श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 12: ध्रुवकी तपस्यासे प्रसन्न हुए भगवान‍्का आविर्भाव और उसे ध्रुवपद-दान  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  1.12.57 
यद्भूतं यच्च वै भव्यं पुरुषोत्तम तद्भवान‍्।
त्वत्तो विराट् स्वराट् सम्राट् त्वत्तश्चाप्यधिपूरुष:॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
हे परमेश्र्वर! भूत और भविष्य की समस्त वस्तुएँ आप ही हैं। विराट, स्वराट, सम्राट और अधिपुरुष (ब्रह्मा) आदि भी आपसे ही उत्पन्न हुए हैं॥57॥
 
O Supreme Being! All the things of the past and the future are You only. Virat, Swarat, Samrat and Adhipurush (Brahma) etc. have also originated from You only. ॥ 57॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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