[श्रील प्रभुपाद: परसों मैंने हिन्दी में बोला था, कल अंग्रेज़ी में, और आज मैं फिर हिन्दी में बोलूँगा। आप क्या कहते हैं? (श्रोता: हिन्दी में ही बोलिए प्रभुपाद!) ठीक है, जैसा आप चाहें।]
पूर्व श्लोक (5.5.1) में हमें यही उपदेश मिला कि मनुष्य जीवन कुत्तों और सूअरों की तरह दिन-रात घोर परिश्रम करने के लिए नहीं है:
नायं देहो देहभाजां नृलोके
कष्टान् कामानर्हते विड्भुजां ये ।
तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं
शुद्ध्येद्यस्माद् ब्रह्मसौख्यं त्वनन्तम् ॥
यह मानव जीवन दिव्य तपस्या करने के लिए है। That is Vedic civilization.
हमारे इतिहास में बड़े-बड़े राजर्षि भी घोर तपस्वी होते थे। महाराज भरत के वंश में एक राजा हुए—रन्तिदेव। वे चक्रवर्ती राजा होते हुए भी इतने बड़े तपस्वी थे कि यदि कोई उन्हें भोजन दे देता, तो पा लेते, अन्यथा उपवास करते थे—अकेले ही नहीं, उनका पूरा परिवार तपस्वी था! एक बार अड़तालीस दिन तक उन्हें कुछ भी खाने को नहीं मिला। अड़तालीस दिन के बाद जब थोड़ा भोजन मिला, तो एक भूखा ब्राह्मण आ गया, उन्होंने आधा भोजन उसे दे दिया। फिर एक शूद्र आ गया, फिर एक चाण्डाल अपने कुत्तों के साथ आ गया, उन्होंने बचा हुआ भोजन और जल भी उन्हें दे दिया! पूरा परिवार दुर्बल हो गया, पर उन्होंने अपनी परवाह नहीं की। ऐसे-ऐसे त्यागी राजा हमारे भारतवर्ष के इतिहास में हुए हैं।
इसीलिए यह भगवत्तत्त्व-ज्ञान राजाओं और समाज के नेताओं को सिखाया जाता था:
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ॥ (भ.गी. 4.1-2)
यह भगवद्ज्ञान साधारण व्यक्तियों के लिए नहीं, अपितु उन राजर्षियों और पथ-प्रदर्शकों के लिए है जो प्रजा का पालन करते हैं। तथाकथित राजनेता और विद्वान् तो श्रीमद् भगवद्गीता को तोड़-मरोड़ कर उसका अनर्थ कर देते हैं।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ (भ.गी. 3.21)
श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करता है, सामान्य जन भी उसी का अनुसरण करते हैं।
मनुष्य जीवन तपस्या के लिए है। यदि दो पैरों वाले मनुष्यों को पशुओं (श्व, विड्वराह, उष्ट्र, खर) की तरह ही रखा जाए, तो संसार में शान्ति कहाँ से आएगी?
