श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  761224SB-BOMBAY_Hindi.MP3
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
श्रीमद् भागवतम 5.5.1
बॉम्बे, 24-दिसंबर-1976
 
 
 
श्रीऋषभदेव उवाच—
नायं देहो देहभाजां नृलोके
कष्टान् कामानर्हते विड्भुजां ये ।
तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं
शुद्ध्येद्यस्माद् ब्रह्मसौख्यं त्वनन्तम् ॥ (श्रीमद्भागवतम् 5.5.1)

यह उपदेश ऋषभदेव का है। जो सनातनी हैं, उनके लिए भी ऋषभदेव परम प्रमाण (authority) हैं और जैन लोग भी ऋषभदेव को अपना आदि तीर्थंकर मानते हैं। भगवान् सबके लिए हैं। भगवान् न तो हिन्दू हैं, न मुसलमान हैं, न जैन हैं। भगवान् तो भगवान् हैं! जैसे सोना होता है—सोना किसी हिन्दू के पास है तो 'हिन्दू सोना' नहीं हो जाता, मुसलमान के पास है तो 'मुसलमान सोना' नहीं हो जाता। इसी प्रकार भगवान् एक ही हैं—'एकमेवाद्वितीयम्'। यह हमारा भ्रम है कि यह 'हिन्दू धर्म' है, यह 'मुसलमान धर्म' है, यह 'ईसाई धर्म' है, यह 'जैन धर्म' है। धर्म तो एक ही होना चाहिए।

यमराज बताते हैं:
धर्मं तु साक्षाद् भगवत्प्रणीतम् । (श्रीमद्भागवतम् 6.3.19)
धर्म उसी को कहा जाता है जो भगवान् देते हैं, जो भगवान् बोलते हैं। जैसे कानून होता है—हमारा भारतवर्ष एक राज्य है; भारत का जो कानून है, वह सरकार ही बना सकती है। यह नहीं कि हिन्दू ने अपना अलग कानून बना लिया, मुसलमान ने अलग बना लिया, ईसाई ने अलग बना लिया। कानून तो वही माना जाएगा जो सरकार देती है। सड़क पर आप जाइए: "Keep to the left" या "Keep to the right"—वह मुसलमान को भी मानना पड़ेगा, हिन्दू को भी मानना पड़ेगा, ईसाई को भी मानना पड़ेगा, क्योंकि वह सरकार का कानून है। इसी प्रकार जो भगवान् बोलते हैं, वही धर्म है। This is the simplest definition of religion.

श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान् स्वयं आकर बताते हैं:
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । (भ.गी. 9.34)
उस भगवान् को चाहे आप 'कृष्ण' कहिए, चाहे 'अल्लाह' कहिए, चाहे 'क्राइस्ट' कहिए, आपका कर्तव्य क्या है? 'मन्मना भव मद्भक्तो'—सदैव भगवान् का स्मरण करना और उनका भक्त बन जाना।

श्रीचैतन्य महाप्रभु ने बताया है कि यह जो हम हरे कृष्ण महामन्त्र का आन्दोलन चला रहे हैं, महाप्रभु ऐसा नहीं कहते कि आप केवल 'कृष्ण' नाम ही बोलिए। आप भगवान् का कोई भी प्रामाणिक नाम लीजिए। यदि आप भगवान् को जानते हैं, तो उनके नाम को भी जानेंगे। यदि भगवान् से आपका परिचय ही नहीं है, तो किसका नाम लेंगे?
नाम्नामकारि बहुधा निजसर्वशक्ति-
स्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः ।
एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि
दुर्दैवमीदृशमिहाजनि नानुरागः ॥ (शिक्षाष्टक 2)
चैतन्य महाप्रभु कहते हैं: "हे भगवान्! आपके अनेक नाम हैं।" भगवान् असीम हैं, इसलिए उनके नाम भी अनन्त हैं। हमारे शास्त्रों में 'विष्णुसहस्रनाम' है।
रामादि-मूर्तिषु कलानियमेन तिष्ठन्
नानावतारमकरोद् भुवनेषु किन्तु ।
कृष्णः स्वयं समभवत् परमः पुमान् यो
गोविन्दमादिपुरुषं तमहमं भजामि ॥ (ब्रह्मसंहिता 5.39)
भगवान् के असंख्य अवतार हैं और असंख्य नाम हैं। कोई भी प्रामाणिक नाम हो, आप लीजिए।

