श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  750323SB-CALCUTTA--Hindi.MP3
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
श्रीमद् भागवतम 1.2.8
कलकत्ता, 23-मार्च-1975
 
 
 
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।

धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेनकथासु यः ।
नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.2.8)

"Duties executed by men, regardless of occupation, are only so much useless labor if they do not provoke attraction for the message of the Supreme Lord."

धर्म का अर्थ होता है अपना-अपना कर्तव्य (duty)। पहले भी हमने आप लोगों को समझाया था कि धर्म का अर्थ केवल कोई एक विचार या मत मान लेना नहीं है कि हम हिन्दू धर्म में विश्वास करते हैं या मुसलमान धर्म में विश्वास करते हैं, और काम समाप्त हो गया—नहीं! धर्म का वास्तविक अर्थ होता है वह कर्तव्य जो करना ही पड़ेगा, जिसे आप कभी छोड़ नहीं सकते। जैसे एक नौकर है, उसे अपने मालिक का आदेश मानना ही पड़ेगा; यह उसका कर्तव्य है, अन्यथा उसकी नौकरी नहीं रहेगी।

उसी प्रकार जीव का जो स्वरूप-गत धर्म है, वह श्री चैतन्य महाप्रभु ने बताया है: "जीवेर 'स्वरूप' हय — कृष्णेर 'नित्य-दास'"। और भगवान श्री कृष्ण भी श्रीमद् भगवद्गीता में कहते हैं:
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
(श्रीमद् भगवद्गीता 15.7)
जीवात्मा भगवान का सनातन अंश है। और अंश तथा अंशी का क्या संबंध होता है? जैसे हमारा यह शरीर है, और शरीर के अलग-अलग अंग (limbs / parts of the body) हैं—हाथ, पैर, आँख, कान आदि। इन सब अंगों का अपना-अपना कर्तव्य है। आँख का कर्तव्य है देखना। आँख यदि देखती नहीं है, तो उसे अंधा कहा जाता है, अर्थात वह अपनी स्वाभाविक स्वस्थ अवस्था में नहीं है। आँख का स्वाभाविक काम है देखना और देखकर पूरे शरीर की सेवा करना—जहाँ चलना है, आँख मार्ग देखती है और पैर चलते हैं। इस प्रकार शरीर के प्रत्येक अंग का अपना स्वाभाविक कर्तव्य है, इसी का नाम धर्म है।

इसी प्रकार जीवात्मा भगवान का अंश है, तो जीवात्मा का एकमात्र स्वाभाविक कर्तव्य है भगवान की सेवा में नित्य संलग्न रहना। भगवान जैसे चाहते हैं, देवताओं और जीवों से वैसा कार्य लेते हैं। इसी को भक्ति कहा जाता है:
आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ।
(भक्तिरसामृतसिंधु 1.1.11)
भक्ति का अर्थ है अनुकूल भाव से, बिना किसी प्रतिकूलता के, भगवान श्री कृष्ण की इच्छा का पालन करना। जैसे अर्जुन को भगवान ने कहा कि "तुम युद्ध करो", तो युद्ध करना ही उनका धर्म और भक्ति बन गया।

भगवान यही चाहते हैं: "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज"। मैं जो कहता हूँ, उसे सुनो और मेरे चरणों में शरणागत हो जाओ—इसका नाम है धर्म। और इसके अतिरिक्त संसार में धर्म के नाम पर जो कुछ चल रहा है, वह सब केवल धोखा और छलना (cheating) है: "धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र"। भगवान कहते हैं:

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 18.65)
निरंतर मेरा चिंतन करो, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो और मुझे नमस्कार करो। यह करना ही हमारा सनातन धर्म है, और इसके विपरीत सब कुछ अधर्म है।

श्रीमद्भागवतम् कहती है: "धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां..."। संसार में सबने अपनी-अपनी ड्यूटी मान ली है कि "यह मेरा कर्तव्य है।" बहुत अच्छा, आप अपना कर्तव्य कीजिए; परंतु अंत में यदि उस कर्तव्य का पालन करके भगवान के प्रति आपकी भक्ति और आकर्षण उत्पन्न हुआ, तो आपका कर्तव्य सफल हुआ; और यदि भगवान की कथाओं में आपकी रुचि उत्पन्न नहीं हुई, तो "श्रम एव हि केवलम्"—केवल व्यर्थ का शारीरिक और मानसिक परिश्रम ही रहा, और कोई वास्तविक लाभ नहीं हुआ!

