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श्लोक 1.12.103  |
स्थानभ्रंशं न चाप्नोति दिवि वा यदि वा भुवि।
सर्वकल्याणसंयुक्तो दीर्घकालं स जीवति॥ १०३॥ |
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| अनुवाद |
| वह चाहे स्वर्ग में रहे या पृथ्वी पर, अपने स्थान से कभी नहीं हिलता और समस्त शुभताओं से युक्त होकर दीर्घकाल तक जीवित रहता है ॥103॥ |
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| Whether he lives in heaven or on earth, he never moves from his place and remains alive for a long time, being filled with all auspiciousness. ॥103॥ |
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| इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे द्वादशोऽध्याय:॥ १२॥ |
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