श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  751114SB-BOMBAY--Hindi.MP3
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
श्रीमद् भागवतम 5.5.1
बॉम्बे, 14-नवंबर-1975
 
 
 
ॐ अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
श्रीचैतन्यमनोऽभीष्टं स्थापितं येन भूतले ।
स्वयं रूपः कदा मह्यं ददाति स्वपदाम्बुजम् ॥
हे कृष्ण करुणासिन्धो दीनबन्धो जगत्पते ।
गोपेश गोपिकाकान्त राधाकान्त नमोऽस्तु ते ॥
तप्तकाञ्चनगौराङ्गि राधे वृन्दावनेश्वरि ।
वृषभानुसुते देवि प्रणमामि हरिप्रिये ॥
श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु-नित्यानन्द ।
श्रीअद्वैत गदाधर श्रीवासादि-गौरभक्तवृन्द ॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥

ऋषभ उवाच—
नायं देहो देहभाजां नृलोके
कष्टान् कामानर्हते विड्भुजां ये ।
तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं
शुद्ध्येद्यस्माद् ब्रह्मसौख्यं त्वनन्तम् ॥ (श्रीमद्भागवतम् 5.5.1)

कल सदाजीवतलाल जी से बातचीत हुई थी कि ऋषभदेव ने जो उपदेश दिया था अपने पुत्रों को रिटायर करने के पहले। पहले सब बड़े-बड़े राजा लोग रिटायर करते थे। यह वैदिक सभ्यता है। यह नहीं कि जब तक गोली से न मार दिया जाए, तब तक वे रिटायर नहीं करेंगे! यह बात नहीं है। एक समय है रिटायर करने का—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास।

यह जो 'हिन्दू धर्म' के नाम से चलता है, यह 'हिन्दू' शब्द कोई वैदिक भाषा में है नहीं। हमारे शास्त्र में जो है, वह है 'वर्णाश्रम धर्म'—चार वर्ण और चार आश्रम: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र; ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास। वर्णाश्रम धर्म का पालन करने से ही मानव जीवन सफल होता है। यही वैदिक सिद्धान्त है:
वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान् ।
विष्णुराराध्यते पन्था नान्यत्तत्तोषकारणम् ॥ (विष्णु पुराण 3.8.9)
यानी मानव समाज की सभ्यता शुरू ही वर्णाश्रम से होती है। जब तक वर्णाश्रम धर्म का पालन नहीं करेगा, तब तक वह समाज पशु-समाज है, कोई मनुष्य-समाज नहीं माना जाता।

भगवान् श्रीमद् भगवद्गीता में भी बताते हैं:
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः । (भ.गी. 4.13)
भगवान् ने जो चार वर्ण बनाए हैं—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—वे गुण और कर्म के अनुसार हैं, जन्म के अनुसार नहीं। उसको आप कैसे मिटा देंगे? उसको मिटाने से फिर मनुष्य-समाज ही नहीं रहेगा, पशु-समाज हो जाएगा।

महाराज ऋषभदेव, जिनको भागवत में तो मानते ही हैं, कल सुना कि जैन लोग भी ऋषभदेव को आदि तीर्थंकर मानते हैं। तो चाहे जैन हों, हिन्दू हों, मुसलमान हों या क्रिश्चियन हों, भगवद्-उपदेश सबके लिए है। जैसे भगवान् श्रीमद् भगवद्गीता में कहते हैं: "अन्नाद् भवन्ति भूतानि"—अन्न पैदा करने से चाहे जानवर हों चाहे मनुष्य हों, सब लोग सुखी हो जाएँगे। तो यह जो अन्न उत्पादन करना और सबको सुखी बनाना है, यह हिन्दुओं के लिए भी है, मुसलमानों के लिए भी है, जैनों के लिए भी है—सबके लिए है।

भगवान् तो एक ही हैं, और उनका वचन भी सबके लिए है। यह नहीं है कि केवल हिन्दुओं के लिए है और मुसलमानों के लिए नहीं है। मुसलमान का भगवान् और हिन्दू का भगवान् अलग-अलग नहीं होता। भगवान् एक ही हैं—'एकमेवाद्वितीयम्'। जैसे सोना है; सोना हिन्दू के पास रहने से क्या 'हिन्दू सोना' हो जाएगा? मुसलमान के पास रहने से क्या 'मुसलमान सोना' हो जाएगा? सोना तो सोना ही है, चाहे वह हिन्दू के पास रहे, मुसलमान के पास रहे या जैन के पास रहे।