श्रील नरोत्तम दास ठाकुर गाते हैं:
"कर्म-काण्ड, ज्ञान-काण्ड, केवलि विषेर भाण्ड...
इथे कि आछे फल?"
इस नश्वर शरीर के जो नाना प्रकार के सांसारिक धर्म हमने बना लिए हैं, उसमें हमारा कोई वास्तविक आत्मिक लाभ नहीं हुआ, केवल जंजाल ही बढ़ा। हम सब इन तात्कालिक उपाधियों में फँसकर भगवान को भूल गए हैं। इसका परिणाम केवल यही है कि एक जन्म के बाद दूसरा जन्म, और फिर तीसरा जन्म—उसी आवागमन के चक्र में फँसे रहेंगे।

भगवान स्पष्ट कहते हैं: "मामेकं शरणं व्रज"—केवल मेरी शरण में आओ! यह मायावादियों के समान नहीं है कि "किसी भी रूप की पूजा कर लो, सब एक ही है।" नहीं, भगवान यह बात नहीं कहते। भगवान के अनंत रूप हैं, परंतु भगवान का एक मूल आदि रूप है:
ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः ।
अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम् ॥
(ब्रह्मसंहिता 5.1)
रामादिमूर्तिषु कलानियमेन तिष्ठन्
नानावतारमकरोद् भुवनेषु किन्तु ।
कृष्णः स्वयं समभवत् परमः पुमान् यो
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥
(ब्रह्मसंहिता 5.39)

भगवान श्री कृष्ण ही समस्त कारणों के मूल कारण, परम पुरुष हैं। भगवान श्रीमद् भगवद्गीता में स्वयं कहते हैं:
"मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय" (श्रीमद् भगवद्गीता 7.7)।
मुझसे श्रेष्ठ अन्य कोई तत्व नहीं है। तो जब स्वयं भगवान यह बता रहे हैं, तो हमें इसे स्वीकार करना चाहिए। और एक बार यदि कोई भगवान कृष्ण को समझ गया, तो उसका जीवन परम सफल हो गया। अन्यथा सब कुछ केवल व्यर्थ का श्रम है।

नारद-पंचरात्र में बड़ा सुंदर श्लोक आता है:
आराधिधो यदि हरिस्तपसा ततः किम्
नाराधितो यदि हरिस्तपसा ततः किम् ।
अन्तर्बहिर्यदि हरिस्तपसा ततः किम्
नान्तर्बहिर्यदि हरिस्तपसा ततः किम् ॥

यदि भगवान श्री हरि की आराधना हो गई, तो फिर अन्य किसी तपस्या की क्या आवश्यकता है? सब कुछ प्राप्त हो गया! और यदि भगवान श्री हरि की आराधना नहीं हुई, तो तुम्हारी समस्त तपस्याओं का क्या फल मिला? कुछ भी नहीं! यदि भीतर और बाहर सर्वत्र श्री हरि का दर्शन होने लगा, तो अन्य तपस्या की क्या आवश्यकता? और यदि भीतर-बाहर श्री हरि का साक्षात्कार नहीं हुआ, तो तुम्हारी सारी तपस्या व्यर्थ गई!

शास्त्र का यही अंतिम सिद्धांत है। उपनिषदों में कहा गया है: "यस्मिन् विज्ञाते सर्वमेवं विज्ञातं भवति" (मुण्डक उपनिषद् 1.1.3)—एक भगवान को जान लेने पर सब कुछ ज्ञात हो जाता है। इसलिए शास्त्र कहता है कि अपने धर्म का भली-भाँति पालन करने पर भी यदि भगवान विष्वक्सेन (श्री कृष्ण) की पावन कथाओं में अनुराग उत्पन्न नहीं हुआ, तो वह केवल व्यर्थ का परिश्रम है।

