जैसे कपड़े का सूत होता है—इधर भी सूत है, उधर भी सूत है, और सब एकत्रित होकर कपड़ा बनता है। सूत कपड़े का कारण है, सूत का कारण रुई है, रुई का कारण कपास का वृक्ष है, और वृक्ष का कारण बीज है। इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण श्रीमद् भगवद्गीता में पहले ही बता चुके हैं:
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् । (भ.गी. 7.10)
समस्त वस्तुओं का मूल बीज भगवान् ही हैं। भगवान् ही मूल कारण हैं, और सब कुछ उनका कार्य है।
ब्रह्मसंहिता में इसको और अधिक स्पष्ट किया गया है:
ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः ।
अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम् ॥ (ब्रह्मसंहिता 5.1)
वे समस्त कारणों के परम कारण हैं (सर्वकारणकारणम्)। जब हम वस्त्र देखते हैं, तो सोचते हैं कि यह किसी मशीन अथवा जुलाहे (weaver) ने बनाया है। परन्तु उसका मूल कारण भगवान् हैं। जो व्यक्ति प्रत्येक वस्तु में उसके मूल कारण भगवान् श्रीकृष्ण को देख सकता है, उसी का नाम 'कृष्णभावनामृत' (Krishna Consciousness) है।
इस विषय में एक बहुत सुन्दर इतिहास है। एक बार नारद जी वैकुण्ठ में भगवान् नारायण से मिलने जा रहे थे। मार्ग में उन्हें एक चर्मकार (मोची) मिला। उसने हाथ जोड़कर पूछा: "महाराज! आप कहाँ जा रहे हैं?" नारद जी ने कहा: "मैं वैकुण्ठ जा रहा हूँ, भगवान् से मिलने।" उस चर्मकार ने विनीत भाव से कहा: "महाराज! कृपया भगवान् से पूछिएगा कि मेरी मुक्ति कब होगी?" नारद जी ने कहा: "हाँ, अवश्य पूछूँगा।"
आगे चलने पर नारद जी को एक उच्चकोटि का वेदान्ती ब्राह्मण पण्डित मिला। उसने भी पूछा: "नारद जी! आप कहाँ जा रहे हैं?" नारद जी ने कहा: "वैकुण्ठ, भगवान् के दर्शन करने।" उसने भी कहा: "जरा भगवान् से पूछिएगा कि मेरी मुक्ति कब होगी?"
नारद जी जब वैकुण्ठ पहुँचे, तो उन्होंने भगवान् से दोनों की प्रार्थना निवेदन की। भगवान् ने मुस्कुराकर कहा: "नारद! उस चर्मकार की मुक्ति तो इसी जन्म में हो जाएगी, परन्तु उस पण्डित को अभी अनेक जन्म लेने पड़ेंगे!" नारद जी को बड़ा आश्चर्य हुआ—ब्राह्मण को अनेक जन्म और साधारण चर्मकार को इसी जन्म में मुक्ति! उन्होंने कारण पूछा। भगवान् ने कहा: "जब तुम लौटोगे और वे पूछें कि भगवान् क्या कर रहे थे, तो कह देना कि भगवान् एक सुई के छेद में से एक हाथी को इधर से उधर निकाल रहे थे।"
नारद जी लौटे। पहले वह पण्डित मिला और उसने पूछा: "भगवान् क्या कर रहे थे?" नारद जी ने कहा: "भगवान् एक सुई के छेद से हाथी को आर-पार निकाल रहे थे।" पण्डित हँसने लगा और बोला: "धत्! यह भी कोई बात है? सुई के छेद से कहीं हाथी निकल सकता है? यह बिल्कुल असम्भव और काल्पनिक बात है!"
फिर नारद जी उस चर्मकार के पास गए। जब उन्होंने वही बात बताई, तो चर्मकार के नेत्रों से प्रेमाश्रु बहने लगे। वह गद्गद होकर कहने लगा: "अहा! मेरे प्रभु की क्या अचिन्त्य शक्ति है! भगवान् सब कुछ कर सकते हैं!" नारद जी ने पूछा: "क्या तुम्हें सचमुच विश्वास है कि सुई के छेद से हाथी निकल सकता है?" चर्मकार ने उत्तर दिया: "महाराज! मैं तो इसे रोज़ प्रत्यक्ष देखता हूँ। मैं जिस विशाल वटवृक्ष के नीचे बैठकर जूते गाँठता हूँ, उस वटवृक्ष का एक छोटा सा फल गिरता है। उस फल में हज़ारों नन्हे-नन्हे बीज होते हैं, और एक-एक छोटे से बीज के भीतर इतना विशाल वटवृक्ष छिपा रहता है! यदि मेरे भगवान् इतने छोटे से बीज में इतना बड़ा वटवृक्ष समा सकते हैं, तो क्या वे सुई के छेद से हाथी नहीं निकाल सकते?"
