(2) आपका यह कङ्गाल (दास) आपको पुकार रहा है। एक बार दर्शन प्रदानकर मेरे प्राणोंकी रक्षा कीजिए ।
(3) हे वृन्दावन विलासिनी श्रीराधे ! हे श्रीश्यामसुन्दरके मनको भी हरण करनेवाली श्रीराधे !
(4) हे ललिता, विशाखा आदि अष्ट सखियोंकी शिरोमणि, वृषभानुनन्दिनी श्रीराधे ! इस प्रकार श्रीरघुनाथ दास गोस्वामी सदा नियमपूर्वक श्रीमती राधिकाजीको पुकारते हैं।
(5) कभी केशीघाटमें पुकारते हैं, तो कभी वंशीवटमें, कभी निधुवनमें तो कभी कुञ्जवनमें, ।
(6) कभी राधाकुण्डमें, तो कभी श्याम कुण्डमें, कभी कुसुम सरोवरमें, तो कभी गोवर्धनमें, ।
(7) कभी तालवनमें, तो कभी तमालवनमें। शरीरपर मलिन वस्त्र धारणकर ब्रजकी धूलमें लोटपोट हो रहे हैं तथा मुखसे हे राधे ! हे राधे ! पुकारते हैं ।
(8) हे राधे ! हे राधे ! पुकारते हुए उनकी आँखोंसे आसुओंकी धारा बह रही है। वे वृन्दावनकी गलियोंमें रोते-रोते राधे-राधे कहते हुए घूमते हैं।
(9) वे रात-दिन छप्पन दण्ड राधा-गोविन्दकी सेवामें ही निमग्न रहते हैं (60 दण्ड: 24 घंटे) ।
(10) वे मात्र चार दण्ड शयन करते हैं । परन्तु सोते हुए स्वप्नमें भी राधागोविन्दके दर्शन करते हैं।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