श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 12: ध्रुवकी तपस्यासे प्रसन्न हुए भगवान‍्का आविर्भाव और उसे ध्रुवपद-दान  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  1.12.65 
न्यग्रोध: सुमहानल्पे यथा बीजे व्यवस्थित:।
संयमे विश्वमखिलं बीजभूते तथा त्वयि॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
जैसे एक छोटे से बीज में विशाल वटवृक्ष समाया रहता है, वैसे ही प्रलय के समय सम्पूर्ण जगत् बीज रूप में ही अपने में समाहित हो जाता है ॥65॥
 
Just as a tiny seed contains a huge banyan tree, similarly at the time of destruction the entire universe merges into itself in the form of a seed. ॥ 65॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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