| श्री विष्णु पुराण » अंश 1: प्रथम अंश » अध्याय 2: चौबीस तत्त्वोंके विचारके साथ जगत्के उत्पत्तिक्रमका वर्णन और विष्णुकी महिमा » श्लोक 68-69 |
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| | | | श्लोक 1.2.68-69  | पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाश एव च।
सर्वेन्द्रियान्त:करणं पुरुषाख्यं हि यज्जगत्॥ ६८॥
स एव सर्वभूतात्मा विश्वरूपो यतोऽव्यय:।
सर्गादिकं तु तस्यैव भूतस्थमुपकारकम्॥ ६९॥ | | | | | | अनुवाद | | पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश आदि सम्पूर्ण जगत् तथा सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और अन्तःकरण आदि पुरुषस्वरूप हैं और क्योंकि वे अभिन्न विष्णु ही विश्वरूप हैं और समस्त प्राणियों के अन्तर्यामी हैं, अतः ब्रह्मा आदि जीवों में स्थित सर्गादिक भी उनके हितकारी हैं। [अर्थात् जिस प्रकार ऋत्विजों द्वारा किया गया हवन यजमान के लिए हितकारी होता है, उसी प्रकार भगवान् द्वारा रचित समस्त प्राणियों द्वारा की गई सृष्टि भी उनके लिए हितकारी होती है]॥68-69॥ | | | | The whole universe like earth, water, light, air and sky and all the senses and conscience etc. is in the form of Purusha and because that inseparable Vishnu is the universal form and the inner soul of all the beings, hence the Sargadik present in the living beings like Brahma are also his benefactors. [That is, just as the Havan performed by the Ritvijas is beneficial to the host, in the same way the creation done by all the creatures created by God is also beneficial to them]॥ 68-69॥ | | ✨ ai-generated | | |
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