श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  750321SB-CALCUTTA--Hindi.MP3
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
श्रीमद् भागवतम 1.2.6
कलकत्ता, 21-मार्च-1975
 
 
 
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।

स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे ।
अहैतुकी प्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.2.6)

धर्म... इंग्लिश डिक्शनरी में जैसा समझा जाता है, वहाँ लिखा है—"a faith", "a kind of faith" (एक प्रकार का विश्वास या आस्था)। "मैं हिन्दू के घर में जन्मा हूँ, इसलिए हिन्दू धर्म में मेरी आस्था है। मुसलमान के घर में जन्म लिया, तो मुसलमान धर्म में आस्था है।" तो डिक्शनरी में बताते हैं: a kind of faith. परंतु हमारा जो भागवत धर्म है, वह दूसरी चीज़ है; वह मात्र faith नहीं है।

"धर्मं तु साक्षाद् भगवत्प्रणीतम्"—धर्म का अर्थ होता है जो भगवान ने जिस प्रकार से बताया है, उसी प्रकार से उसे जीवन में ग्रहण करना; उसका नाम है धर्म। भगवान स्वयं आकर बताते हैं: "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज"—यही वास्तविक धर्म है, और सब वास्तविक धर्म नहीं हैं। जिस तथाकथित धर्म में भगवान को नहीं समझा जाता कि भगवान क्या वस्तु हैं, भगवान से हमारा क्या संबंध है, और उस संबंध के अनुसार हमारा क्या कर्तव्य है—यह सब जो नहीं जानता, वह धर्म के विषय में कुछ भी नहीं जानता। केवल भावुकता (sentiment) से कहना कि "यह हमारा धर्म है, हम इसको मानते हैं"—शास्त्र में उसको धर्म नहीं कहा जाता।

"धर्मं तु साक्षाद् भगवत्प्रणीतम्"। 'प्रणीतम्' का अर्थ होता है भगवान द्वारा बनाया गया विधान। भगवान नित्य हैं, और भगवान जो कहते हैं, वह भी नित्य है। भगवान के संसर्ग से सब कुछ नित्य है—भगवान नित्य हैं, भगवान का दिव्य रूप नित्य है, भगवान के गुण नित्य हैं, भगवान की लीलाएं नित्य हैं, भगवान का परम धाम नित्य है, और भगवान के भक्त नित्य हैं—सब कुछ शाश्वत (eternal) है।

इसलिए श्रीमद्भागवतम् के इस श्लोक में सूत गोस्वामी बता रहे हैं: "स वै पुंसां परो धर्मो"। 'पर' का अर्थ होता है उत्कृष्ट और नित्य। उत्कृष्ट और निकृष्ट दो चीज़ें हैं। प्रकृति के दो रूप हैं—उत्कृष्ट और निकृष्ट। भगवान श्रीमद् भगवद्गीता में बताते हैं:

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.4-5)

यह जो भौतिक वस्तुएं हैं—भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार—यह निकृष्ट (अपरा) प्रकृति है। और उत्कृष्ट (परा) प्रकृति क्या है? भगवान बताते हैं: "अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् जीवभूताम्"—जीव परा प्रकृति है। जैसे हम सब प्राणी, जिनका चेतन अस्तित्व है, यह परा प्रकृति है; और यह जो भौतिक शरीर है, यह अपरा (निकृष्ट) प्रकृति है।

यह भौतिक शरीर निकृष्ट क्यों कहा जाता है? क्योंकि यह टिकने वाला नहीं है—असत् है, विनाशी है। और जो जीवात्मा है, जिसने इस शरीर को धारण किया है: "देहिनोऽस्मिन यथा देहे..."।

जैसे एक मकान में दो पक्ष होते हैं—एक मकान का मालिक होता है, और दूसरा मकान में रहने वाला किरायेदार (tenant या occupier) होता है। जो किरायेदार है, वह मालिक नहीं है; मालिक अलग है। इसी प्रकार इस शरीर में दो आत्मा बैठे हुए हैं। एक है किरायेदार (जीवात्मा), जिसको यह शरीर भोगने के लिए दिया गया है; और दूसरे हैं साक्षात भगवान:

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 18.61)