नारद जी समझ गए कि यह चर्मकार भगवान् की 'अचिन्त्य शक्ति' (inconceivable potency) पर पूर्ण विश्वास रखता है, जबकि वह पण्डित केवल शुष्क तर्क में उलझा है। जब तक हम भगवान् की अचिन्त्य शक्ति को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक हम आध्यात्मिक जीवन में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते।
मूर्ख लोग सोचते हैं कि जैसी मेरी शक्ति है, वैसी ही भगवान् की भी होगी:
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥ (भ.गी. 9.11)
वे सोचते हैं कि मैं एक मन बोझ उठा सकता हूँ, तो भगवान् दो मन या चार मन उठा लेंगे! पर जब वे सुनते हैं कि सात वर्ष की अवस्था में भगवान् श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका उँगली पर सात दिन तक उठा लिया, तो कहते हैं—"यह तो असम्भव है!"
अरे, हमारी इन भौतिक चमड़े की आँखों से तो शरीर के भीतर रहने वाली नन्ही सी जीवात्मा भी दिखाई नहीं देती! जब जीवात्मा शरीर छोड़ देती है, तो शरीर मुर्दा हो जाता है, उसकी एक कौड़ी की भी कीमत नहीं रहती। बड़े-बड़े वैज्ञानिक और डॉक्टर सूक्ष्मदर्शी (microscope) लगाकर भी नहीं देख पाते कि आत्मा कहाँ है और कैसे निकल गई।
अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद्ग्राह्यमिन्द्रियैः ।
सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः ॥ (भ.र.सिं. 1.2.234)
जड़ इन्द्रियों से चेतन तत्त्व का दर्शन नहीं हो सकता। इसीलिए भगवान् कृपा करके मन्दिर में 'अर्चा-विग्रह' (Deity) के रूप में प्रकट होते हैं, ताकि हम इन आँखों से उनका दर्शन और सेवा कर सकें।
मूर्ख लोग कहते हैं कि यह तो पत्थर है! अरे, पत्थर भी तो भगवान् की ही शक्ति है:
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ (भ.गी. 7.4)
मिट्टी, पत्थर, जल, अग्नि, वायु, आकाश—यह सब भगवान् की ही अपरा प्रकृति है। जब पत्थर भी भगवान् से अलग नहीं है, तो क्या सर्वशक्तिमान् भगवान् पत्थर के विग्रह में प्रकट नहीं हो सकते? अवश्य हो सकते हैं! केवल देखने वाली आँखें चाहिए:
प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्तिविलोचनेन
सन्तः सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति ।
यं श्यामसुन्दरमचिन्त्यगुणस्वरूपं
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ (ब्रह्मसंहिता 5.38)
भगवान् श्रीमद् भगवद्गीता में कहते हैं:
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥ (भ.गी. 7.13)
प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) से मोहित होने के कारण संसारी लोग भगवान् को नहीं समझ पाते। वैज्ञानिक कहते हैं—"Nature (प्रकृति) सब कुछ कर रही है।" पर प्रकृति किसकी शक्ति है?
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । (भ.गी. 9.10)
भगवान् कहते हैं कि मेरी अध्यक्षता में प्रकृति कार्य करती है।
सृष्टि-स्थिति-प्रलय-साधन-शक्तिरेका
छायेव यस्य भुवनानि बिभर्ति दुर्गा ।
इच्छानुरूपमपि यस्य च चेष्टते सा
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ (ब्रह्मसंहिता 5.44)
दुर्गा (भौतिक प्रकृति) की इतनी भारी शक्ति है, पर वह भगवान् की छाया की तरह उनकी इच्छानुसार ही कार्य करती है।
परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते
स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद् 6.8)
मनुष्य एक छोटा सा हवाई जहाज़ (aeroplane) बनाकर अपनी बड़ी तारीफ़ करता है, पर भगवान् ने एक नन्हा सा कीड़ा बनाया है जो इतनी जटिल संरचना के साथ हवा में उड़ता है! यदि हम भगवान् की अचिन्त्य शक्ति को नहीं समझेंगे, तो हमारी दशा कुएँ के मेंढक (कूपमण्डूक) जैसी होगी।
कूपमण्डूक का विचार क्या होता है? तीन हाथ चौड़े कुएँ में रहने वाला मेंढक सोचता है कि संसार बस तीन हाथ का है। जब कोई बाहर से आकर कहे कि मैंने अटलांटिक महासागर देखा है, तो वह कुएँ में छलाँग लगाकर पूछेगा—"क्या वह चार हाथ बड़ा है? पाँच हाथ? दस हाथ?" वह कभी महासागर की विशालता की कल्पना ही नहीं कर सकता! उसी प्रकार जब संसारी लोग भगवान् के दिव्य रूप की असीमता को अपनी बुद्धि से नाप नहीं पाते, तो कह देते हैं—"भगवान् निराकार हैं!" यह उनकी अज्ञानता है।
माता यशोदा के सामने जब बाल-कृष्ण ने मुख खोला, तो उन्होंने उनके मुख के भीतर अनन्त-कोटि ब्रह्माण्ड, सूर्य, चन्द्र, पर्वत और नदियाँ प्रत्यक्ष देखीं!
