भगवान ऋषभदेव अपने सौ पुत्रों को उपदेश दे रहे हैं। उनके सौ पुत्रों में सबसे ज्येष्ठ पुत्र महाराज भरत थे, जिनके नाम से हमारे इस पूरे भू-मंडल का नाम 'भारतवर्ष' पड़ा है। केवल यह देश ही नहीं, पहले समस्त पृथ्वी का नाम भारतवर्ष था।
तो ऋषभदेव जी का उपदेश है: "नायं देहो देहभाजां नृलोके"—मनुष्य समाज में यह जो देह मिली है... देह तो सबको मिली है—कुत्ते को भी मिली है, भेड़ को भी मिली है, सूअर को भी मिली है, देवता को भी मिली है। चौरासी लाख योनियों में जीव निरंतर भटक रहा है:
ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोन भाग्यवान् जीव ।
गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाय भक्तिलता-बीज ॥
(चैतन्य-चरितामृत, मध्य 19.151)
एक शरीर को छोड़कर अपने कर्मों के अनुसार जीव दूसरा शरीर ग्रहण करता है: "तथा देहान्तरप्राप्तिः"। जैसे इसी जीवन में हमारा देहान्तर होता है—यह जो छोटे बालक हैं, इनका देहान्तर होगा। यह बालक का शरीर नहीं रहेगा, युवा का शरीर आएगा; युवा का शरीर नहीं रहेगा, वृद्ध का शरीर आएगा; और अंत में यह वृद्ध शरीर भी छूट जाएगा और एक नया शरीर मिलेगा।
यदि कोई युवक कहे कि "मैं कभी बूढ़ा नहीं बनूँगा", तो क्या यह संभव है? उसे बूढ़ा होना ही पड़ेगा। यहाँ हमारी कोई स्वतंत्रता नहीं है कि हम सदा युवा बने रहें। भगवान ने श्रीमद् भगवद्गीता में बड़ा सुंदर अकाट्य उदाहरण दिया है:
देहिनोऽस्मिन यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 2.13)
इसमें किसी व्यर्थ के तर्क की कोई गुंजाइश नहीं है। जैसे बालक से वृद्ध बनने में देह बदलती है, वैसे ही मृत्यु के समय देहान्तर होता है।
कोई अज्ञानी कह सकता है कि "बालक से युवा बनने में तो शरीर सामने रहता है, परंतु मृत्यु के बाद तो यह शरीर भस्म कर दिया जाता है, तो फिर दूसरा शरीर कैसे मिलेगा?" यह मूर्खतापूर्ण तर्क है। सूक्ष्म शरीर (मन, बुद्धि, अहंकार) आत्मा को एक स्थूल शरीर से दूसरे स्थूल शरीर में ले जाता है।
जैसे रात में हम पलंग पर सोए हैं, और स्वप्न में हमारा सूक्ष्म शरीर जंगल में चला जाता है। वहाँ बाघ सामने आ गया, तो हम भय से चिल्लाने लगते हैं। पास में सोया हुआ व्यक्ति हमें जगाकर कहता है: "अरे, क्यों चिल्ला रहे हो? यहाँ कोई बाघ नहीं है, तुम तो पलंग पर लेटे हो!" परंतु स्वप्न में हमारा सूक्ष्म शरीर वहाँ कष्ट भोग रहा था। उसी प्रकार मृत्यु के समय यह सूक्ष्म शरीर आत्मा को अगले शरीर में ले जाता है:
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 15.10)
जो धीर और ज्ञानी हैं, वे ज्ञान-चक्षु और शास्त्र-चक्षु से इसे स्पष्ट देखते हैं। मूर्ख व्यक्ति सत्संग नहीं करता, साधुओं की बात नहीं सुनता, अपने मनमाने ढंग से सोचता है, इसलिए भटकता रहता है।
भगवान कहते हैं: "न हन्यते हन्यमाने शरीरे"—शरीर के नष्ट हो जाने पर भी आत्मा कभी नष्ट नहीं होती। आत्मा नित्य और शाश्वत है।
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 14.18)
जो सात्विक जीवन जीते हैं, वे ऊर्ध्व लोकों (स्वर्ग आदि) में जाते हैं। जो राजसिक हैं, वे इसी मृत्यु-लोक में रहते हैं। और जो जघन्य तामसिक वृत्तियों—माँसाहार, मद्यपान, जुआ आदि पाप-कर्मों में लिप्त रहते हैं, वे अधोगति को प्राप्त होकर नरक और पशु-पक्षियों की नीच योनियों में जाते हैं।
शास्त्र और धर्म मनुष्य के लिए बने हैं, पशुओं के लिए नहीं। कुत्ता केवल भौंकना और भोग करना जानता है। यदि मनुष्य भी केवल खा-पीकर, संतान पैदा करके मर जाए, तो वह 'गोखर'—गाय और गधे के समान ही है। मनुष्य जीवन इसलिए मिला है ताकि वह वेदों, उपनिषदों, श्रीमद् भगवद्गीता और श्रीमद्भागवतम् के दिव्य विज्ञान को समझे।