पशुओं के लिए कोई धर्म और शास्त्र नहीं होता; शास्त्र केवल मनुष्यों के लिए बनाए गए हैं। श्री चैतन्य-चरितामृत में कहा गया है:
अनादि-बहिर्मुख जीव कृष्ण भूलि' गेला ।
अतएव कृष्ण वेद-पुराण करिला ॥
(चैतन्य-चरितामृत, मध्य 20.117)
जीव न जाने कब से अनादि काल से भगवान को भूलकर इस भौतिक संसार में भटक रहा है। भगवान और जीव का तो नित्य घनिष्ठ प्रेम-संबंध है, परंतु जीव अज्ञानवश उसे भूल बैठा है। इसलिए भगवान के अवतार श्रील कृष्णद्वैपायन व्यासदेव ने कृपा करके इन समस्त वेद-पुराणों और शास्त्रों का संकलन किया।

पहले वेदों को लिखने की आवश्यकता नहीं थी; सत्य-युग, त्रेता और द्वापर में मनुष्यों की स्मरण-शक्ति (मेधा) इतनी तीव्र होती थी कि गुरु के मुखारविंद से एक बार श्रवण करने मात्र से सब कंठस्थ हो जाता था—इसलिए वेदों का नाम 'श्रुति' है। परंतु कलियुग में जीवों की बुद्धि और आयु क्षीण होने वाली थी, इसलिए व्यासदेव ने वेदों को लिपिबद्ध किया और श्रीमद्भागवतम् की रचना की।

विशेष रूप से जिनका जन्म भारतवर्ष में हुआ है, उनके लिए तो यह अत्यंत आवश्यक है कि वे इन शास्त्रों का अध्ययन करें। श्री चैतन्य महाप्रभु आज्ञा देते हैं:
भारत-भूमिते मनुष्य-जन्म हइल यार ।
जन्म सार्थक करि' कर पर-उपकार ॥
(चैतन्य-चरितामृत, आदि 9.41)
भारत-भूमि पर जिसका मनुष्य रूप में जन्म हुआ है, उसे पहले अपना जीवन सार्थक करना चाहिए। जीवन को सार्थक करने का क्या अर्थ है? इन प्रामाणिक वैदिक शास्त्रों—श्रीमद् भगवद्गीता और श्रीमद्भागवतम्—का विधिवत अध्ययन करके कृष्णभावनामृत को प्राप्त करना। जासूसी उपन्यास और सांसारिक समाचार-पत्र पढ़ने से क्या लाभ होगा?

श्रीमद्भागवतम् में कहा गया है:
न यद्वचश्चित्रपदं हरेर्यशो
जगत्पवित्रं प्रगृणीत कर्हिचित् ।
तद्वायसं तीर्थमुशन्ति मानसा
न यत्र हंसा निरमन्त्युशिक्क्षयाः ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.5.10)
जिस साहित्य में संपूर्ण जगत को पवित्र करने वाले भगवान श्री हरि के पावन यश का वर्णन नहीं है, वह कौवों के लिए तीर्थ के समान है! कौवे कहाँ जाते हैं? जहाँ शहर का कूड़ा-कचरा और जूठन फेंकी जाती है, वहाँ कौवे आनंद लेते हैं। और जो राजहंस होते हैं, वे मानसरोवर के निर्मल जल में, जहाँ कमल खिले होते हैं, वहाँ क्रीड़ा करते हैं। उसी प्रकार जो कामुक और सांसारिक साहित्य है, वह कौवे जैसे संसारी मनुष्यों के लिए है; और जो भगवान का गुणगान रूपी साहित्य है, वह परमहंसों के लिए है।

अतः भारतवासियों का यह परम कर्तव्य है कि वे पहले शास्त्रों का अनुशीलन करके अपना जीवन सफल बनाएं, और फिर पूरे विश्व में जाकर इसका प्रचार करके परोपकार करें। सारे संसार के लोग केवल आहार, निद्रा, भय और मैथुन में ही लगे हैं; वे इस आत्म-ज्ञान को नहीं जानते।