भगवान सबके हृदय में विराजमान हैं—आपके हृदय में भी हैं, हमारे हृदय में भी हैं। और भगवान भूत, भविष्य और वर्तमान सब कुछ जानते हैं। हम अपनी वासना के अनुसार जैसी इच्छा करते हैं, भगवान से प्रार्थना करते हैं कि "भगवान! हमको यह सुविधा दीजिए", तो भगवान दे देते हैं। भगवान के लिए क्या कठिन है? भगवान सब कुछ प्रदान करते हैं। यदि कोई भगवान से ऐसी इच्छा करे कि "हम सब कुछ बिना किसी विचार के खाना चाहते हैं", तो भगवान वैसा ही सूअर का शरीर दे देते हैं कि "लो, अब बिना किसी रोक-टोक के मल भी खाओ!" और कोई यदि इच्छा करे कि "हम खूब कच्चा मांस खाएं और रक्त पिएं", तो भगवान कहते हैं: "अच्छा, शेर बन जाओ!"

भगवान इस प्रकार चौरासी लाख योनियों में शरीर प्रदान करते हैं: "भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया"। हम इस भौतिक जगत में भ्रमण कर रहे हैं और नाना प्रकार की इच्छाएं करते हैं:

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.27)

कुछ वस्तुओं की हम इच्छा करते हैं, और कुछ वस्तुओं से द्वेष करते हैं। तो हमारी इच्छा और द्वेष के अनुसार जैसी वस्तु हम पसंद करते हैं, उसी प्रकार का एक शरीर भगवान हमें प्रदान कर देते हैं।

इसीलिए शास्त्र में बताया है कि जीवात्मा इस शरीर रूपी यंत्र में बैठा हुआ है। जैसे मोटर-कार में एक यंत्र है, उसमें एक ड्राइवर बैठता है और एक मालिक बैठता है। उसी प्रकार यह शरीर भी एक यंत्र है, जिसमें दो व्यक्ति बैठे हैं—एक जीवात्मा और दूसरे परमात्मा। उपनिषद् में भी इसका सुंदर वर्णन आता है:
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया
समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्य-
नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥
(श्वेताश्वतर उपनिषद् 4.6)
एक ही वृक्ष (शरीर) पर दो पक्षी बैठे हैं। एक पक्षी (जीवात्मा) कर्म-फल रूपी फल को चखता है, और दूसरा पक्षी (परमात्मा) केवल साक्षी होकर देख रहा है।

तो संसार इसी प्रकार भ्रम में चल रहा है। जीवात्मा अज्ञानवश समझता है कि "मैं यह शरीर हूँ, और इस शरीर का भोग ही मेरे जीवन का एकमात्र उद्देश्य है।" इसी को देहात्मबुद्धि कहा जाता है:

यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके
स्वधीः कलत्रादिषु भौम इज्यधीः ।
यत्तीर्थबुद्धिः सलिले न कर्हिचिज्
जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखरः ॥
(श्रीमद्भागवतम् 10.84.13)

'कुणपे त्रिधातुके'—यह शरीर त्रिधातु (कफ, पित्त, वायु) से बनी हुई केवल एक थैली है—हड्डी, मांस, रक्त, मल-मूत्र का एक थैला है। इसको जो समझता है कि "मैं यह शरीर हूँ, मैं हिन्दू हूँ, मैं मुसलमान हूँ, मैं भारतीय हूँ, मैं अमेरिकन हूँ"—जो इस शरीर के संबंध से अपनी पहचान बनाता है, और शरीर से संबंधित वस्तुओं को अपना मानता है: 'स्वधीः कलत्रादिषु'—कलत्र का अर्थ है पत्नी, फिर बच्चे, परिवार, और जहाँ जन्म लिया वह भूमि (राष्ट्रवाद / nationalism)—यह जो 'अहं ममेति' (मैं और मेरा) की देहात्मबुद्धि है, शास्त्र कहता है कि ऐसा व्यक्ति 'गोखर' है। 'गो' का अर्थ है गाय (पशु), और 'खर' का अर्थ है गधा!

वास्तव में मैं परमात्मा का नित्य अंश हूँ:
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 15.7)
यह जीव भगवान का नित्य अंश है, परंतु भौतिक प्रकृति में आकर मन और पाँचों इन्द्रियों के साथ घोर संघर्ष (struggle for existence) कर रहा है। दिन-रात जो हम लोग परिश्रम कर रहे हैं, इसका क्या कारण है? केवल अस्तित्व का संघर्ष! यहाँ कोई सदा रहने वाला नहीं है, सबको एक दिन मरना ही पड़ेगा, यह सब जानते हैं। परंतु संसारी कर्मी लोग मृत्यु का विचार ही नहीं करना चाहते; वे सोचते हैं कि हम सदा जीते रहेंगे।