इसी प्रकार धर्म जो है:
धर्मं तु साक्षाद् भगवत्प्रणीतम् । (श्रीमद्भागवतम् 6.3.19)
धर्म कोई sectarian नहीं हो सकता। जैसे राजा का कानून होता है—वह क्या केवल हिन्दू के लिए होता है? वह सबके लिए होता है। इसी प्रकार धर्म का जो कानून भगवान् बनाते हैं, वह सबके लिए है। कोई sectarian नहीं, देश-काल-पात्र से परे सबके लिए है।

तो यहाँ ऋषभदेव, जो कि भगवान् के अवतार हैं, अपने पुत्रों को शिक्षा दे रहे हैं:
"बेटा! नायं देहो देहभाजां नृलोके कष्टान् कामानर्हते विड्भुजां ये..."
'पुत्रका!' यह जो शरीर है—'this body'—मनुष्य शरीर। शरीर तो सभी का होता है—कुत्ते का भी होता है, सूअर का भी होता है, गधे का भी होता है और मनुष्य का भी होता है। बाकी विशेष करके कहते हैं कि 'देहभाजां नृलोके'—मनुष्य समाज में जो शरीर मिला है, वह 'कष्टान् कामान् न अर्हते विड्भुजां ये'। बहुत कष्ट करके शरीर की जो शारीरिक माँग (आहार, निद्रा, भय, मैथुन) है, उसे पूरा करने के लिए यह मनुष्य शरीर नहीं है।

चार चीज़ें शरीर की आवश्यकताएँ हैं: कुछ खाने के लिए चाहिए (आहार), सोने के लिए कोई जगह होनी चाहिए—apartment (निद्रा), भय से बचने के लिए कुछ बन्दोबस्त होना चाहिए—defense (भय), और इन्द्रियतृप्ति—विशेष करके यौन-सम्बन्ध (मैथुन)। ये चार चीज़ें कुत्ते के लिए भी आवश्यक हैं और मनुष्य के लिए भी।
आहार-निद्रा-भय-मैथुनं च
सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् ।
धर्मो हि तेषामधिको विशेषो
धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥

परन्तु कुछ भेद तो होना चाहिए मनुष्य के शरीर और कुत्ते के शरीर में! तो वही बता रहे हैं: 'नायं देहो देहभाजां नृलोके कष्टान् कामानर्हते विड्भुजां ये'। सूअर-कुत्ते दिनभर कठिन परिश्रम करके अपनी शारीरिक आवश्यकताओं को मिटाते हैं; मनुष्य शरीर में ऐसा नहीं होना चाहिए। मनुष्य शरीर में यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि कुछ उपार्जन करके स्थिर होकर शान्ति से रहे। कुत्ते, गधे और सूअर के शरीर में यह सम्भव नहीं है; उन्हें तो जब तक जीवन रहेगा, दिन-रात कठिन परिश्रम करना ही पड़ेगा तब जाकर पेट भरेगा।

इसलिए मना करते हैं कि यह विशेष मनुष्य शरीर इतना घोर परिश्रम करके केवल शरीर की वासनाओं को तृप्त करने के लिए नहीं है। वह तो सूअर-गधों का काम है। तो मनुष्य के लिए क्या उचित है? बताते हैं:
"तपो दिव्यं पुत्रका..."
मनुष्य शरीर तपस्या के लिए है। केवल दिन-रात night shift, day shift परिश्रम करके, जीवन के अन्त तक गधे की तरह खटते रहना उचित नहीं है। मनुष्य जीवन में कुछ समय केवल तपस्या के लिए सुरक्षित रखना चाहिए। इसीलिए मनुष्य समाज में वर्णाश्रम धर्म का विधान है—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास। कम से कम शरीर छोड़ने से पहले वानप्रस्थ और संन्यास तो ग्रहण करे!

"तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं शुद्ध्येत्..."
तपस्या की क्या ज़रूरत है? क्यों तपस्या करें? 'येन सत्त्वं शुद्ध्येत्'—जिससे तुम्हारी सत्ता (existence, identity) शुद्ध हो जाए। शरीर नष्ट हो जाने से जीव नष्ट नहीं होता: 'न हन्यते हन्यमाने शरीरे' (भ.गी. 2.20)।
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ (भ.गी. 2.13)
यह शरीर छूटने के बाद देहान्तर-प्राप्ति होगी—दूसरा शरीर मिलेगा। जैसे बालक से किशोर, किशोर से युवा, युवा से वृद्ध, वैसे ही वृद्धावस्था के बाद मृत्यु और फिर नया शरीर। इसलिए आगे जाकर हमें कैसा शरीर मिलेगा, उसके लिए तपस्या करनी चाहिए। अन्यथा वही:
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् । (भ.गी. 13.9)
एक शरीर छोड़ो, फिर दूसरा ग्रहण करो, फिर कर्म-बन्धन भोगो, फिर मरो! यह चक्र चलता रहेगा। यह शिक्षा पहले होनी चाहिए कि हमें शरीर छोड़ना है, और छोड़ कर क्या शरीर मिलेगा, उस विषय में तैयार होना है। यह यदि नहीं करते हैं, तो यह मनुष्य जीवन हम व्यर्थ ही गँवा रहे हैं। यह आधुनिक सभ्यता ठीक नहीं है।

ऋषभदेव अपने पुत्रों को उपदेश दे रहे हैं: "तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं शुद्ध्येत्..." Purify your existence! क्यों शुद्ध करें? "यस्माद् ब्रह्मसौख्यं त्वनन्तम्।" हम सभी सुख चाहते हैं। यह जो शरीर लेकर हम struggle for existence कर रहे हैं, उसका उद्देश्य क्या है? सुख! लेकिन जहाँ बार-बार शरीर छोड़ना पड़ता है, वहाँ सुख कहाँ है? हम माया के वशीभूत होकर क्षणिक इन्द्रियभोग को ही सुख मान लेते हैं, पर शास्त्र कहते हैं कि यह वास्तविक सुख नहीं है। सुख चाहिए तो पहले जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि पर विजय प्राप्त करो।

ऋषभदेव का उपदेश है कि शरीर तो छोड़ना ही पड़ेगा, पर शरीर छोड़ने से पहले अपनी सत्ता को शुद्ध कर लेना चाहिए। जब सत्ता शुद्ध होगी, तभी अनन्त ब्रह्म-सुख प्राप्त होगा। भगवान् का रूप क्या है?
ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः ।
अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम् ॥ (ब्रह्मसंहिता 5.1)
भगवान् का स्वरूप सच्चिदानन्द-विग्रह है। वह हमारी तरह नाशवान् शरीर नहीं है। मूर्ख लोग सोचते हैं कि कृष्ण भी हमारे जैसे ही एक साधारण मनुष्य हैं:
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥ (भ.गी. 9.11)
भगवान् कहते हैं: 'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः' (भ.गी. 15.7)—सारे जीव मेरे ही सनातन अंश हैं। तो स्वरूपतः जीव भी सच्चिदानन्द है। 'सत्' का अर्थ है शाश्वत, eternal—जो कभी नष्ट नहीं होता। 'चित्' का अर्थ है ज्ञानमय, और 'आनन्द' का अर्थ है आनन्दमय। यह हमारा वास्तविक स्वरूप है।

मुक्ति का अर्थ क्या है?
मुक्तिर्हित्वाऽन्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः । (श्रीमद्भागवतम् 2.10.6)
मुक्ति का अर्थ है कि यह जो हमारा 'अन्यथा रूप' है—जो नाशवान्, अज्ञानमय और निरानन्द है—इसे त्यागकर अपने नित्य सच्चिदानन्द स्वरूप में स्थित होना। इसलिए तपस्या करनी चाहिए।

वास्तविक दुःख क्या है? बार-बार जन्म लेना, बार-बार मरना, बुढ़ापा, रोग और त्रिताप (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक)। चूँकि समाज में वर्णाश्रम का विचार नहीं रहा, सब नष्ट कर दिया, इसलिए लोग वास्तविक दुःख को समझते ही नहीं। वे केवल तात्कालिक क्षुधा मिटाने के लिए पशुओं की तरह दौड़ते हैं। सूअर देखता है कि विष्ठा कहाँ मिलेगी, और मनुष्य देखता है कि होटल-रेस्टोरेंट कहाँ है—बात एक ही है!

