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vishnu 1.2.10-13: ‘जो (प्रकृति से) परे है - परम, परब्रह्म, आत्मा में स्थित परमेश्वर, जो रूप, रंग, नाम और विशेषण आदि से रहित है; जिसमें जन्म, वृद्धि, परिणाम, क्षय और नाश इन छह विकारों का सर्वथा अभाव है; जिसे हम सदैव ‘है’ ही कह सकते हैं, और जिसके लिए प्रसिद्ध है कि ‘वह सर्वत्र है और सम्पूर्ण जगत् उसी में निवास करता है - इसीलिए विद्वान् लोग उसे वासुदेव कहते हैं’, वह नित्य, अजन्मा, अक्षय, अपरिवर्तनशील, एकरस और निकृष्ट गुणों के अभाव से शुद्ध है ॥10-13॥   |   vishnu अध्याय 1.2: चौबीस तत्त्वोंके विचारके साथ जगत‍्के उत्पत्तिक्रमका वर्णन और विष्णुकी महिमा   ।   vishnu अंश 1: प्रथम अंश   ।   श्री विष्णु पुराण Sri Vishnu Puran | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 2: चौबीस तत्त्वोंके विचारके साथ जगत‍्के उत्पत्तिक्रमका वर्णन और विष्णुकी महिमा  »  श्लोक 10-13
 
 
श्लोक  1.2.10-13 
पर: पराणां परम: परमात्मात्मसंस्थित:।
रूपवर्णादिनिर्देशविशेषणविवर्जित:॥ १०॥
अपक्षयविनाशाभ्यां परिणामर्धिजन्मभि:।
वर्जित: शक्यते वक्तुं य: सदास्तीति केवलम्॥ ११॥
सर्वत्रासौ समस्तं च वसत्यत्रेति वै यत:।
तत: स वासुदेवेति विद्वद्भि: परिपठ्यते॥ १२॥
तद‍्ब्रह्म परमं नित्यमजमक्षयमव्ययम्।
एकस्वरूपं तु सदा हेयाभावाच्च निर्मलम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
‘जो (प्रकृति से) परे है - परम, परब्रह्म, आत्मा में स्थित परमेश्वर, जो रूप, रंग, नाम और विशेषण आदि से रहित है; जिसमें जन्म, वृद्धि, परिणाम, क्षय और नाश इन छह विकारों का सर्वथा अभाव है; जिसे हम सदैव ‘है’ ही कह सकते हैं, और जिसके लिए प्रसिद्ध है कि ‘वह सर्वत्र है और सम्पूर्ण जगत् उसी में निवास करता है - इसीलिए विद्वान् लोग उसे वासुदेव कहते हैं’, वह नित्य, अजन्मा, अक्षय, अपरिवर्तनशील, एकरस और निकृष्ट गुणों के अभाव से शुद्ध है ॥10-13॥
 
‘The one who is beyond (nature) – the supreme, the supreme, the God situated in the soul, who is free from form, colour, name and adjective etc.; In which there is complete absence of these six disorders of birth, growth, result, decay and destruction; Whom we can always say only as 'is', and for whom it is famous that 'he is everywhere and the whole world resides in him - that is why the scholars call him Vasudev', he is eternal, unborn, inexhaustible, unchangeable, monotonous and pure because of the absence of inferior qualities. 10-13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)