श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 2: चौबीस तत्त्वोंके विचारके साथ जगत‍्के उत्पत्तिक्रमका वर्णन और विष्णुकी महिमा  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  1.2.38 
शब्दमात्रं तथाकाशं भूतादि: स समावृणोत्।
आकाशस्तु विकुर्वाण: स्पर्शमात्रं ससर्ज ह॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
वह भूतमय तामसिक अहंकार शब्द और विचाररूपी आकाश में व्याप्त हो गया। फिर [शब्द-तन्मात्रा के रूप में] आकाश विकृत हो गया और स्पर्श-तन्मात्रा उत्पन्न हुई ॥38॥
 
That ghostly, tamasic ego pervaded the sky in the form of words and thoughts. Then [in the form of word-tanmatra] the sky got distorted and created touch-tanmatra. 38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)