Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 vishnu 1.17.86-89: जो [परम शांति] अग्नि, सूर्य, चंद्रमा, वायु, मेघ, वरुण, सिद्ध, राक्षस, यक्ष, राक्षसराज, सर्प, किन्नर, मनुष्य, पशु तथा अपने स्वयं के विकारों से, ज्वर, नेत्ररोग, अतिसार, प्लीहा और वात आदि रोगों से तथा द्वेष, ईर्ष्या, मोह, आसक्ति, लोभ तथा अन्य किसी भी भाव से कभी क्षीण नहीं होती और जो सदैव अत्यंत शुद्ध है, उसे मनुष्य अमलस्वरूप श्री केशव में मन लगाकर प्राप्त करता है। 86-89॥ | vishnu अध्याय 1.17: हिरण्यकशिपुका दिग्विजय और प्रह्लाद-चरित । vishnu अंश 1: प्रथम अंश । श्री विष्णु पुराण Sri Vishnu Puran | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
या नाग्निना न चार्केण नेन्दुना च न वायुना।
पर्जन्यवरुणाभ्यां वा न सिद्धैर्न च राक्षसै:॥ ८६॥
न यक्षैर्न च दैत्येन्द्रैर्नोरगैर्न च किन्नरै:।
न मनुष्यैर्न पशुभिर्दोषैर्नैवात्मसम्भवै:॥ ८७॥
ज्वराक्षिरोगातीसारप्लीहगुल्मादिकैस्तथा ।
द्वेषेर्ष्यामत्सराद्यैर्वा रागलोभादिभि: क्षयम्॥ ८८॥
न चान्यैर्नीयते कैश्चिन्नित्या यात्यन्तनिर्मला।
तामाप्नोत्यमले न्यस्य केशवे हृदयं नर:॥ ८९॥
अनुवाद
जो [परम शांति] अग्नि, सूर्य, चंद्रमा, वायु, मेघ, वरुण, सिद्ध, राक्षस, यक्ष, राक्षसराज, सर्प, किन्नर, मनुष्य, पशु तथा अपने स्वयं के विकारों से, ज्वर, नेत्ररोग, अतिसार, प्लीहा और वात आदि रोगों से तथा द्वेष, ईर्ष्या, मोह, आसक्ति, लोभ तथा अन्य किसी भी भाव से कभी क्षीण नहीं होती और जो सदैव अत्यंत शुद्ध है, उसे मनुष्य अमलस्वरूप श्री केशव में मन लगाकर प्राप्त करता है। 86-89॥
Which [ultimate peace] is never diminished by fire, sun, moon, wind, clouds, Varuna, Siddha, Rakshas, Yaksha, demon king, snake, eunuch, man, animal and one's own vices, diseases like fever, eye disease, diarrhoea, spleen and gout etc and also by hatred, jealousy, attachment, attachment, greed and any other emotion, and which is always extremely pure, can be attained by man by devoting his mind to Shri Keshav in the form of Amal. Receives. 86-89॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