श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 12: ध्रुवकी तपस्यासे प्रसन्न हुए भगवान‍्का आविर्भाव और उसे ध्रुवपद-दान  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  1.12.14-15 
सुनीतिर्नाम तन्माता सास्रा तत्पुरत: स्थिता।
पुत्रेति करुणां वाचमाह मायामयी तदा॥ १४ ॥
पुत्रकास्मान्निवर्त्तस्व शरीरात्ययदारुणात्।
निर्बन्धतो मया लब्धो बहुभिस्त्वं मनोरथै:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
उस समय माया की रचना हुई उसकी माता सुनीति आँखों में आँसू भरकर उसके सामने प्रकट हुई और करुण स्वर में बोली - 'हे पुत्र! हे पुत्र!' [उसने कहा] - पुत्र! शरीर को नष्ट करने वाले इस घोर तप का हठ छोड़ दे। मैंने तुझे बड़ी कामनाओं से प्राप्त किया है॥ 14-15॥
 
At that time his mother Suniti, a creation of Maya, appeared before him with tears in her eyes and spoke compassionately, saying, 'O son! O son!' [She said] - Son! Give up your insistence on this terrible penance which destroys the body. I have obtained you by great desires.॥ 14-15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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