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vishnu 1.17.40: सर्पों ने कहा - हे दैत्यराज! देखो, हमारे दाँत टूट गए हैं, मणियाँ चटकने लगी हैं, हमारे फन दुखने लगे हैं और हृदय काँपने लगा है, फिर भी इसकी त्वचा बिल्कुल नहीं कटी है। अतः अब आप कृपा करके कोई दूसरा कार्य बताएँ॥40॥   |   vishnu अध्याय 1.17: हिरण्यकशिपुका दिग्विजय और प्रह्लाद-चरित   ।   vishnu अंश 1: प्रथम अंश   ।   श्री विष्णु पुराण Sri Vishnu Puran | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 17: हिरण्यकशिपुका दिग्विजय और प्रह्लाद-चरित  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  1.17.40 
सर्पा ऊचु:
दंष्ट्रा विशीर्णा मणय: स्फुटन्ति
फणेषु तापो हृदयेषु कम्प:।
नास्य त्वच: स्वल्पमपीह भिन्नं
प्रशाधि दैत्येश्वर कार्यमन्यत्॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
सर्पों ने कहा - हे दैत्यराज! देखो, हमारे दाँत टूट गए हैं, मणियाँ चटकने लगी हैं, हमारे फन दुखने लगे हैं और हृदय काँपने लगा है, फिर भी इसकी त्वचा बिल्कुल नहीं कटी है। अतः अब आप कृपा करके कोई दूसरा कार्य बताएँ॥40॥
 
The snakes said - O demon king! Look, our teeth have broken, the gems have started cracking, our hoods have started aching and our hearts have started trembling, yet its skin has not been cut at all. So now please tell us some other task. ॥ 40॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)