(1) हे भगवान्! कृपया मुझे बताएँ कि वह दिन कब आएगा जब मैं नाम-अपराध से मुक्त हो जाऊँगा कब आपकी कृपा से मैं भगवान् के पवित्र नाम जप का रसास्वादन करने में समर्थ बन पाऊँगा?
(2) कब मैं अपने को घास के तिनके से भी अधिक हीन समझूँगा? कब सहनशीलता का गुण मेरे हृदय में प्रकट होगा? कब मैं सबको सम्मान देता हुआ, अपने सम्मान की किञ्चित् भी आशा नहीं करूँगा? इस प्रकार से कब मैं आपके पवित्र नाम में निहित अमृत का आस्वादन करूँगा?
(3) मुझे धन-संपत्ति, अनुयायी, सम्मान तथा सुन्दर स्त्रियों का संग नहीं चाहिए। इन वस्तुओं से देह को सुख प्राप्त होता है। हे गौरहरि! कृपया आप मुझे जन्म-जन्मांतर अपने चरणकमलों की अहैतुकी भक्ति प्रदान कीजिए।
(4) अहो! कब, कृष्ण के पवित्र नाम का उच्चारण करते ही मेरा शरीर पुलकित हो उठेगा? कब कीर्तन करते समय मेरी वाणी(कण्ठ) अवरूद्ध हो जाएगी और शरीर पीतवर्णी हो जाएगा? मैं कब मूर्च्छित होऊँगा तथा कब मेरे नेत्रों से निरंतर प्रेमाश्रुओं की वर्षा होगी?
(5) कब मैं नवद्वीप में गंगा के किनारे निष्कपट (प्रेमपूर्वक) हा गौर! हा निताई! बोलते हुए, नाचते-गाते हुए एक पागल वयक्ति की भाँति लोक-लज्जा का परित्याग करके इधर-उधर भागता रहूँगा?
(6) अहो! कब भगवान् नित्यानंद प्रभु कृपापूर्वक मुझे भौतिक भोग की आसक्ति को त्यागने के लिए प्रेरित करेंगे? वे कब मुझे अपने चरणकमलों की छाया प्रदान करेंगे तथा मुझे निरपराध होकर भगवान् हरि के पवित्र नाम का जप करने की योग्यता प्रदान करेंगे?
(7) मैं कब पवित्र नाम के रस को खरीदूँगा या चुराने में समर्थ बन पाऊँगा? कब मैं पवित्र नाम के रस द्वारा पूर्णतया मदोन्मत्त हो जाऊँगा? कब मैं उन रसिक वैष्णवों के चरणकमलों का संग प्राप्त कर सकूँगा जो प्रेमास्वादन करने में पारंगत हैं? कब मैं निरंतर दिवय प्रेमरस में आप्लावित रहूँगा?
(8) कब समस्त जीवों के प्रति मेरे हृदय में दया उदित होगी जिससे मैं अपना सुख भूलकर, एक विनम्र दास बन सकूँगा? अत्यन्त विनम्रतापूर्वक श्रील भक्तिविनोद ठाकुर भगवान् के उपदेशों का प्रचार करने का निश्चय करते हैं।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