आजकल स्कूल-कॉलेजों में क्या सिखाया जाता है? वहाँ वास्तविक आत्म-ज्ञान नहीं दिया जाता; वहाँ केवल 'हथौड़ी पीटने' (फैक्ट्रियों में मजदूरी व तकनीकी कार्य) की शिक्षा दी जाती है! लोग सोचते हैं कि विदेश जाकर कोई तकनीकी हुनर सीख लें, खूब धन कमाएं और इंद्रिय-भोग करें।
इसलिए ऋषभदेव जी कहते हैं:
"नायं देहो देहभाजां नृलोके कष्टान् कामानर्हते विड्भुजां ये।"
दिन-रात घोर कष्ट उठाकर केवल इन्द्रियतर्पण करना—यह तो विड्भुज् (विष्ठा खाने वाले सूअर) का काम है! आप सूअर को देखिए—दिन-रात इधर-उधर भटकता है, किसलिए? केवल विष्ठा (मल) खाने के लिए! और मनुष्य क्या करता है? हलवा-पूरी खाएगा, वह भी अंत में पेट में जाकर विष्ठा ही बनेगी! और उस भोजन के बाद दिन-रात इंद्रिय-तृप्ति और मैथुन में लगा रहेगा। सूअर भी वही करता है। तो अत्यंत परिश्रम करके केवल इन्द्रियतर्पण करना—यह सूअर की सभ्यता है, मनुष्य की सभ्यता नहीं है।
आहार, निद्रा, भय और मैथुन—ये चार आवश्यकताएं शरीर की हैं, इनका यथोचित निर्वाह कीजिए; परंतु जीवन के मूल उद्देश्य को मत भूलिए। मनुष्य समाज को पशु से ऊपर उठाने के लिए ही वैदिक वर्णाश्रम-धर्म की स्थापना की गई थी: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। जो सबसे अधिक बुद्धिमान और सात्विक होते थे, वे ब्राह्मण बनते थे। परंतु कलियुग में यह व्यवस्था नष्ट हो गई: "कलौ शूद्रसंभवाः"—कलियुग में सब शूद्र ही शूद्र हैं। कोई वास्तविक ब्राह्मण नहीं रहा जो समाज को सही दिशा दे सके।
इसलिए कलियुग में केवल एक ही परम साधन है:
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम् ।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥
(बृहन्नारदीय पुराण)
ऋषभदेव जी कहते हैं कि मनुष्य जीवन का जो बहुमूल्य समय है, उसे केवल पशुओं के समान खाने-पीने और भोगने में बर्बाद मत करो:
"तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं शुद्ध्येद्यस्माद् ब्रह्मसौख्यं त्वनन्तम्।"
हे पुत्रो! अपनी सत्ता (अस्तित्व) को शुद्ध करने के लिए दिव्य तपस्या करो। हमारा अस्तित्व अभी अशुद्ध है, इसीलिए हमें बार-बार जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि के दुःखों को भोगना पड़ता है।
जैसे शरीर में बुखार आ जाता है, तो कोई बुखार में रहना नहीं चाहता; वह रोग का लक्षण है। उसी प्रकार मृत्यु और देहान्तर आत्मा का स्वाभाविक धर्म नहीं है। यह शरीर तो माया का दिया हुआ एक यंत्र मात्र है:
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 18.61)
यह शरीर एक यंत्र (गाड़ी) है, और इसमें दो चेतन सत्ताएं बैठी हैं—एक जीवात्मा और दूसरे परमात्मा:
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
(श्रीमद् भगवद्गीता 13.3)
जीवात्मा केवल अपने व्यक्तिगत शरीर का ज्ञाता (क्षेत्रज्ञ) है; परंतु परमात्मा समस्त शरीरों के ज्ञाता हैं। जो मूर्ख कहते हैं कि जीवात्मा और परमात्मा एक ही हैं, वे अज्ञानी हैं। यदि आप ही परमात्मा होते, तो आपको सबके सुख-दुःख का ज्ञान होता; परंतु आपको तो केवल अपने ही शरीर का ज्ञान है।
उपनिषद् में कहा है कि एक ही वृक्ष (शरीर) पर दो पक्षी बैठे हैं—एक कर्म-फल का भोग करता है (जीवात्मा), और दूसरे केवल साक्षी होकर देखते हैं (परमात्मा)। भगवान इतने दयालु मित्र हैं कि जीव चाहे सूअर बने या देवता, भगवान उसके साथ-साथ रहते हैं। और जब जीव भगवान की ओर उन्मुख होता है, तो भगवान उसे दिव्य ज्ञान प्रदान करते हैं:
