श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 12: ध्रुवकी तपस्यासे प्रसन्न हुए भगवान‍्का आविर्भाव और उसे ध्रुवपद-दान  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  1.12.77 
ध्रुव उवाच
भगवन‍्भूतभव्येश सर्वस्यास्ते भवान‍् हृदि।
किमज्ञातं तव ब्रह्मन‍्मनसा यन्मयेक्षितम्॥ ७७॥
 
 
अनुवाद
ध्रुव बोले - हे समस्त लोकों के स्वामी! आप सबके हृदय में निवास करते हैं। हे ब्रह्मन्! क्या मेरे मन की इच्छाएँ आपसे छिपी हुई हैं?॥ 77॥
 
Dhruva said - O Lord of all the worlds! You reside in the hearts of all. O Brahman! Are the desires of my mind hidden from you?॥ 77॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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