चाणक्य पंडित ने नीति-शास्त्र में कहा है कि कर्मी ऐसा सोचकर कर्म करता है मानो वह कभी मरेगा ही नहीं। परंतु ज्ञानी और भक्त का विचार यह होता है कि मृत्यु किसी भी क्षण आ सकती है, इसलिए मृत्यु आने से पूर्व ही हमें अपनी आत्मिक तैयारी पूर्ण कर लेनी चाहिए, जिससे आगे हमें कुत्ते-बिल्ली का शरीर न मिल जाए! क्योंकि देहान्तर तो निश्चित है:
देहिनोऽस्मिन यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 2.13)

प्रकृति ज़बरदस्ती देहान्तर कराती है। जैसे कोई युवा कहे कि "मैं कभी बूढ़ा नहीं होना चाहता", और वह तरह-तरह की दवाइयां खाए, कायाकल्प करे या बालों में खिजाब लगाए; परंतु प्रकृति उसे ज़बरदस्ती बूढ़ा बना ही देती है। इसी प्रकार जब यह देह छूटेगी, तो दूसरा शरीर ज़बरदस्ती मिलेगा: तथा देहान्तरप्राप्तिः। जो नास्तिक लोग कहते हैं कि मरने के बाद सब समाप्त हो गया, वे घोर मूर्ख हैं।

हमें ज्ञान किसी मूर्ख से नहीं, अपितु गुरु से लेना चाहिए। और सबके आदि गुरु कौन हैं? साक्षात भगवान श्री कृष्ण! ब्रह्मा जी के भी गुरु भगवान ही हैं: "तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत् सूरयः" (श्रीमद्भागवतम् 1.1.1)। भगवान ने ही आदि-कवि ब्रह्मा जी के हृदय में दिव्य ज्ञान का संचार किया। और भगवान से जो ज्ञान परंपरा के माध्यम से आता है, उसी को स्वीकार करना चाहिए:
एवं परंपराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
(श्रीमद् भगवद्गीता 4.2)

शास्त्र में भगवान कहते हैं: "आचार्यं मां विजानीयान्नावमन्येत कर्हिचित्" (श्रीमद्भागवतम् 11.17.27)—सद्गुरु को मेरा ही स्वरूप समझो, उन्हें साधारण मनुष्य मत मानो।

शास्त्र बताता है कि मृत्यु के समय मनुष्य का जैसा भाव रहता है, वैसा ही उसे अगला शरीर मिलता है:
यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 8.6)

तो हम जीवात्मा 'परा प्रकृति' हैं, हम प्रकृति हैं, पुरुष नहीं हैं। पुरुष केवल एकमात्र भगवान हैं:
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 5.29)
'पुरुष' का अर्थ होता है भोक्ता और स्वामी। अर्जुन ने श्रीमद् भगवद्गीता सुनकर भगवान के इस परम पुरुष स्वरूप को स्वीकार किया:
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 10.12)
भगवान 'शाश्वत पुरुष' हैं। ऐसा नहीं कि वे पहले निराकार थे और अब पुरुष बने हैं; वे अनादि काल से नित्य पुरुष हैं।

तो उस परम पुरुष में जो अनन्य भक्ति है: "यतो भक्तिरधोक्षजे"। भगवान का एक नाम 'अधोक्षज' है। अधः-कृतम् अक्षजं ज्ञानं येन सः अधोक्षजः। जो हमारी भौतिक चर्म-इन्द्रियों के ज्ञान से परे हैं। वे अभी हमारे चर्म-चक्षुओं के सामने भले ही दिखाई न दें, परंतु शास्त्र-चक्षु (शास्त्रचक्षुषा) द्वारा उनका साक्षात्कार होता है। और भगवान स्वयं इस भारतवर्ष की पावन भूमि पर अवतरित होकर अपनी दिव्य लीलाओं का प्रदर्शन करके समझाते हैं कि भगवान क्या हैं। यह कोई कोरी कल्पना (imagination) नहीं है।

जैसे नाटक के मंच पर किसी का पिता राजा का वेश धारण करके अभिनय कर रहा हो, और सामने दर्शक-दीर्घा में बैठा उसका छोटा बालक अपनी माता से पूछे कि "माँ, पिताजी कहाँ हैं?" पिता उसके सामने ही अभिनय कर रहे हैं, परंतु वेशभूषा बदल जाने के कारण बालक उन्हें पहचान नहीं पाता। उसी प्रकार भगवान हमारे सम्मुख हैं, परंतु माया के आवरण के कारण अज्ञानी मनुष्य उन्हें नहीं देख पाता।

