श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 20: प्रह्लादकृत भगवत्-स्तुति और भगवान‍्का आविर्भाव  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  1.20.1 
श्रीपराशर उवाच
एवं सञ्चिन्तयन्विष्णुमभेदेनात्मनो द्विज।
तन्मयत्वमवाप्याग्रॺं मेने चात्मानमच्युतम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
श्री पराशरजी बोले - हे द्विज! इस प्रकार जब भगवान विष्णु आत्मचिंतन में पूर्णतया लीन हो गए, तब उन्होंने स्वयं को अच्युत रूप में अनुभव किया॥1॥
 
Shri Parasharji said – O Dwij! In this way, when Lord Vishnu became completely absorbed in thinking about himself, he experienced himself as the Achyuta Form. 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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