शास्त्र कहते हैं:
तस्यैव हेतोः प्रयतेत कोविदो
न लभ्यते यद्भ्रमतामुपर्यधः ।
तल्लभ्यते दुःखवदन्यतः सुखं
कालेन सर्वत्र गभीररंहसा ॥ (श्रीमद्भागवतम् 1.5.18)
खाने-पीने की व्यवस्था तो भगवान् ने सबके लिए कर रखी है। चौरासी लाख योनियों में अस्सी लाख तो पशु-पक्षी, जलचर और वृक्ष हैं; वे कोई नौकरी या बिज़नेस नहीं करते, फिर भी भगवान् हाथी को मण-भर अन्न देते हैं और चींटी को भी कण देते हैं। तो हमें क्यों नहीं देंगे? यह जो आहार, निद्रा, भय, मैथुन है, वह तो पूर्वकर्मानुसार हर शरीर में निश्चित है। हमें उस चीज़ के लिए प्रयत्न करना चाहिए जो चौरासी लाख योनियों में भटकते हुए कभी नहीं मिली—भगवान् के साथ अपने शाश्वत सम्बन्ध की पुनर्स्थापना!

यदि भगवान् के साथ सम्बन्ध पुनः स्थापित हो गया:
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन । (भ.गी. 4.9)
कृष्णभावनामृत आन्दोलन यही बात समझा रहा है। हम यह नहीं कहते कि शरीर-यात्रा के सारे कर्म छोड़-छाड़ कर बैठ जाओ। नहीं, मुख्य उद्देश्य को मत भूलो!
कृष्ण भुलिया जीव भोग वाञ्छा करे ।
पाशते माया तारे झापटिया धरे ॥ (प्रेमा-विवर्त)
जब जीव कृष्ण को भूलकर संसार को स्वतंत्र रूप से भोगना चाहता है, उसी का नाम माया है। भगवान् को भूल जाना ही माया है। माया से छूटने का उपाय क्या है?
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते । (भ.गी. 7.14)
केवल भगवान् की शरण ले लो, माया तुरन्त भाग जाएगी।

इसीलिए भगवान् अपना वैकुण्ठ और गोलोक वृन्दावन छोड़कर यहाँ अवतरित होते हैं:
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । (भ.गी. 4.7)
धर्म की ग्लानि क्या है? भगवान् को न मानना, नास्तिकता। और धर्म क्या है?
धर्मं तु साक्षाद् भगवत्प्रणीतम् । (श्रीमद्भागवतम् 6.3.19)
भगवान् जो आज्ञा देते हैं, वही धर्म है। भगवान् कहते हैं: 'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज' (भ.गी. 18.66)। भगवान् कोई साम्प्रदायिक हिन्दू, मुस्लिम या ईसाई धर्म सिखाने नहीं आते; वे केवल शरणागति का परम धर्म सिखाने आते हैं।

और भगवद्भक्त इसी बात का प्रचार करते हैं। वे कोई नया मनगढ़न्त धर्म (manufactured religion) नहीं बनाते।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । (भ.गी. 4.2)
भगवान् ने जो कहा, वही ब्रह्मा जी ने सुना, ब्रह्मा जी से नारद जी ने, नारद जी से व्यासदेव ने, और व्यासदेव की परम्परा में मध्वाचार्य, श्रीचैतन्य महाप्रभु आदि आचार्यों ने उसी को ज्यों-का-त्यों प्रस्तुत किया। We don't manufacture. भगवान् कहते हैं: 'मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु'। हम भी सबको यही कहते हैं कि सदैव भगवान् का चिन्तन करो:
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् ।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥ (श्रीमद्भागवतम् 7.5.23)
हम कोई झूठी बात नहीं बनाते कि 'तुम भगवान् हो, मैं भगवान् हूँ।' भगवान् कृष्ण कहते हैं: 'मेरा चिन्तन करो', और हम कहते हैं: 'भगवान् कृष्ण का चिन्तन करो।' इसी का नाम परम्परा है।

श्रीचैतन्य महाप्रभु का यही मिशन है:
यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश ।
आमार आज्ञाय गुरु हञा तार' एइ देश ॥ (चै.च. मध्य 7.128)
महाप्रभु कहते हैं कि मेरी आज्ञा से तुम सब गुरु बन जाओ। गुरु कैसे बनोगे? कोई बहुत बड़ा पण्डित बनने की ज़रूरत नहीं है। जिससे भी मिलो, उसे केवल वही बताओ जो भगवान् श्रीकृष्ण ने श्रीमद् भगवद्गीता में कहा है। बस, तुम गुरु बन गए! यदि कोई मनगढ़न्त कल्पना न करे, तो गुरु बनना बिल्कुल सहज है।

