न चिन्तयति को राज्यं को धनं नाभिवाञ्छति।
तथापि भाव्यमेवैतदुभयं प्राप्यते नरै:॥ ४३॥
अनुवाद
राज्य प्राप्ति की चिंता किसे नहीं होती और धन की इच्छा किसे नहीं होती? तथापि, दोनों ही उन्हें प्राप्त होते हैं, जो उन्हें प्राप्त करने के लिए ही बने हैं ॥ 43॥
Who is not worried about acquiring a kingdom and who does not desire wealth? However, both are obtained only by those who are meant to receive them. ॥ 43॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