तो हम लोगों ने जो मत-पंथ बनाए हैं—हिन्दू, मुसलमान, ईसाई आदि—यह सब सांसारिक उपाधियाँ हैं। आज हिन्दू का शरीर मिला है, कल यदि दूसरा शरीर मिल जाए तो धर्म बदल जाएगा। जो चीज़ बदल जाए, वह धर्म नहीं हो सकती। जो नित्य और अपरिवर्तनीय धर्म है, उसी का नाम 'परो धर्मः' है। 'परो धर्मः' का अर्थ है निवृत्ति-धर्म, और 'अपरो धर्मः' का अर्थ है प्रवृत्ति-धर्म।

साधारणतया लोग सोचते हैं कि संसार में रहो, अच्छे कर्म करो, फिर स्वर्ग जाओ और सुख भोगो—यह 'अपरा धर्म' है। परंतु जब मनुष्य समझता है कि यह भौतिक शरीर तो केवल एक वस्त्र मात्र है और मैं नित्य चिन्मय आत्मा हूँ (अहं ब्रह्मास्मि), तब उसका धर्म 'परो धर्म' बन जाता है। और जब तक हम इस परो धर्म में नहीं आएंगे, तब तक हमें सच्चा सुख कभी नहीं मिल सकता।

जैसे मछली का दृष्टांत है। मछली को जल से निकालकर आप ज़मीन पर मखमल के गद्दे पर रख दें, तो क्या वह कभी सुखी हो सकती है? कदापि नहीं! वह छटपटाकर मर जाएगी। उसे जब पुनः जल में डाल दिया जाएगा, तभी वह सुखी होगी। उसी प्रकार जीवात्मा परा प्रकृति है; जब तक वह परम चेतन भगवान के साथ अपने नित्य प्रेम-संबंध को पुनः स्थापित नहीं कर लेता, तब तक वह कभी शांत और सुखी नहीं हो सकता।

और वह संबंध केवल भक्ति के द्वारा ही स्थापित हो सकता है: "यतो भक्तिरधोक्षजे"। इसका कोई दूसरा मार्ग नहीं है—न शुष्क ज्ञान से, न सकाम कर्म से, और न अष्टांग योग से। क्योंकि ज्ञानी, योगी और कर्मी—ये सब किसी न किसी भौतिक वासना से ग्रस्त हैं।
ज्ञानी संसार से तंग आकर सोचता है कि मैं भगवान में लीन हो जाऊँ (सायुज्य मुक्ति)।
योगी चाहता है कि मुझे अष्ट-सिद्धियाँ मिल जाएं, मैं आकाश में उड़ने लगूँ या जल पर चलने लगूँ ताकि लाखों लोग मेरे पीछे भागें (magic दिखाना चाहता है)।
और कर्मी तो भौतिक भोग और स्वर्ग चाहता ही है।
तो इन सबकी अपनी-अपनी मांग है, इसलिए ये कभी शांत नहीं हो सकते। केवल शुद्ध भक्त ही परम शांत होता है क्योंकि वह अपने लिए कुछ भी नहीं चाहता!

श्री चैतन्य-चरितामृत में कहा गया है:
"भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-कामी — सकलि 'अशान्त' ।
कृष्ण-भक्त — निष्काम, अतएव 'शान्त' ॥"
(चैतन्य-चरितामृत, मध्य 19.149)

कर्मी, ज्ञानी और योगी अशांत हैं क्योंकि वे कुछ न कुछ माँगते हैं। और भक्त केवल भगवान की सेवा चाहता है:
"न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये ।
मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि ॥" (शिक्षाष्टक 4)

इसलिए सूत गोस्वामी कहते हैं: "ययात्मा सुप्रसीदति"—यदि अपनी आत्मा की वास्तविक और परम प्रसन्नता चाहते हैं, तो भगवान अधोक्षज के श्रीचरणों में अनन्य भक्ति कीजिए। और वह भक्ति निष्काम (अहैतुकी) होनी चाहिए।

यद्यपि श्रीमद् भगवद्गीता में बताया है:
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.16)
चार प्रकार के पुण्यात्मा भगवान का भजन करते हैं—आर्त (दुखी), अर्थार्थी (धन चाहने वाला), जिज्ञासु और ज्ञानी। यद्यपि ये भगवान के पास कुछ माँगने जाते हैं, तथापि शास्त्र ने इन्हें 'सुकृती' (पुण्यवान) कहा है। क्यों? क्योंकि वे कम से कम भगवान के द्वार पर तो पहुँचे!