ऋषभदेव ने पहले श्लोक में बताया कि 'तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं शुद्ध्येत्'—अपनी सत्ता को शुद्ध करना चाहिए। 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा'—ब्रह्म-ज्ञान लाभ करके अपने वास्तविक स्वरूप 'अहं ब्रह्मास्मि' को जानना ही मनुष्य जीवन का कर्तव्य है।
तपस्या तो भौतिकतावादी भी करते हैं—धन कमाने के लिए, ऐश्वर्य भोगने के लिए दिन-रात खटते हैं। हिरण्यकशिपु ने भी अमर होने के लिए घोर तपस्या की थी, पर भौतिक संसार में अमर होना असम्भव है। जो असम्भव है, उसके पीछे व्यर्थ तपस्या करने से क्या लाभ? शास्त्र कहते हैं कि भगवान् को प्राप्त करने के लिए तपस्या करो:
तस्यैव हेतोः प्रयतेत कोविदो
न लभ्यते यद्भ्रमतामुपर्यधः । (श्रीमद्भागवतम् 1.5.18)
चौरासी लाख योनियों में भटकते हुए जो चीज़ कभी नहीं मिली, उस भगवत्प्राप्ति के लिए प्रयत्न करो।
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ (भ.गी. 14.18)
सत्त्वगुण में तपस्या करोगे तो उच्च लोकों में जाओगे; रजोगुण में रहोगे तो इसी भूलोक में रहोगे; और तमोगुण में शराब, मांस आदि के लिए पाप करोगे तो अधोगति होकर पशु-योनि में गिरना पड़ेगा।
भगवान् ने मनुष्य को यह कान दिए हैं—श्रवण करने के लिए! कुत्ते-बिल्ली के पास भी कान हैं, पर वे श्रीमद् भगवद्गीता नहीं सुन सकते। मनुष्य के कान श्रुति-गोचर होने चाहिए—शास्त्रों का श्रवण करने के लिए:
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् । (श्रीमद्भागवतम् 7.5.23)
भक्ति का आरम्भ श्रवण से होता है। जो ठीक से सुनेगा, वही दूसरों को सुनाएगा (कीर्तन करेगा)।
भारत-भूमिते मनुष्य-जन्म हइल यार ।
जन्म सार्थक करि' कर पर-उपकार ॥ (चै.च. आदि 9.41)
पहले स्वयं सुनो, अपना जीवन सार्थक करो, और फिर दूसरों को यह ज्ञान देकर उनका उपकार करो। यदि स्वयं कुछ नहीं सुना और मनमाने ढंग से नेता बन गए, तो अन्धा अन्धे को राह दिखाएगा और दोनों गढ्ढे में गिरेंगे:
अन्धा यथान्धैरुपनीयमानास्तेऽपीशतन्त्र्यामुरुदाम्नि बद्धाः । (श्रीमद्भागवतम् 7.5.31)
जब महाराज परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा कि मरने वाले व्यक्ति को क्या सुनना चाहिए, तो शुकदेव गोस्वामी ने कहा:
श्रोतव्यादीनि राजेन्द्र नॄणां सन्ति सहस्रशः ।
अपश्यतामात्मतत्त्वं गृहेषु गृहमेधिनाम् ॥ (श्रीमद्भागवतम् 2.1.2)
"हे राजन्! जो आत्मतत्त्व से अनभिज्ञ गृहमेधी हैं, उनके लिए सुनने को हज़ारों भौतिक विषय और समाचार हैं।"
जैसे आज पश्चिम में समाचार-पत्रों के इतने मोटे-मोटे बण्डल आते हैं जिनमें हज़ारों विज्ञापन और सांसारिक बातें होती हैं। गृहमेधी लोग दिन-रात वही पढ़ते हैं। परन्तु जो भक्त हैं, वे इन सब व्यर्थ बातों को पूरी तरह छोड़ देते हैं:
भक्तिः परेशानुभवो विरक्तिरन्यत्र चैष... (श्रीमद्भागवतम् 11.2.42)
भगवद्भक्ति का लक्षण ही है वैराग्य-विद्या। जब सांसारिक लाभ-हानि से हमारा कोई सरोकार ही नहीं रहा—'ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति' (भ.गी. 18.54)—तो फिर कौन मित्र है और कौन शत्रु? सभी के प्रति समभाव हो जाता है।
एक बार ईसा मसीह कहीं उपदेश दे रहे थे, तो किसी ने आकर कहा कि आपकी माता और भाई आपको बुला रहे हैं। ईसा मसीह ने कहा: "मेरी माता और भाई कौन हैं? जो मेरे परमपिता की इच्छा का पालन करते हैं, वही मेरे भाई, बहन और माता हैं।"
यहाँ दो शब्दों का भेद समझना चाहिए: 'गृहमेधी' और 'गृहस्थ'।