भगवान् कहते हैं:
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥ (भ.गी. 10.8)
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः । (भ.गी. 7.19)
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
अनेक जन्मों के बाद जब बुद्धि ठीक होती है, तब समझ में आता है कि वासुदेव ही सब कुछ हैं।
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय । (भ.गी. 7.7)
वेदान्त-सूत्र कहता है: 'जन्माद्यस्य यतः'। और श्रीमद्भागवतम् का आरम्भ होता है: 'जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतः... सत्यं परं धीमहि'।

परन्तु लोग भगवान् को भूलकर केवल बाहरी व्यवस्था करने में लगे हैं:
न ते विदुः स्वार्थगतिं हि विष्णुं
दुराशया ये बहिरर्थमानिनः ।
अन्धा यथान्धैरुपनीयमाना-
स्तेऽपीशतन्त्र्यामुरुदाम्नि बद्धाः ॥ (श्रीमद्भागवतम् 7.5.31)
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥ (भ.गी. 3.27)
प्रकृति के नियमों (nature's laws) से सबके हाथ-पैर बँधे हैं। कोई एक सेकेण्ड भी प्रकृति के नियम से बाहर नहीं जा सकता। जब प्रकृति कहेगी—'आज तुम्हारी मृत्यु है', तो दुनिया का कोई डॉक्टर या वैज्ञानिक एक मिनट भी बचा नहीं सकता!
मृत्युः सर्वहरश्चाहम् । (भ.गी. 10.34)

इसलिए ऋषभदेव कहते हैं कि यह मनुष्य जीवन कुत्तों और सूअरों की तरह दिनभर परिश्रम करके केवल इन्द्रियतृप्ति करने के लिए नहीं है। मनुष्य जीवन का कर्तव्य है—तपस्या!
तपस्या का अर्थ क्या है? जो चीज़ हमें पसन्द हो, उसे भगवान् के लिए छोड़ देना। यदि कोई बीड़ी-सिगरेट पीता है और उससे कहें कि इसे छोड़ दो, तो छोड़ने में थोड़ा कष्ट ज़रूर होगा; उस कष्ट को सहन करना ही तपस्या है। यदि कोई शराब पीता है और भगवान् के लिए वह उसे छोड़ देता है, तो जो तकलीफ़ होती है उसे सहन करना ही तपस्या है।
"तपो दिव्यं पुत्रका..."
'दिव्यम्'—दिव्य तपस्या, भगवान् के लिए तपस्या करो!

इसीलिए यूरोप-अमेरिका में जहाँ हम प्रचार करते हैं, वहाँ लोगों को चार बातें छोड़ने को कहते हैं:
1. अवैध स्त्री-सङ्ग (No illicit sex): अपनी विवाहित पत्नी के अतिरिक्त अन्य प्रत्येक स्त्री को माता के समान देखना चाहिए। यह तो साधारण चाणक्य पण्डित का भी उपदेश है:
मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत् ।
आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः ॥
पण्डित कौन है? एम.ए., बी.ए., पी.एच.डी. डिग्री लेने वाला नहीं; जो पराई स्त्री को माता के समान देखता है, दूसरे के धन को मिट्टी के ढेले के समान समझता है, और सब जीवों को अपनी आत्मा के समान देखता है, वही पण्डित है!

भगवान् भी गीता में कहते हैं: "धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ" (भ.गी. 7.11)। केवल धार्मिक सन्तानोत्पत्ति के लिए अपनी विवाहित पत्नी का सङ्ग धर्मसम्मत है, इसके अतिरिक्त सब अवैध स्त्री-सङ्ग (illicit sex) है।
2. मांसाहार त्याग (No meat-eating): हम मनुष्य हैं। भगवान् ने हमारे लिए फल, फूल, अनाज, सब्जियाँ, दूध और दूध की अनगिनत वस्तुएँ बनाई हैं। यह सब छोड़कर बेज़ुबान जानवरों का मांस खाना घोर पाप है।
3. नशा त्याग (No intoxication): शराब, गाँजा, बीड़ी, सिगरेट, चाय और पान का भी त्याग।
4. द्यूतक्रीड़ा/जुआ त्याग (No gambling)।

यह चार नियम हमने उन पाश्चात्य नवयुवकों से छुड़ा दिए, जिनका यह दैनिक जीवन था। उन्होंने भगवान् के लिए इन आदतों को छोड़ दिया और इस तपस्या को स्वीकार किया। इसके लिए वन-जङ्गल में जाने की आवश्यकता नहीं है; बस इन चार पाप-कर्मों का त्याग करो, हरिनाम का जप करो और जीवन को पवित्र बनाओ। यही ऋषभदेव की शिक्षा का सार है। हरे कृष्ण!
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