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vishnu 1.2.31: हे ब्रह्मन्! भगवान् ही उन्हें उद्वेलित करते हैं, वे ही उद्वेलित होते हैं और वे ही संकुचन (संतुलन) और विस्तार (उत्तेजित) अवस्था में स्थित रहते हैं ॥31॥   |   vishnu अध्याय 1.2: चौबीस तत्त्वोंके विचारके साथ जगत‍्के उत्पत्तिक्रमका वर्णन और विष्णुकी महिमा   ।   vishnu अंश 1: प्रथम अंश   ।   श्री विष्णु पुराण Sri Vishnu Puran | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 2: चौबीस तत्त्वोंके विचारके साथ जगत‍्के उत्पत्तिक्रमका वर्णन और विष्णुकी महिमा  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  1.2.31 
स एव क्षोभको ब्रह्मन् क्षोभ्यश्च पुरुषोत्तम:।
स सङ्कोचविकासाभ्यां प्रधानत्वेऽपि च स्थित:॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मन्! भगवान् ही उन्हें उद्वेलित करते हैं, वे ही उद्वेलित होते हैं और वे ही संकुचन (संतुलन) और विस्तार (उत्तेजित) अवस्था में स्थित रहते हैं ॥31॥
 
O Brahman! It is the Supreme Personality of Godhead who agitates them, it is He who gets agitated, and it is He who is present in the state of contraction (equilibrium) and expansion (agitated). ॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)