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vishnu 1.17.15: जो आदि, मध्य और अन्त से रहित हैं, जो अजन्मा, वृद्धि और क्षय से रहित हैं, जो अच्युत हैं, समस्त कारणों के कारण हैं, जगत के पालनहार और संहारकर्ता हैं, उन श्री हरि को मैं नमस्कार करता हूँ॥15॥   |   vishnu अध्याय 1.17: हिरण्यकशिपुका दिग्विजय और प्रह्लाद-चरित   ।   vishnu अंश 1: प्रथम अंश   ।   श्री विष्णु पुराण Sri Vishnu Puran | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 17: हिरण्यकशिपुका दिग्विजय और प्रह्लाद-चरित  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  1.17.15 
अनादिमध्यान्तमजमवृद्धिक्षयमच्युतम्।
प्रणतोऽस्म्यन्तसन्तानं सर्वकारणकारणम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जो आदि, मध्य और अन्त से रहित हैं, जो अजन्मा, वृद्धि और क्षय से रहित हैं, जो अच्युत हैं, समस्त कारणों के कारण हैं, जगत के पालनहार और संहारकर्ता हैं, उन श्री हरि को मैं नमस्कार करता हूँ॥15॥
 
I bow to Shri Hari who is without beginning, middle and end, who is unborn, without growth and decay, and who is infallible, the cause of all causes, the sustainer and destroyer of the universe. ॥15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)