और जो कभी भगवान के पास जाता ही नहीं, उसे शास्त्र 'दुष्कृती' कहता है:
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.15)
जो अपनी बुद्धि को पाप-कर्मों में लगाता है, वह 'दुष्कृती' है। उसे 'मूढ़' (गधा), 'नराधम' (मनुष्यों में सबसे नीच), और 'माययापहृतज्ञान' कहा गया है।

तो यदि हम वास्तव में अपनी आत्मा को सुप्रसन्न करना चाहते हैं, तो हमें भौतिकवाद, शून्यवाद और निर्विशेषवाद को त्यागकर शुद्ध भागवत धर्म को स्वीकार करना पड़ेगा। भागवत धर्म का अर्थ है—भगवान परम प्रभु और स्वामी हैं, और हम उनके नित्य दास हैं; और भगवान की आज्ञा का पालन करना ही हमारा एकमात्र धर्म है। इसके अतिरिक्त सब कुछ केवल छलना और ठगी (cheating) है: "धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र"।

कलियुग का लक्षण बताते हुए शास्त्र कहता है:
प्रायेणाल्पायुषः सभ्य कलावस्मिन् युगे जनाः ।
मन्दाः सुमन्दमतयो मन्दभाग्या ह्युपद्रुताः ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.1.10)
कलियुग में लोगों की आयु बहुत कम होती है, वे मंदबुद्धि, दुर्भाग्यशाली और नाना प्रकार के क्लेशों से घिरे रहते हैं। कलि के प्रभाव से आयु, बल, दया और धर्म का निरंतर ह्रास हो रहा है। और जब तक यह भौतिक शरीर प्राप्त होता रहेगा, तब तक शीत-उष्ण और सुख-दुःख के द्वंद्व भोगने ही पड़ेंगे: "मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः"।

इसलिए यदि आप वास्तविक आनंद चाहते हैं, तो इस परो धर्म को ग्रहण कीजिए—भगवान अधोक्षज की भक्ति कीजिए।

इसका सुंदर उदाहरण ध्रुव महाराज हैं। ध्रुव महाराज 'सुकृती' थे। जब उनकी सौतेली माता सुरुचि ने उनका अपमान किया कि "तुम राजा की गोद में बैठने के योग्य नहीं हो", तो वे रोते हुए अपनी माता सुनीति के पास गए। माता ने कहा: "बेटा! मैं तो दासी के समान उपेक्षित हूँ, तुम्हारी सहायता केवल साक्षात भगवान ही कर सकते हैं।" बालक ध्रुव ने पूछा: "भगवान कहाँ मिलेंगे?" माता ने कहा: "ऋषि-मुनि उन्हें ढूंढने वन में जाते हैं।" तो ध्रुव महाराज वन में चले गए और उन्होंने अपने पिता से भी बड़ा राज्य पाने की कामना से कठोर तपस्या की।

परंतु जब भगवान नारायण का साक्षात दर्शन हुआ, तो वे उस राज्य की कामना को भूल गए! वे गद्गद होकर बोले:
"स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे"
(हरिभक्तिसुधोदय 7.28)
"हे प्रभु! मैं तो काँच का टुकड़ा ढूंढने निकला था, और मुझे अमूल्य चिंतामणि-रत्न मिल गया! अब मुझे किसी सांसारिक राज्य की किंचित् भी कामना नहीं है।"

तो जो भगवान की शरण में जाता है, उसे अंततः यह परम लाभ प्राप्त हो जाता है। इसलिए किसी भी भौतिक परिस्थिति की परवाह किए बिना केवल भगवान की कथाओं का श्रवण कीजिए:
स्थाने स्थिताः श्रुतिगतां तनुवाङ्मनोभिर्-
ये प्रायशोऽजित जितोऽप्यसि तैस्त्रिलोक्याम् ।
(श्रीमद्भागवतम् 10.14.3)
आप जहाँ भी हैं, अपने स्थान पर रहिए; धनी-निर्धन का कोई भेद नहीं है। केवल भगवान की पावन कथाओं का श्रवण कीजिए।

यस्मिन् विज्ञाते सर्वमेवं विज्ञातं भवति (मुण्डक उपनिषद् 1.1.3)—भगवान को जान लेने पर संसार का समस्त ज्ञान और विज्ञान स्वतः ज्ञात हो जाता है। हम संसार भर में घूमकर बड़े-बड़े वैज्ञानिकों, दार्शनिकों और रूस के कम्युनिस्ट नास्तिकों को भी शास्त्र के आधार पर चुनौती देते हैं, और भगवान की कृपा से सर्वत्र इस कृष्णभावनामृत की ही विजय होती है। अतः आप सब इस भागवत धर्म को अपने जीवन में धारण कीजिए, इसी से आप पूर्ण सुखी होंगे।

Thank you very much. हरे कृष्ण!

