34॥
 
Hey Dwija! Then, after getting Prarabdhakshaykarini Rajya Lakshmi, many sons and grandchildren and supreme opulence, he attained supreme Nirvana by meditating on the Lord who became free from virtues and sins when the rights of karma diminished. 33-34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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