'गृहस्थ' एक आश्रम है। आश्रम का अर्थ है जहाँ भगवद्-आराधना होती है। गृहस्थ परिवार और बच्चों के साथ रहते हुए भी अपने जीवन का मुख्य लक्ष्य भगवान् की सेवा को बनाता है।
'गृहमेधी' वह है जिसका कोई आध्यात्मिक लक्ष्य नहीं है—बस खाओ, पियो, मौज करो, घर को सजाओ, स्त्री-बच्चों के भोग में मग्न रहो और आत्मतत्त्व से सर्वथा अनभिज्ञ रहो। ऐसा व्यक्ति कुत्ते और सूअर के समान है।
श्रीचैतन्य महाप्रभु कहते हैं:
किबा विप्र, किबा न्यासी, शूद्र केने नय ।
येइ कृष्ण-तत्त्व-वेत्ता, सेइ 'गुरु' हय ॥ (चै.च. मध्य 8.128)
चाहे कोई ब्राह्मण हो, संन्यासी हो, शूद्र हो या गृहस्थ—यदि वह कृष्णतत्त्व को जानता है, तो वही यथार्थ गुरु है।
इन्द्रियभोग में अत्यधिक आसक्त होने से आत्मज्ञान लुप्त हो जाता है:
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ (भ.गी. 2.44)
नूनं प्रमत्तः कुरुते विकर्म
यदिन्द्रियप्रीतय आपृणोति ।
न साधु मन्ये यत आत्मनोऽय-
मसन्नपि क्लेशद आस देहः ॥ (श्रीमद्भागवतम् 5.5.4)
प्रह्लाद महाराज भी कहते हैं:
शोचे ततो विमुखचेतस इन्द्रियार्थ-
मायासुखाय भरमुद्वहतो विमूढान् । (श्रीमद्भागवतम् 7.9.43)
जो क्षणिक माया-सुख के लिए गधे की तरह भार ढो रहे हैं, वैष्णव उनके ऊपर करुणा करता है।
शुद्ध भक्त कभी भौतिक भोग की कामना नहीं करता:
न धनं न जनं न सुन्दरीं
कवितां वा जगदीश कामये ।
मम जन्मनि जन्मनीश्वरे
भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि ॥ (शिक्षाष्टक 4)
अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम् ।
आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ॥ (भ.र.सिं. 1.1.11)
भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-कामी सकलि 'अशान्त' ।
कृष्ण-भक्त—निष्काम, अतएव 'शान्त' ॥ (चै.च. मध्य 19.149)
कर्मी भोग (भुक्ति) चाहता है, ज्ञानी मुक्ति चाहता है, और योगी सिद्धियाँ (अणिमा, लघिमा आदि) चाहता है—ये सब अशान्त हैं। केवल कृष्णभक्त ही निष्काम है, इसलिए वही परम शान्त है।
तपस्या करके ब्रह्म-सुख प्राप्त किया जा सकता है, पर केवल निर्विशेष ब्रह्म में लीन होना स्थायी नहीं है:
आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः
पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः ॥ (श्रीमद्भागवतम् 10.2.32)
जीव आनन्दमय है, उसे सक्रिय दिव्य आदान-प्रदान चाहिए। भगवान् के चरणकमलों के अनादर के कारण ज्ञानी फिर भौतिक संसार में गिर जाते हैं। परन्तु भक्त का यदि कभी पतन भी हो जाए, तो उसकी भक्ति का कभी नाश नहीं होता:
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते । (भ.गी. 6.41)
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् । (भ.गी. 2.40)
अब ऋषभदेव बताते हैं कि इस दिव्य तपस्या और मुक्ति का मार्ग क्या है:
"महत्सेवां द्वारमाहुर्विमुक्तेः..."
यदि संसार के जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति चाहते हो, तो महात्माओं की सेवा करो!
महात्मा कौन है?
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ (भ.गी. 9.13)
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥ (भ.गी. 7.19)
जो अनन्य भाव से सदैव भगवान् की सेवा में लगा है, वही महात्मा है। नरोत्तम दास ठाकुर गाते हैं:
'छोड़ि' वैष्णव-सेवा निस्तार पाछे केवा'—वैष्णव-सेवा के बिना इस भवसागर से कोई पार नहीं हो सकता। भगवान् का नाम है 'महत्पद' (महत्पदं पुण्योशोक मुरारेः), और जो उनके चरणकमलों के आश्रित हैं, वे महात्मा हैं।
और पतन का द्वार क्या है?
