ब्रजेन्द्रनन्दन हरि, नवद्वीपे अवतरि’,
जगत भरिया प्रेम दिल।
मुइ से पामर-मति, विशेषे कठिन अति,
तेंहि मोरे करुणा नहिल॥2॥
स्वरूप, सनातन, रूप, रघुनाथ भट्टयुग,
ताहाते ना हइल मोर मति।
दिवय-चिन्तामणि-धाम, वृन्दावन हेन स्थान,
सेइ धामे ना कैनू वसति॥3॥
विशेष विषये मति, नहिल वैष्णवे रति,
निरन्तर खेद उठे मने।
नरोत्तमदास कहे, जीवेर उचित नहे,
श्रीगुरु-वैष्णव-सेवा बिने॥4॥
शब्दार्थ
(1) हे हरि! मेरे हृदय में एक बड़ी वेदना हो रही है। दुर्लभ मनुष्य देह-प्राप्ति के बाद भी, मैंने भगवान् श्रीकृष्ण का भजन नहीं किया। अतः मेरा जीवन वयर्थ हो गया है।
(2) यद्यपि, व्रजेन्द्रनन्दन कृष्ण ने नवद्वीप धाम में प्रकट होकर पूरे विश्व में भगवत्प्रेम का वितरण किया। केवल मैं ही उनकी कृपा को प्राप्त नहीं कर सका, क्योंकि मैं अत्यंत पापी एवं कठोर हृदयी हूँ।
(3) मेरे मन में श्रील स्वरूप दामोदर गोस्वामी, श्रील सनातन गोस्वामी, श्रील रूप गोस्वामी, श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी, श्रील रघुनाथ भट्ट गोस्वामी, श्रील गोपाल भट्ट गोस्वामी, के प्रति कोई आकर्षण नहीं है। न ही मैंने वृन्दावन में रहने की इच्छा की।
(4) श्रील नरोत्तमदास ठाकुर प्रार्थना करते हैं ‘‘मेरा मन सदैव इंद्रियतृप्ति में संलग्न रहता है और मैंने वैष्णवों के प्रति आसक्ति विकसित नहीं की, इसीलिये मैं सदैव दुःखी तथा शोकाकुल हूँ। गुरु और वैष्णव सेवा के बिना जीव का शुभ नहीं है। ’’
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