यस्यैकनिश्वसितकालमथावलम्ब्य
जीवन्ति लोमविलजा जगदण्डनाथाः ।
विष्णुर्महान् स इह यस्य कलाविशेषो
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ (ब्रह्मसंहिता 5.48)
कारणोदकशायी महाविष्णु जब श्वास छोड़ते हैं, तो उनके रोमकूपों से अनन्त-कोटि ब्रह्माण्ड निकलते हैं, और प्रत्येक ब्रह्माण्ड में एक-एक ब्रह्मा, एक-एक शिव, और एक-एक सूर्य होते हैं। वे महाविष्णु भी भगवान् श्रीकृष्ण के अंश के अंश हैं!
श्रीचैतन्य महाप्रभु जब जगन्नाथ पुरी में श्रीजगन्नाथ जी के दर्शन करने गए, तो भगवान् के दर्शन करते ही प्रेम-भाव में मूर्छित होकर गिर पड़े। देखने वाली आँखें चाहिए।
जैसे आकाश में जब बादल छा जाते हैं, तो लोग कहते हैं कि बादल ने सूर्य को ढक दिया। अरे, सौ-दो सौ मील का छोटा सा बादल क्या चौदह लाख गुना बड़े सूर्य को ढक सकता है? बादल ने सूर्य को नहीं ढका, उसने हमारी छोटी सी आँख को ढक दिया है! उसी प्रकार माया भगवान् को कभी नहीं ढक सकती:
अपश्यत् पुरुषं पूर्णं मायां च तदपाश्रयाम् । (श्रीमद्भागवतम् 1.7.4)
माया भगवान् के पीछे खड़ी रहती है; वह केवल हमारी अज्ञानी आँखों को ढक देती है।
रात के समय आप टॉर्च लेकर कहें कि मैं सूर्य को ढूँढूँगा, तो क्या आप सूर्य को देख सकेंगे? नहीं! जब प्रातःकाल सूर्य स्वयं अपनी कृपा से उदित होगा, तभी आप सूर्य को देख सकेंगे। उसी प्रकार जब भगवान् अपनी अहैतुकी कृपा से हमारे समक्ष प्रकट होते हैं, तभी उनका दर्शन होता है:
अथापि ते देव पदाम्बुजद्वय-
प्रसादलेशानुगृहीत एव हि ।
जानाति तत्त्वं भगवन्महिम्नो
न चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वन् ॥ (श्रीमद्भागवतम् 10.14.29)
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥ (भ.गी. 7.3)
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः । (भ.गी. 7.25)
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः । (भ.गी. 18.55)
जैसे यदि आप बिड़ला जी से पूछें कि आपके पास कितना धन है, तो वे आपको नहीं बताएँगे; पर यदि वे आपसे प्रसन्न होकर स्वयं अपनी बही-खाता दिखा दें, तो आप जान जाएँगे। उसी प्रकार केवल अनन्य भक्ति और शरणागति से ही भगवान् को जाना जा सकता है।
हिरण्यकशिपु ने ब्रह्मा जी से बहुत चालाकी से वरदान माँगा था—न दिन में मरूँ, न रात में; न मनुष्य से, न पशु से, न देवता से; न अस्त्र से, न शस्त्र से; न ज़मीन पर, न जल में, न आकाश में; न घर के भीतर, न बाहर! उसने सोचा कि मैं अमर हो गया। पर भगवान् की बुद्धि सदा दो उँगली आगे रहती है! भगवान् नृसिंहदेव के रूप में प्रकट हुए—आधा मनुष्य, आधा सिंह; सन्ध्या के समय मारा (जो न दिन है न रात); चौखट पर मारा (जो न भीतर है न बाहर); अपनी जाँघ पर रखकर मारा (जो न पृथ्वी है न आकाश); और अपने नाखूनों से उसका पेट चीर दिया (जो कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं था)!
इसलिए अपनी कुटिल बुद्धि और योजनाओं को छोड़िए। भगवान् के चरणों में पूर्ण शरणागत हो जाइए:
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ (भ.गी. 18.66)
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥ (भ.गी. 7.19)
अनेक जन्मों के बाद जब वास्तविक ज्ञान होता है कि वासुदेव श्रीकृष्ण ही सर्वस्व हैं, तब मनुष्य उनके चरणों में आत्म-समर्पण करता है। वही जीवन की पूर्णता है। बहुत-बहुत धन्यवाद! हरे कृष्ण!
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