"तमोद्वारं योषितां सङ्गिसङ्गम्..."
अज्ञान और नरक का द्वार है—स्त्री-सङ्गियों का सङ्ग करना! जो लोग केवल इन्द्रियतृप्ति और काम-वासना में डूबे हैं, उनका सङ्ग करने से साधक का पतन निश्चित है:
सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते । (भ.गी. 2.62)
मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नाविविक्तासनो भवेत् ।
बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥ (श्रीमद्भागवतम् 9.19.17)
इन्द्रियाँ इतनी प्रबल हैं कि बड़े-बड़े विद्वानों को भी विचलित कर देती हैं, इसलिए कामी पुरुषों के सङ्ग से बहुत सावधान रहना चाहिए।
महात्माओं के क्या लक्षण हैं?
"महान्तस्ते समचित्ताः प्रशान्ता विमन्यवः सुहृदः साधवो ये ॥"
1. समचित्ताः (Equally disposed): वे समस्त जीवों को समभाव से देखते हैं। वे जानते हैं कि भगवद्भक्ति सबके लिए है—केवल भारत या हिन्दुओं के लिए नहीं:
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥ (भ.गी. 9.32)
भगवान् का सेवक सबको हरिभक्ति प्रदान करने का प्रयास करता है। श्रीचैतन्य महाप्रभु की आज्ञा है:
यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश ।
आमार आज्ञाय गुरु हञा तार' एइ देश ॥ (चै.च. मध्य 7.128)
तोता की तरह भगवान् श्रीकृष्ण के वचनों को बिना किसी मनगढ़न्त व्याख्या के ज्यों-का-त्यों प्रस्तुत करो।
2. प्रशान्ताः (Peaceful & undisturbed): वे हर परिस्थिति में शान्त रहते हैं। प्रचार-कार्य में हज़ारों कठिनाइयाँ और विरोध आते हैं, पर वे विचलित नहीं होते और निरन्तर भगवन्नाम का प्रचार करते हैं।
3. विमन्यवः (Free from anger): वे कभी क्रोधित नहीं होते। वे जानते हैं कि यह भौतिक संसार अज्ञान से भरा है।
जैसे श्री नित्यानन्द प्रभु को जगाई और मधाई ने मिट्टी का कलश मारकर लहुलुहान कर दिया, फिर भी नित्यानन्द प्रभु ने क्रोध नहीं किया, बल्कि उन्हें गले लगाकर प्रेम-भक्ति प्रदान की!
ईसा मसीह को जब क्रूस पर चढ़ाया गया, तो उन्होंने प्रार्थना की: "हे परमेश्वर! इन्हें क्षमा कर दीजिए, क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं।"
श्रील हरिदास ठाकुर को बाईस बाज़ारों में कोड़ों से पीटा गया, फिर भी वे अपने अत्याचारियों के कल्याण के लिए प्रार्थना करते रहे।
प्रह्लाद महाराज को उनके पिता हिरण्यकशिपु ने तरह-तरह से प्रताड़ित किया, पर जब भगवान् नृसिंहदेव ने हिरण्यकशिपु का वध करके प्रह्लाद से वर माँगने को कहा, तो प्रह्लाद ने अपने लिए कुछ न माँगकर अपने अत्याचारी पिता के उद्धार की प्रार्थना की! This is Vaishnava—विमन्यवः!
4. सुहृदः साधवः (Benevolent well-wishers):
तितिक्षवः कारुणिकाः सुहृदः सर्वदेहिनाम् ।
अजातशत्रवः शान्ताः साधवः साधुभूषणाः ॥ (श्रीमद्भागवतम् 3.25.21)
साधु का आभूषण है—सहनशीलता और समस्त जीवों पर करुणा।
ऐसे महात्माओं की शरण ग्रहण करना, उनकी सेवा करना और उनके पदचिह्नों पर चलना ही मनुष्य जीवन को सफल बनाने का एकमात्र उपाय है। बहुत-बहुत धन्यवाद!
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