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.19)
तो मनुष्य जीवन का कर्तव्य है—तपस्या! शुकदेव गोस्वामी कहते हैं: "तपसा ब्रह्मचर्येण शमेन च दमेन च । त्यागेन सत्यशौचाभ्यां यमेन नियमेन वा ॥"
पवित्रता (शौच) से मनुष्य 'शुचि' (ब्राह्मण) बनता है। और जो केवल इस चमड़े के शरीर से अपनी पहचान बनाए रखता है, वह 'मुचि' (चर्मकार / tannery expert) है! जो कहता है "मैं अमेरिकन चमड़ा हूँ, इंडियन चमड़ा हूँ, हिन्दू हूँ, मुस्लिम हूँ"—वह मुचि ही रहता है। जब वह समझता है कि "अहं ब्रह्मास्मि"—मैं भगवान का सनातन चिन्मय दास हूँ, तब वह वास्तविक शुचि (ब्राह्मण) बनता है: "ब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः"।
मनुष्य जीवन का अर्थ ही है तपस्या: "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा"।
संसार में लोग भौतिक कारीगरी को तपस्या मान लेते हैं। जैसे बड़े-बड़े वैज्ञानिक हवाई जहाज़ (aeroplane) बनाते हैं, तरह-तरह के इलेक्ट्रॉनिक बटन लगाते हैं। यह भौतिक कारीगरी है। प्राचीन काल में असुर भी बड़े-बड़े विचित्र विमान और महल बनाते थे। परंतु एक बटन गलत दब गया, तो पूरा विमान क्रैश हो जाता है! यह पूर्णता नहीं है। सच्ची कला और बुद्धिमानी इसमें है कि अपनी सत्ता को शुद्ध किया जाए—'सत्त्व-संशुद्धि'।
नलकूबर और मणिग्रीव (यमलार्जुन) कुबेर के पुत्र थे, देवता थे; परंतु मद्यपान करके मंदाकिनी नदी में नग्न होकर अप्सराओं के साथ जल-क्रीड़ा कर रहे थे। नारद मुनि ने देखा कि ये देवता के कुल में जन्म लेकर भी पशुओं के समान लज्जाहीन हो गए हैं, तो नारद जी ने उन्हें वृक्ष बनने का शाप दिया कि "जाओ, अब सौ वर्षों तक गोकुल में नंगे खड़े रहो!" जब मनुष्य अपनी मर्यादा और लज्जा खो देता है, तो उसे वृक्ष का शरीर मिलता है।
अतः मनुष्य जीवन को इस प्रकार पशु बनने में मत गँवाओ। तपस्या करो!
कलियुग में कठिन शारीरिक तपस्या संभव नहीं है। इसलिए कलियुग के लिए सरल और व्यावहारिक तपस्या का विधान आचार्यों ने दिया है:
1. संख्या-पूर्वक हरिनाम जप करना:
"संख्यापूर्वक-नाम-गान-नतिभिः कालावसानीकृतौ"। श्रील हरिदास ठाकुर प्रतिदिन तीन लाख नाम जपते थे। हम अपने शिष्यों को कम से कम 16 माला (लगभग 25,000 नाम) प्रतिदिन जपने का नियम देते हैं, जो दिन में केवल दो घंटे में पूरा हो जाता है।
2. चार पाप-कर्मों का त्याग करना:
अवैध स्त्री-संग (व्यभिचार) का त्याग
मांसाहार (पशु-हिंसा) का त्याग
नशे (शराब, बीड़ी, चाय, सिगरेट आदि) का त्याग
द्यूत (जुआ, सट्टा) का त्याग
ये चार नियम ही कलियुग की वास्तविक तपस्या हैं। जब आप इन चार पापों का त्याग करेंगे और प्रतिदिन 16 माला हरे कृष्ण महामंत्र का जप करेंगे, तो आपका हृदय तत्काल शुद्ध हो जाएगा:
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.28)
इसके लिए घर-बार छोड़कर जंगल जाने की आवश्यकता नहीं है: "स्थाने स्थिताः श्रुतिगतां तनुवाङ्मनोभिः"। आप जहाँ हैं, अपने घर में रहिए; केवल नियमित रूप से श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीमद्भागवतम् का श्रवण कीजिए और कीर्तन कीजिए।
और श्रीमद् भगवद्गीता को 'यथारूप' (As It Is) स्वीकार कीजिए, किसी मनमाने कुतर्क और व्याख्या (interpretation) के बिना। भगवान कहते हैं: "मन्मना भव मद्भक्तो"—मेरा चिंतन करो और मेरे भक्त बनो। बस, भगवान की इस आज्ञा का अक्षरशः पालन कीजिए, इसी से आपका मानव जीवन परम सफल हो जाएगा।
Thank you very much. हरे कृष्ण!
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