कृष्ण नाम मुख्य नाम है। वेदों का वचन है कि भगवान् के लाखों-करोड़ों नाम हो सकते हैं, पर मुख्य नाम 'कृष्ण' है:
एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयं । (श्रीमद्भागवतम् 1.3.28)
इसलिए हम जो वैदिक सिद्धान्त मानने वाले हैं, कृष्ण नाम को प्रधान मानते हैं। यदि आप समझते हैं कि 'कृष्ण' हिन्दुओं का नाम है, तो आप भगवान् का जो भी प्रामाणिक नाम जानते हैं, वही लीजिए। हमारे प्रचार का विषय यही है—हरिनाम लीजिए!

परन्तु मुश्किल यह है कि आजकल की दुनिया न तो भगवान् को जानती है और न भगवान् के नाम को। जब भगवान् से परिचय ही नहीं है, तो नाम कैसे जानेंगे? नहीं तो भगवान् का कोई भी नाम आप लें, उसका फल मिलेगा। 'नाम्नामकारि बहुधा निजसर्वशक्तिः'—भगवान् के नाम में उनकी समस्त शक्तियाँ निहित हैं। जैसे भगवान् सर्वशक्तिमान् (Almighty) हैं, वैसे ही भगवान् का नाम भी सर्वशक्तिमान् है। They are absolute. There is no difference between the name and the person of the Supreme Personality of Godhead.

यदि हम निरन्तर भगवान् के नाम का जप-कीर्तन करेंगे, तो स्वाभाविक रूप से उनके भक्त बन जाएँगे। और यदि कोई भगवान् को निराकार बना दे, तो फिर नाम-रूप की बात ही समाप्त हो जाती है!

यहाँ ऋषभदेव, जो भगवान् के अवतार हैं, अपने पुत्रों को उपदेश दे रहे हैं। पहले बड़े-बड़े राजा लोग समय आने पर रिटायर (वानप्रस्थ/संन्यास) हो जाते थे। आजकल रिटायरमेंट का नाम ही नहीं है, जब तक कि गोली से न मार दिया जाए! पर रिटायर होना चाहिए। हमारी वैदिक वर्णाश्रम-व्यवस्था बहुत वैज्ञानिक है। कुछ समय ब्रह्मचारी (विद्यार्थी जीवन), फिर कुछ समय गृहस्थ। यह नहीं कि जीवनभर गृहस्थी में ही फँसे रहें। पच्चीस से पचास वर्ष तक, जिस समय इन्द्रियाँ बहुत प्रबल होती हैं, गृहस्थ आश्रम केवल इन्द्रियभोग के लिए एक नियमित छूट (concession/license) है।

पहले ब्रह्मचारी को गुरुकुल में सिखाया जाता था:
ब्रह्मचारी गुरु-कुले वसन् दान्तो गुरोर्हितम् । (श्रीमद्भागवतम् 7.12.1)
उसे इन्द्रिय-संयम (शम-दम) सिखाया जाता था। उसे सिखाया जाता था—घर-घर जाओ और बोलो: "माता जी! भिक्षा दीजिए।" वह हर पराई स्त्री को 'माता जी' कहना सीखता था। चाणक्य पण्डित का भी यही उपदेश है:
मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत् ।
आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः ॥
पण्डित कौन है? जो पराई स्त्री को माता के समान देखता है, दूसरे के धन को रास्ते के कूड़े-कंकड़ (मिट्टी के ढेले) के समान समझता है, और समस्त जीवों को अपनी आत्मा के समान देखता है। यानी कम से कम इतना तो सीखो कि जब कोई तुम्हारा गला काटने आए तो तुम्हें कष्ट होता है, तो तुम दूसरों का गला क्यों काटते हो? क्यों slaughterhouse बनाते हो? जो इन तीन बातों को जानता है, वही पण्डित है। केवल बी.ए., एम.ए. की डिग्री ले लेने से कोई पण्डित नहीं होता। बी.ए., एम.ए. पास करके पराई स्त्री पर कुदृष्टि रखे, मांसाहार करे और मौका मिलते ही चोरी करे—यह पण्डित नहीं, मूर्ख है!

