श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 15: प्रचेताओंका मारिषा नामक कन्याके साथ विवाह, दक्ष प्रजापतिकी उत्पत्ति एवं दक्षकी आठ कन्याओंके वंशका वर्णन  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  1.15.43 
यया शक्रप्रियार्थिन्या कृतो मे तपसो व्यय:।
त्वया धिक्तां महामोहमञ्जूषां सुजुगुप्सिताम्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
तुम महाभ्रम के पात्र हो और अत्यंत निन्दनीय हो। हाय! तुमने इन्द्र के स्वार्थ के लिए मेरी तपस्या नष्ट कर दी!! धिक्कार है तुम्हें!!!॥ 43॥
 
You are the vessel of great delusion and are most condemnable. Alas! You destroyed my penance for the selfishness of Indra!! Shame on you!!!॥ 43॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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