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श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 11: ध्रुवका वनगमन और मरीचि आदि ऋषियोंसे भेंट  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.11.4 
राजासनस्थितस्याङ्कं पितुर्भ्रातरमाश्रितम्।
दृष्ट्वोत्तमं ध्रुवश्चक्रे तमारोढुं मनोरथम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
एक दिन अपने पिता को राजसिंहासन पर बैठा देख कर ध्रुव ने अपने भाई उत्तम को उनकी गोद में बैठे देखा तो उसकी भी इच्छा हुई कि वह भी अपने पिता की गोद में बैठे।
 
One day, seeing his brother Uttam sitting in his father's lap while he was seated on the throne, Dhruva also desired to sit in his father's lap.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)