श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 2: चौबीस तत्त्वोंके विचारके साथ जगत‍्के उत्पत्तिक्रमका वर्णन और विष्णुकी महिमा  »  श्लोक 34-36
 
 
श्लोक  1.2.34-36 
प्रधानतत्त्वमुद्भूतं महान्तं तत्समावृणोत्।
सात्त्विको राजसश्चैव तामसश्च त्रिधा महान्॥ ३४॥
प्रधानतत्त्वेन समं त्वचा बीजमिवावृतम्।
वैकारिकस्तैजसश्च भूतादिश्चैव तामस:॥ ३५॥
त्रिविधोऽयमहङ्कारो महत्तत्त्वादजायत।
भूतेन्द्रियाणां हेतुस्स त्रिगुणत्वान‍्महामुने।
यथा प्रधानेन महान्महता स तथावृत:॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
जो महान् उत्पन्न हुआ था, वह मूलतत्त्व से आवृत था; महत्त्व सात्त्विक, राजस और तामस, तीन प्रकार का है। परंतु जैसे बीज अपने छिलके द्वारा समता से आवृत रहता है, वैसे ही यह त्रिगुण महत्त्व प्रधानतत्त्व द्वारा सर्वत्र व्याप्त है। फिर उस त्रिगुण महत्त्व से वैकारिक (सात्त्विक), तैजस (राजस) और तामसिक भूत आदि तीन प्रकार के अहंकार उत्पन्न हुए। हे महामुनि! त्रिगुण होने से यह भूत और इन्द्रियों आदि का कारण है और जिस प्रकार महत्त्व प्रधान से व्याप्त है, उसी प्रकार यह (अहंकार) भी महत्त्व से व्याप्त है। 34-36॥
 
The great one who was born was covered by the principle principle; Mahatattva is of three types namely Sattvik, Rajas and Tamas. But just as a seed is covered with equanimity by its peel, in the same way this triple significance is spread everywhere by the Pradhan-tattva. Then, from the triple Mahatattva, three types of egos like Vaikarik (Sattvik), Taijas (Rajas) and Tamasic Bhoota etc. were born. Oh great sage! Being triple, it is the cause of ghost and senses etc. and just as Mahatattva is pervaded by Pradhan, similarly he (ego) is pervaded by Mahattattva. 34-36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)