[प्रश्नोत्तरी सत्र]

प्रश्नकर्ता 1: भगवान निराकार क्यों होंगे?

श्रील प्रभुपाद: आप ऐसा क्यों समझते हैं कि भगवान निराकार हैं? आप सब भगवान के नित्य अंश हैं; जब आपका आकार है, तो जो अंशी (पूर्ण) हैं, उनका आकार क्यों नहीं होगा? जैसे यह अँगुली हमारे शरीर का एक अंश है, इसका एक निश्चित रूप और आकार है; तो जब अंश का रूप है, तो पूर्ण शरीर का रूप क्यों नहीं होगा? यह कौन-सा तर्क है?

जो लोग भगवान को निराकार समझते हैं, उनके दो प्रकार के विचार होते हैं। एक तो यह कि उन्हें अभी भगवान का वास्तविक ज्ञान नहीं हुआ। और 'निराकार' का यथार्थ अर्थ यह होता है कि जिसका भौतिक इन्द्रियों द्वारा आकार निर्धारित न किया जा सके। भगवान का जैसे विराट रूप है, उसकी सीमा आप कैसे तय करेंगे?

परंतु भगवान इतने कृपामय हैं कि आपको दर्शन देने के लिए अपने अर्चा-विग्रह रूप में यहाँ प्रत्यक्ष विराजमान हैं। आप उनके रूप का दर्शन कीजिए और सेवा कीजिए। भगवान निराकार नहीं हैं।

श्रीमद्भागवतम् में कहा है:
वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम् ।
ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.2.11)

परम तत्व की अनुभूति तीन स्तरों पर होती है—ब्रह्म, परमात्मा और भगवान।
जैसे सूर्य का प्रकाश (धूप), सूर्य का मंडल, और सूर्य-मंडल के भीतर साक्षात सूर्यनारायण।
श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान कहते हैं: "इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्" (श्रीमद् भगवद्गीता 4.1)—मैंने यह ज्ञान पहले सूर्यदेव विवस्वान् को दिया था। तो सूर्यदेव कोई निराकार नहीं हैं, वे साकार व्यक्ति हैं। और सूर्य का गोला भी साकार है। और जो सूर्य की किरणें सर्वत्र फैली हैं, वह उनका व्यापक प्रकाश है।

तो जो केवल प्रकाश तक ही पहुँच पाता है, वह उसे निराकार ब्रह्म समझकर संतुष्ट हो जाता है। परंतु जिसके पास सामर्थ्य है, वह सूर्य-मंडल में प्रवेश करके साक्षात सूर्यनारायण का दर्शन करता है। तो जो ब्रह्मवादी हैं, उनकी अभी इतनी सामर्थ्य नहीं है कि वे भगवान के सगुण-साकार परम पुरुष रूप का साक्षात्कार कर सकें; उन्हें अभी और आगे बढ़ना होगा।

प्रश्नकर्ता 2: संसार की सृष्टि क्या भगवान की इच्छा से हुई है?

श्रील प्रभुपाद: नहीं, यह तुम्हारी इच्छा से हुई है! यह जो जेलखाना बनाया जाता है, सरकार अपनी इच्छा से जेल नहीं बनाती; तुम चोरी करोगे, इसलिए जेल बनाया जाता है। राजा यह नहीं चाहता कि जेल बनाकर उस पर अलग से खर्चा किया जाए। परंतु चोर लोग ज़बरदस्ती राजा को बाध्य करते हैं कि हमारे लिए जेल बनाओ, हम वहाँ रहेंगे!

उसी प्रकार जब जीवों ने भगवान की सेवा छोड़कर स्वयं स्वतंत्र रूप से भोग करने की इच्छा की, तो भगवान ने उनकी वासना की पूर्ति और उनके सुधार के लिए इस भौतिक संसार रूपी कारागार की सृष्टि की।
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