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श्लोक 1.20.26  |
प्रह्लाद उवाच
कृतकृत्योऽस्मि भगवन्वरेणानेन यत्त्वयि।
भवित्री त्वत्प्रसादेन भक्तिरव्यभिचारिणी॥ २६॥ |
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| अनुवाद |
| प्रह्लाद ने कहा, 'हे प्रभु! मैं आपके इस वरदान से कृतज्ञ हूँ कि आपकी कृपा से मुझमें आपके प्रति अटूट भक्ति हो जाएगी।' |
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| Prahlada said, 'O Lord! I am grateful for this boon of yours that by your grace I will have unwavering devotion towards you.' |
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