(1) हे भगवान् हरि, हे प्रभु श्रीकृष्ण, मैं आपको नमन करता हूँ। आप यादव, हरि, माधव तथा केशव नामों से जाने जाते हैं।
(2) हे गोपाल, गोविंद, राम, श्री मधुसूदन, गिरिधारी, गोपीनाथ, मदनमोहन!
(3) श्रीचैतन्य और नित्यानंद की जय हो। श्री अद्वैत आचार्य तथा उनकी भार्या श्रीमती सीता ठाकुरानी की जय हो। भगवान् श्री हरि, गुरू, वैष्णवजन, श्रीमद्भागवत तथा श्रीमद् भगवद्गीता की जय हो।
(4) श्रीरूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, रघुनाथ भट्ट गोस्वामी, श्री जीव गोस्वामी, गोपाल भट्ट गोस्वामी और रघुनाथ गोस्वामी की जय हो।
(5) मैं इन छह गोस्वामियों के चरणों का वंदन करता हूँ। उनका वंदन करने से भक्ति के विघ्नों का नाश होता है तथा अभीष्ट इच्छा पूर्ण होती है।
(6) मैं इन छह गोस्वामियों के सेवक का सेवक हूँ। उन सबके चरणों की धूल मेरा पंच-ग्रास है।
(7) मेरी यही अभिलाषा है कि मैं इन छह गोस्वामियों के चरणों की सेवा करने वाले भक्तों के संग जन्म-जन्मांतर वास करूँ।
(8) इन छह गोस्वामियों ने जब ब्रज में वास किया था, तो इन्होंने राधा-कृष्ण की नित्य लीला का प्रकाश किया था।
(9) अपने मन को श्री गुरू और वैष्णवों के दिवय चरणों के ध्यान में लगाकर, आनंदपूर्वक हरि के नामों का उच्चारण करो, तथा वृन्दावन का भजन करो।
(10) श्री गुरू और वैष्णवों के पदमों की आशा करता हुआ, नरोत्तम दास हरिनाम-संकीर्तन करता है।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