श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 12: ध्रुवकी तपस्यासे प्रसन्न हुए भगवान‍्का आविर्भाव और उसे ध्रुवपद-दान  »  श्लोक 97-98
 
 
श्लोक  1.12.97-98 
स्वयं शुश्रूषणाद्धर्म्यान्मातापित्रोश्च वै तथा।
द्वादशाक्षरमाहात्म्यात्तपसश्च प्रभावत:॥ ९७॥
तस्याभिमानमृद्धिं च महिमानं निरीक्ष्य हि।
देवासुराणामाचार्य: श्लोकमत्रोशना जगौ॥ ९८॥
 
 
अनुवाद
हे मुने! धर्मपूर्वक सेवा करने से तथा द्वादशाक्षर-मन्त्र के माहात्म्य और तप के प्रभाव से अपने माता-पिता के सम्मान, यश और प्रभाव में वृद्धि देखकर देवताओं और दानवों के गुरु शुक्रदेव ने ये श्लोक कहे हैं-॥97-98॥
 
Hey Mune! Seeing the increase in the respect, glory and influence of his parents by serving them religiously and due to the greatness of Dwadashakshar-Mantra and the influence of penance, Shukradev, the teacher of gods and demons, has said these verses -॥ 97-98॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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