[श्रील प्रभुपाद: I can speak a little in Hindi...]
आज हमारे सभी शिष्यगण व्यास-पूजा तिथि मना रहे हैं। गुरुदेव की जो जन्म-तिथि होती है, उसे 'व्यास-पूजा' कहा जाता है। क्योंकि वेदों के मूल गुरु भगवान् के अवतार श्रील कृष्ण-द्वैपायन वेदव्यास हैं।
और व्यासदेव की परम्परा से ही ज्ञान प्राप्त होता है, जैसा कि श्रीमद् भगवद्गीता में बताया गया है:
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥ (भ.गी. 4.2)
यह वैदिक ज्ञान परम्परा से प्राप्त होता है, केवल पाण्डित्य अथवा विद्वत्ता से नहीं। और जब यह परम्परा टूट जाती है, तो वह ज्ञान विकृत होकर नष्ट हो जाता है।
इसीलिए श्रील सनातन गोस्वामी ने पद्म पुराण का श्लोक उद्धृत करते हुए सावधान किया है:
अवैष्णव-मुखोद्गीर्णं पूतं हरिकथामृतम् ।
श्रवणं नैव कर्तव्यं सर्पोच्छिष्टं पयो यथा ॥
जो व्यक्ति वैष्णव-सदाचार से युक्त नहीं है, उसके मुख से हरिकथा कभी नहीं सुननी चाहिए। हरिकथा तो अमृत-स्वरूप है, फिर भी यदि कोई अवैष्णव उसका वर्णन करता है, तो उसे नहीं सुनना चाहिए। क्यों? जैसे दूध अमृत के समान पौष्टिक है, परन्तु यदि सर्प उसमें अपनी जीभ लगा दे (सर्पोच्छिष्ट), तो वह दूध विष बन जाता है!
और श्रीमन्महाप्रभु ने भी कहा है:
मायावादि-भाष्य शुनिले हय सर्वनाश । (चै.च. मध्य 6.169)
वैदिक शास्त्रों को 'श्रुति' कहा जाता है। श्रुति का अर्थ है—वह ज्ञान जो गुरु-शिष्य परम्परा से सुनकर प्राप्त किया जाता है। गुरु अपने शिष्य को सुनाते हैं, वह शिष्य आगे अपने शिष्य को सुनाता है।
शास्त्रों में चार प्रामाणिक वैष्णव सम्प्रदाय बताए गए हैं:
1. ब्रह्म सम्प्रदाय
2. रुद्र सम्प्रदाय
3. श्री सम्प्रदाय
4. कुमार सम्प्रदाय
पद्म पुराण में कहा गया है:
सम्प्रदाय-विहीना ये मन्त्रास्ते निष्फला मताः ।
प्रामाणिक सम्प्रदाय से जुड़े बिना जो मनगढ़न्त रूप से वेदों का अर्थ करते हैं, उनका ज्ञान सर्वथा निष्फल है।
हमारा सम्प्रदाय 'ब्रह्म-माधव-गौड़ीय सम्प्रदाय' है। श्रील व्यासदेव, व्यासदेव के शिष्य श्रील शुकदेव गोस्वामी, इसी परम्परा में श्रील मध्वाचार्य, फिर माधवेन्द्र पुरी, उनके शिष्य ईश्वर पुरी, फिर साक्षात् भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु, महाप्रभु के पार्षद षड्-गोस्वामी (रूप, सनातन, भट्ट रघुनाथ, श्री जीव, गोपाल भट्ट, दास रघुनाथ)—इस अविच्छिन्न गुरु-परम्परा में हम सब आते हैं।
सम्प्रदाय का अर्थ है—जहाँ आचार्य अपनी ओर से कोई मनगढ़न्त बात नहीं बोलते; जो उन्होंने गुरु-परम्परा से सुना है, वही ज्यों-का-त्यों अपने शिष्यों को प्रदान करते हैं। इसलिए गुरुदेव की जन्म-तिथि को 'व्यास-पूजा' कहा जाता है। क्योंकि गुरु व्यासदेव के प्रतिनिधि हैं और जिस आसन पर वे बैठते हैं, उसे 'व्यास-आसन' कहा जाता है।
आज हमारे शिष्यों ने व्यास-पूजा का आयोजन किया है और वे पूजा कर रहे हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई 'अहंग्रहोपासना' कर रहा है कि "मैं भगवान् बन गया हूँ और अपनी पूजा करवा रहा हूँ!" नहीं, यह बात नहीं है।
शास्त्र कहते हैं:
यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः ॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद् 6.23)
वैदिक ज्ञान का वास्तविक रहस्य केवल उसी महात्मा के हृदय में प्रकाशित होता है, जिसकी भगवान् में पराभक्ति है और जैसी भक्ति भगवान् में है, वैसी ही निष्ठा अपने गुरुदेव में है।
श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ज्ञान के लक्षणों में कहते हैं:
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ (भ.गी. 13.8)
'आचार्योपासनम्'—आचार्य की उपासना करनी चाहिए।
गुरुदेव को शिष्यों को सिखाने के लिए यह पूजा स्वीकार करनी पड़ती है, और वे इस समस्त पूजा को अपने गुरुदेव और भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित कर देते हैं। इसमें गुरु का कोई व्यक्तिगत स्वार्थ या मान-प्रतिष्ठा की कामना नहीं होती।
श्रीचैतन्य महाप्रभु कहते हैं:
ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोन भाग्यवान् जीव ।
गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाय भक्ति-लता-बीज ॥ (चै.च. मध्य 19.151)
गुरु और कृष्ण की कृपा से ही भक्ति-लता का बीज प्राप्त होता है। इसलिए व्यास-पूजा का अनुष्ठान शिष्य के लिए परम कर्त्तव्य है।
आज संसारभर में हमारे 102 केन्द्र हैं। सभी केन्द्रों के भक्त अपनी-अपनी पुष्पाञ्जलि (offerings) लिखकर एक ग्रन्थ के रूप में प्रकाशित करते हैं और प्रतिवर्ष व्यास-पूजा के दिन गुरुदेव को अर्पित करते हैं।
अब श्रीमान् ब्रह्मानन्द स्वामी उन श्रद्धाञ्जलियों में से कुछ पत्र पढ़कर आप लोगों को सुनाएँगे, और उसके पश्चात् आप सभी प्रेमपूर्वक भगवान् का महाप्रसाद ग्रहण कीजिएगा।
आप सभी पधारे, इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद!
हरे कृष्ण! जय!
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