श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 12: ध्रुवकी तपस्यासे प्रसन्न हुए भगवान‍्का आविर्भाव और उसे ध्रुवपद-दान  »  श्लोक 86-87
 
 
श्लोक  1.12.86-87 
ततो यथाभिलषिता प्राप्ता ते राजपुत्रता।
उत्तानपादस्य गृहे जातोऽसि ध्रुव दुर्लभे॥ ८६॥
अन्येषां दुर्लभं स्थानं कुले स्वायम्भुवस्य यत्॥ ८७॥
 
 
अनुवाद
इसलिए हे ध्रुव! तुम्हें राजकुमार होने का अभीष्ट पद प्राप्त हुआ और तुम स्वायंभुव मनु के कुल में उत्तानपाद के घर में उत्पन्न हुए, जिसमें अन्य किसी को स्थान मिलना अत्यंत दुर्लभ है ॥ 86-87॥
 
Therefore, O Dhruva, you got the desired position of being a prince and you were born in the house of Uttanapada, in the family of Svayambhuva Manu, in which it is very rare for anyone else to get a place. ॥ 86-87॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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