पाश्चात्य देशों में भौतिक साधन, मशीनें और गगनचुंबी इमारतें पहले से ही बहुत अधिक हैं; आप भारत से सिलाई-मशीन या साइकिल ले जाकर उनका उपकार नहीं कर सकते! वे इन सांसारिक मशीनों में हमसे सौ वर्ष आगे हैं। परंतु उनके पास यह आध्यात्मिक भगवद्-ज्ञान नहीं है। यदि आप उन्हें श्रीमद् भगवद्गीता और भागवत का यह दिव्य संदेश देंगे, तभी पूरे विश्व में भारत का वास्तविक सम्मान होगा।

और श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि आप सब गुरु बनिए:
आमार आज्ञाय गुरु हञा तार' एइ देश ।
यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश ॥
(चैतन्य-चरितामृत, मध्य 7.128)
संसार में बहुत से प्रामाणिक गुरुओं की आवश्यकता है क्योंकि सारी दुनिया अज्ञान में भटक रही है। गुरु बनने के लिए किसी को बहुत बड़ा पंडित होने की आवश्यकता नहीं है; केवल जो बात भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद् भगवद्गीता में कही है, वही बात बिना किसी मिलावट के दूसरों को कह दीजिए—बस, आप गुरु बन गए!

जैसे श्रील प्रबोधानंद सरस्वती जी प्रार्थना करते हैं:
दन्ते निधाय तृणकं पदयोर्निपत्य
कृत्वा च काकुशतमेतदहं ब्रवीमि ।
हे साधवः सकलमेव विहाय दूराच्-
चैतन्यचन्द्रचरणे कुरुतानुरागम् ॥
(चैतन्य-चंद्रामृत 8-9)
दांतों में तिनका दबाकर, अत्यंत विनम्रता से चरणों में गिरकर हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि हे साधु पुरुषो! आपने सांसारिक रूप से जो कुछ भी सीखा है, उसे एक ओर रखकर केवल श्री चैतन्य महाप्रभु और श्री कृष्ण के चरणों में अनुराग कीजिए। जहाँ भी जाइए—हाट में, बाज़ार में, रेलगाड़ी में, वायुयान में—जिससे भी मिलिए, उससे कहिए: "हरे कृष्ण महामंत्र का जप कीजिए और भगवान श्री कृष्ण के शरणागत हो जाइए।"

समाज को सुचारु रूप से चलाने के लिए चार वर्ण और चार आश्रमों का होना आवश्यक है:
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
(श्रीमद् भगवद्गीता 4.13)
ब्राह्मण (मस्तिष्क), क्षत्रिय (भुजाएं), वैश्य (उदर) और शूद्र (चरण)। जैसे स्वस्थ शरीर के लिए इन चारों अंगों का सहयोग आवश्यक है, वैसे ही समाज के लिए वर्णाश्रम की व्यवस्था आवश्यक है।

परंतु कलियुग में दोष यह है: "कलौ शूद्रसंभवाः"—सब शूद्र-प्राय हो गए हैं, प्रामाणिक ब्राह्मण और क्षत्रिय मिलना दुर्लभ हो गया है। इसलिए नैमिषारण्य के ऋषियों के सम्मुख श्रील सूत गोस्वामी ने अंतिम सार बताया:
अतः पुम्भिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागशः ।
स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.2.13)
चाहे आप ब्राह्मण हों, क्षत्रिय हों, वैश्य हों, शूद्र हों, अथवा गृहस्थ या संन्यासी हों—आपके धर्म की अंतिम संसिद्धि इसी में है कि आपके कर्म से भगवान श्री हरि संतुष्ट हों! यदि भगवान श्री हरि संतुष्ट हो गए, तो आपका जीवन सिद्ध हो गया।

और कलियुग में भगवान को संतुष्ट करने का सबसे सरल और अमोघ साधन है—हरिनाम संकीर्तन:
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम् ।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥
(बृहन्नारदीय पुराण)

भगवान के अनंत नाम हैं। हम अभी तेहरान (ईरान) से आ रहे हैं; वहाँ मुस्लिम भाइयों ने पूछा कि "हम आपके कृष्ण का नाम क्यों लें?" हमने कहा: "भगवान के अनंत नाम हैं; आप यदि अल्लाह या अकबर कहते हैं, तो वही नाम लीजिए, परंतु भगवान का ही नाम लीजिए!"