इसलिए ब्रह्मचर्य में शिक्षा दी जाती है कि किस प्रकार इन्द्रिय-संयम करना है और केवल गुरु के हित के लिए जीना है (गुरोर्हितम्)। यदि वह जीवनभर नैष्ठिक ब्रह्मचारी नहीं रह सकता, तो गुरु उसे विवाह करके गृहस्थ बनने की अनुमति देते हैं। भगवान् गीता में कहते हैं: "धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ" (भ.गी. 7.11)—धर्म के अनुकूल जो काम है, वह मैं हूँ। काम-जीवन बुरा नहीं है यदि वह शास्त्र के नियमों के अनुसार हो। फिर पचास वर्ष की आयु के बाद वानप्रस्थ और संन्यास लेना होता था।

ऋषभदेव सम्पूर्ण पृथ्वी के सम्राट थे। वे अपने सौ पुत्रों को राज्य त्यागने से पहले यही उपदेश दे रहे हैं:
"नायं देहो देहभाजां नृलोके कष्टान् कामानर्हते विड्भुजां ये..."
बेटा! यह जो मनुष्य शरीर मिला है, यह साधारण शरीर नहीं है। चौरासी लाख योनियों में भटकते हुए, तिरासी लाख योनियाँ भुगतने के बाद यह दुर्लभ मनुष्य शरीर प्राप्त होता है।
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ (भ.गी. 2.13)
भगवान् पहले ही सिखाते हैं कि देहान्तर होता है। नास्तिकों की तरह ऐसा नहीं है कि शरीर जलकर राख हो गया तो सब ख़त्म हो गया: 'भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः'। मूर्ख लोग कहते हैं कि मौज-मस्ती करो, पाप-पुण्य कुछ नहीं होता। पर शास्त्र बताते हैं कि आत्मा अत्यन्त सूक्ष्म है:
बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च ।
भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद् 5.9)
बाल के अग्रभाग के दस हज़ारवें हिस्से के बराबर आत्मा का परिमाण है। वह मन, बुद्धि और अहङ्कार रूपी सूक्ष्म शरीर के साथ एक योनि से दूसरी योनि के गर्भ में प्रवेश करता है। इसे 'मृत्यु-संसार' कहते हैं:
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥ (भ.गी. 9.3)
यदि इस मानव जीवन में भगवान् के धाम जाने का साधन नहीं किया, तो मृत्यु के बाद फिर इसी मृत्यु-संसार के चक्र में भटकना पड़ेगा।

भगवान् क्यों आते हैं?
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ (भ.गी. 4.7)
जब लोग भगवान् के वचनों को भूल जाते हैं और मनमाना आचरण करने लगते हैं, वही धर्म की ग्लानि है। तब भगवान् स्वयं आते हैं, उनके अवतार आते हैं, उनके पार्षद और शुद्ध भक्त आते हैं और जीवों को समझाते हैं कि तुम प्रकृति से स्वतंत्र नहीं हो!
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥ (भ.गी. 3.27)
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ (भ.गी. 7.14)
प्रकृति के नियमों से हम पूरी तरह बँधे हैं। जैसे ही हम भगवान् के चरणों में शरणागत हो जाते हैं, माया का बन्धन कट जाता है।

ऋषभदेव समझा रहे हैं:
"नायं देहो देहभाजां नृलोके कष्टान् कामानर्हते विड्भुजां ये..."
मेरे पुत्रों! यह मनुष्य शरीर केवल कठोर परिश्रम करके इन्द्रियतृप्ति करने के लिए नहीं है, जैसी इन्द्रियतृप्ति विष्ठा खाने वाले सूअरों को भी सुलभ है।
शास्त्रों में चार प्रकार के पशु-तुल्य मनुष्यों का वर्णन है:
श्वविड्वराहोष्ट्रखरैः संस्तुतः पुरुषः पशुः ।
न यत्कर्णपथोपेतो जातु नाम गदाग्रजः ॥ (श्रीमद्भागवतम् 2.3.19)
श्वा (कुत्ता), विड्वराह (सूअर), उष्ट्र (ऊँट) और खर (गधा)। दो पैर का मनुष्य होकर भी यदि कोई केवल पेट और जननेन्द्रिय के लिए जीता है, तो वह इन्हीं पशुओं के समान है। विशेष करके सूअर—दिन-रात घूमता है कि कहाँ मैला मिलेगा, और खाकर मोटा-ताज़ा होकर बिना किसी विचार के इन्द्रियतृप्ति में लग जाता है। तो ऋषभदेव सावधान करते हैं कि यह मनुष्य शरीर सूअर की तरह जीवन बिताने के लिए नहीं है! केवल कठोर परिश्रम करना, कुछ भी अभक्ष्य खा लेना और इन्द्रियभोग में लगे रहना—This is not human life!