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 9.14)
उठते, बैठते, खाते, पीते निरंतर भगवान के पावन नाम का कीर्तन करना चाहिए:
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥

शास्त्र की विधि का त्याग करके जो मनमाना आचरण करता है, उसे कभी सिद्धि नहीं मिल सकती:
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 16.23)
अतः शास्त्र के इस निर्देश को स्वीकार कीजिए और इस हरिनाम का आश्रय लेकर अपना जीवन सफल बनाइए।

Thank you very much. हरे कृष्ण!

[प्रश्नोत्तरी सत्र]

प्रश्नकर्ता 1: लोग कहते हैं कि काली-पूजा करके माँसाहार करने की शास्त्रों में छूट दी गई है, इसका क्या रहस्य है?

श्रील प्रभुपाद: श्रीमद्भागवतम् में स्पष्ट निर्देश आता है:
लोके व्यवायामिषमद्यसेवा
नित्यास्तु जन्तोर्न हि तत्र चोदना ।
व्यवस्थितिस्तेषु विवाहयज्ञ-
सुराग्रहैरासु निवृत्तिरिष्टा ॥
(श्रीमद्भागवतम् 11.5.11)

बद्धजीव की मैथुन, माँसाहार और मदिरा-पान में स्वाभाविक आसक्ति होती है; इसके लिए शास्त्र को अलग से आज्ञा देने की आवश्यकता नहीं है। शास्त्र का उद्देश्य बढ़ावा देना नहीं, बल्कि उसे नियंत्रित (restrict) करना है!

जैसे विवाह का विधान इसलिए किया गया ताकि स्त्री-पुरुष का संबंध एक मर्यादा में बँध सके, न कि स्वच्छंद व्यभिचार चले। उसी प्रकार काली-पूजा में महीने में केवल एक बार अमावस्या की घोर रात्रि में बकरे की बलि का विधान इसलिए रखा गया ताकि मनुष्य रोज़-रोज़ कसाईखाने से माँस खरीदकर न खाए। और उसमें भी मंत्र पढ़ा जाता है कि "आज मैं तुम्हारा वध कर रहा हूँ, अगले जन्म में तुम मेरा वध करोगे!" जब कोई यह सुनेगा, तो वह डर जाएगा। इस प्रकार नियंत्रित करते-करते शास्त्र का अंतिम उद्देश्य मनुष्य को माँसाहार से पूर्णतः निवृत्त करना है। जो स्वच्छंदता से कसाईखाने का माँस खाते हैं, वे शास्त्र-विधि का घोर उल्लंघन करके नरकगामी होते हैं।

प्रश्नकर्ता 2: कुछ लोग कहते हैं कि नारायण या राम अवतारी हैं और कृष्ण अवतार हैं, क्योंकि वे द्वापर में बाद में आए—इसका क्या शास्त्रीय समाधान है?

श्रील प्रभुपाद: लोग सांसारिक देहात्मबुद्धि से विचार करते हैं कि हमारे दादा पहले हुए, पिता बाद में हुए, और बेटा उसके बाद हुआ। वे सोचते हैं कि नारायण पहले थे और कृष्ण बाद में जन्मे, इसलिए कृष्ण अवतार हैं। परंतु भगवान श्रीमद् भगवद्गीता में कहते हैं:
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 4.9)

भगवान का जन्म और कर्म दिव्य है, लौकिक नहीं! वे साधारण माता-पिता के रज-वीर्य से जन्म नहीं लेते। भगवान को तत्वतः जानना साधारण बात नहीं है:
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.3)

और उस तत्व को जानने का मार्ग भगवान ने बताया है:
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 4.34)
जब तक कोई प्रामाणिक तत्वदर्शी सद्गुरु के चरणों में प्रणिपात, सेवा और निष्कपट परिप्रश्न नहीं करेगा, तब तक वह इस तत्व को नहीं समझ सकता।

श्रीमद्भागवतम् का स्पष्ट और अकाट्य निर्णय है:
एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ।
इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.3.28)
समस्त अवतार भगवान के अंश या कला हैं, परंतु श्री कृष्ण साक्षात स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान (मूल अवतारी) हैं।
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