आजकल की शिक्षा भी ऐसी ही हो गई है। माफ़ कीजिए, आधुनिक शिक्षा केवल कुत्ता बनाने के लिए है! कुत्ता क्यों? आप एम.ए., पी.एच.डी. पास कर लीजिए, पर जब तक कोई मालिक न मिले, नौकरी न मिले, तब तक सड़क पर भटकना पड़ता है—"No vacancy"! अभी अख़बार में आया था कि पाँच सौ पदों के लिए ढाई लाख आवेदन आए! What is the value of this education?

वैदिक समाज में शिक्षित किसे कहा जाता था? ब्राह्मण को। ब्राह्मण कभी किसी की नौकरी नहीं करता था। क्षत्रिय कभी किसी का नौकर नहीं बनता था। वैश्य भी कभी किसी की नौकरी नहीं करता था। केवल शूद्र ही दूसरों की सेवा करता था:
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् । (भ.गी. 18.44)
इसलिए कहा गया है: 'कलौ शूद्रसम्भवाः'—कलयुग में प्रायः सभी शूद्र हैं।

परन्तु स्वस्थ समाज के लिए चारों वर्ण अनिवार्य हैं:
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः । (भ.गी. 4.13)
ब्राह्मण समाज का सिर (brain) है, क्षत्रिय समाज की भुजाएँ (defense) हैं, वैश्य उदर (अन्न-उत्पादन और वाणिज्य) हैं, और शूद्र पाँव हैं। शरीर में जैसे सिर, हाथ, पेट और पाँव सबकी आवश्यकता होती है, वैसे ही समाज में भी सुव्यवस्था चाहिए।

मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य है—इस मृत्यु-संसार से मुक्त होना।
तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं शुद्ध्येत् ।
दिव्य तपस्या के द्वारा अपनी सत्ता को शुद्ध करो, जिससे अनन्त ब्रह्म-सुख प्राप्त हो सके। यदि तपस्या नहीं करेंगे, तो फिर इसी संसार-चक्र में भटकना पड़ेगा:
ऐछे ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोन भाग्यवान् जीव ।
गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाय भक्ति-लता-बीज ॥ (चै.च. मध्य 19.151)
कभी ऊँच, कभी नीच योनि में भटकते रहना पड़ेगा।

वैज्ञानिक चाहे कितनी भी भौतिक प्रगति कर लें, पर वे इन चार वास्तविक दुःखों का समाधान कभी नहीं कर सकते:
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् । (भ.गी. 13.9)
जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और बीमारी—इनका एकमात्र समाधान है: 'तपो दिव्यम्'—भगवान् की प्राप्ति के लिए दिव्य तपस्या!

परन्तु कलयुग में कठिन तपस्या करना सम्भव नहीं है:
प्रायेणाल्पायुषः सभ्य कलावस्मिन् युगे जनाः ।
मन्दाः सुमन्दमतयो मन्दभाग्या ह्युपद्रुताः ॥ (श्रीमद्भागवतम् 1.1.10)
कलयुग के जीव अल्पायु, मन्दमति, मन्दभाग्य और उपद्रवों से घिरे हुए हैं। वे न तो जङ्गल में जा सकते हैं, न हिमालय पर घोर तपस्या कर सकते हैं। इसलिए श्रीचैतन्य महाप्रभु ने कलयुग के लिए एकमात्र सुगम तपस्या प्रदान की है:
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नाम केवलम् ।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥ (बृहन्नारदीय पुराण)

कलयुग में केवल हरिनाम संकीर्तन ही परम तपस्या है। भगवान् का नाम जपिए! इसमें न कोई खर्च है, न कोई कठिनाई। चाहे मन्दिर में हों या घर में, ब्रह्मचारी हों या गृहस्थ, किसी भी वर्ण या आश्रम के हों—निरन्तर भगवान् के नाम का कीर्तन कीजिए:
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥
यही जीवन की परम सिद्धि है। बहुत-बहुत धन्यवाद!
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