श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  761010SB-ALIGARH_Hindi.MP3
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
श्रीमद् भागवतम 1.2.6
अलीगढ़, 10-अक्टूबर-1976
 
 
 
स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे ।
अहैतुकी प्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.2.6)

कल इस श्लोक का व्याख्यान किया था कि 'परो धर्मः'। धर्म जो इंग्लिश डिक्शनरी में है, उसमें बोलते हैं—"a faith", "a kind of faith" (विश्वास)। कोई बोलता है हम हिन्दू धर्म में विश्वास करते हैं, कोई बोलता है हम मुसलमान धर्म में विश्वास करते हैं। बाकी "धर्मं तु साक्षाद् भगवत्प्रणीतम्"—धर्म जो है, वह भगवान का दिया हुआ है। जैसे भगवान की दी हुई यह दुनिया है, चन्द्र है, सूरज है, आकाश है—अनेक वस्तुएं भगवान ने दी हैं। तो उसमें आप believe करें या न करें, वह चीज़ तो रहेगी ही। इसी प्रकार असल जो धर्म है, उसमें आप विश्वास करें अथवा न करें, धर्म वही रहेगा। You cannot manufacture, that is not possible.

जैसे राजा का कानून है, उसमें आप विश्वास करें या न करें, आपको मानना ही पड़ेगा। आप अगर कहते हैं कि हम नहीं विश्वास करते, अभी जो ordinance है हम इसमें विश्वास नहीं करते—आप न कीजिए, बाकी आप गड़बड़ करेंगे तो फिर आपको सज़ा मिलेगी। इसी प्रकार श्रीमद्भागवतम् के छठे स्कंध (Sixth Canto) में बताया है:

धर्मं तु साक्षाद् भगवत्प्रणीतं
न वै विदुर्ऋषयो नापि देवाः ।
न सिद्धमुख्या असुरा मनुष्याः
कुतो नु विद्याधरचारणादयः ॥
(श्रीमद्भागवतम् 6.3.19)

यह यमराज explain कर रहे हैं यमदूतों के सामने। जब यमदूत अजामिल को यमराज के पास नहीं ले जा सके, तो उस समय वे लोग जानते थे कि यमराज तो धर्मराज हैं, और यह अधार्मिक इतना पाप किया था, इसको माफ़ी कैसे हो गई, क्या बात है? तो उन्होंने धर्म का विषय पूछा—महाराज, धर्म क्या चीज़ है?

तो उसके उत्तर में यमराज जी ने बताया था कि "धर्मं तु साक्षाद् भगवत्प्रणीतम्"—जो भगवान कह देते हैं, वह धर्म है। "न वै विदुर्ऋषयो नापि देवाः"—बड़े-बड़े ऋषि लोग जो हैं, वे भी नहीं जानते कि धर्म क्या है। तो बड़े-बड़े ऋषि लोग... आप हम लोगों की बात तो छोड़ ही दीजिए, बड़े-बड़े सब ऋषि लोग हैं, वे भी नहीं जानते: "न विदुर्ऋषयो नापि देवाः"। और जो सब बड़े-बड़े देवता लोग हैं—ब्रह्मा, लॉर्ड शिव (Lord Śiva), और इन्द्र, चन्द्र, वरुण आदि बड़े-बड़े सब देवता लोग, वे भी नहीं जानते। और कहते हैं: "न सिद्धमुख्याः"—बड़े-बड़े सब जो सिद्धि प्राप्त किए हुए हैं, उनके जो मुख्य हैं, प्रधान-प्रधान हैं, वे भी नहीं जानते। "असुरा मनुष्याः"—और असुर लोग जो हैं, और यह साधारण मनुष्य हैं, यह कोई भी नहीं जानता। "कुतो नु विद्याधरचारणादयः"—तो साधारण विद्याधर, चारण क्या समझेंगे!

तो धर्म का जो तत्व है, वह जो भगवान के representative हैं, उनको मालूम है। इसलिए शास्त्र में बताया है:
"धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्थाः।"
महाजन लोग जो धर्म को ग्रहण किए हैं, जैसे बताए हैं, वही धर्म है। और वे महाजन कौन-कौन हैं, वह भी बता दिया है। बारह महाजनों के नाम दिए हैं:

स्वयम्भूर्नारदः शम्भुः कुमारः कपिलो मनुः ।
प्रह्लादो जनको भीष्मो बलिर्वैयासकिर्वयम् ॥
द्वादशैते विजानीमो धर्मं भागवतं भटाः ।
गुह्यं विशुद्धं दुर्बोधं यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ॥
(श्रीमद्भागवतम् 6.3.20-21)

अगर धर्म कोई समझ गया: "गुह्यं विशुद्धं दुर्बोधम्"—समझना भी बड़ा मुश्किल है, दुर्बोधम्। "यज्ज्ञात्वा"—जिसको समझने से क्या लाभ होता है? "अमृतमश्नुते"—फिर उसको अमृत की प्राप्ति हो जाती है। यह जो अवस्था अभी हम लोगों की है, यह मृत अवस्था है। यह जो शरीर है, यह तो मृत है ही है। इसमें जब तक वह आत्मा, जीव स्वरूप है, तब तक यह चलता-फिरता है। असल में यह lump of matter है। तो यह हमको प्राप्त करना पड़ता है—भूत्वा भूत्वा प्रलीयते। एक शरीर हम लोग ग्रहण करते हैं, फिर कुछ दिन के लिए उसमें jump करते हैं—"यह हमको शरीर मिल गया है, भारतीय शरीर मिल गया, अमेरिकन शरीर मिल गया।" और ऐसा कुत्ता भी समझता है—"हमको कुत्ते का शरीर मिल गया", बंदर भी समझता है। तो शरीर में जिसका आत्मज्ञान (देहात्मबुद्धि) है, वह कुत्ता-बंदर जैसा ही है, समझ लीजिए:

यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके
स्वधीः कलत्रादिषु भौम इज्यधीः ।
यत्तीर्थबुद्धिः सलिले न कर्हिचिज्
जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखरः ॥
(श्रीमद्भागवतम् 10.84.13)

तो इस शरीर में आत्मबुद्धि जिसकी है—और यही पूरी दुनिया में चल रहा है—वह 'गोखर' है, जानवर है। 'गो' का अर्थ होता है गाय, और 'खर' का अर्थ होता है गधा: "स एव गोखरः"।

इसलिए वास्तविक धर्म समझ लेना चाहिए। जैसे इधर बताया है: "गुह्यं विशुद्धम्"। 'विशुद्ध' का अर्थ होता है कि यह भौतिक वस्तु नहीं है। भौतिक वस्तु जो है, यह सब अशुद्ध है। अशुद्ध होने के कारण यह सब नष्ट हो जाता है। और विशुद्ध का अर्थ होता है जो नष्ट होने वाला नहीं: आत्मा—"न हन्यते हन्यमाने शरीरे"—वह शुद्ध है। शरीर शुद्ध नहीं है। शरीर को शुद्ध करने के लिए ही धर्म का आचरण करना पड़ता है।

इसलिए विभिन्न धर्म—वर्णाश्रम धर्म। इसको धर्म कहा जाता है: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र; ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। क्योंकि हम लोग सब अभी अशुद्ध अवस्था में हैं, तो इसको नियमित करने के लिए, विशुद्ध अवस्था में जाने के लिए यह जो विभाजन है, यह अत्यंत आवश्यक है। इसको छोड़ने से फिर अशुद्ध ही रह जाता है, विशुद्ध नहीं होता।

तो इसलिए हमारी वैदिक सभ्यता में जो वर्णाश्रम धर्म है, उसका पालन करना—यही मनुष्य जीवन का प्रारंभिक कार्य है। और वर्णाश्रम जो समझता नहीं और उसके लिए जो प्रयत्न नहीं करता है, वह अशुद्ध ही रह जाता है। उसको जन्म-जन्मांतर वही एक शरीर छोड़ के दूसरा शरीर लेना, फिर कुछ दिन काम करना, फिर मर जाना, फिर एक नया शरीर लेना—यह आवागमन, the cycle of birth and death, वही अशुद्ध अवस्था है।

तो शास्त्र इसलिए बताता है: "तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं शुद्ध्येत्"। मनुष्य जीवन जो है, वह सत्त्व शुद्ध करने के लिए है। यह नहीं कि कभी बंदर का शरीर मिला, कभी देवता का शरीर मिला, jump किया और मर गया, फिर नया शरीर मिला—यह मनुष्य जीवन नहीं है। "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा"—ब्रह्म वस्तु क्या चीज़ है, उसको समझने के लिए मनुष्य जीवन है।

इसलिए ऋषभदेव ने बताया है। जब अपने पुत्रों को उपदेश दे रहे थे रिटायर होने के पहले—उनके सौ पुत्र थे, उसमें सबको उपदेश दे रहे थे महाराज ऋषभदेव। उसमें ही बताया:

नायं देहो देहभाजां नृलोके
कष्टान् कामानर्हते विड्भुजां ये ।
तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं
शुद्ध्येद्यस्माद् ब्रह्मसौख्यं त्वनन्तम् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 5.5.1)

कि हे पुत्र! यह जो शरीर है नृलोके—मनुष्य समाज में... शरीर तो सबको मिलता है। कुत्ते को भी मिलता है, बंदर को भी मिलता है, मनुष्य को भी मिलता है, पेड़ को भी मिलता है, मक्खी को भी मिलता है—सबको मिलता है शरीर। बाकी यह जो शरीर है, विशेष करके मनुष्य शरीर, जो मनुष्य समाज में, मनुष्य लोक में जो शरीर मिला है: "नायं देहो देहभाजां नृलोके कष्टान् कामानर्हते"—केवल इन्द्रियतर्पण करने के लिए कष्ट करना, तकलीफ उठाना, न अर्हते—यह उचित नहीं है।

यह आजकल की जो सभ्यता है, अभी तक वह advertisement होता है गवर्नमेंट की तरफ से: "Hard labor"। आजकल science के युग में... अब देखिए, मनुष्य जो है, उसने ठेला ठेलना शुरू किया, रिक्शा चलाना शुरू किया। और भी इसको hard labor चाहिए! यह education है?! यह ठेला ठेलना और रिक्शा चलाना क्या मनुष्य का काम है? यह तो गधे का काम है, जानवर का काम है! मनुष्य को इतना नीचे ले आए, फिर बताते हैं: और भी परिश्रम करो, और भी परिश्रम करो! देखिए क्या civilization है! चाहे वह गोखर... सब गधा, सूअर का civilization है।

और शास्त्र में बोला है यह सूअर का civilization है। सूअर का civilization क्या है? न, दिन भर परिश्रम करना और विष्ठा (मल) खाना, बस! कहां विष्ठा है, कहां विष्ठा है—दिन भर परिश्रम करके, और जहां विष्ठा मिली, खूब खाया, खूब तगड़ा हुआ, फिर sex! इसलिए मना करते हैं कि अत्यंत परिश्रम करके और इन्द्रियतर्पण करना, यह मनुष्य शरीर का काम नहीं है: "नायं देहो देहभाजां नृलोके कष्टान् कामानर्हते विड्भुजां ये"। यह तो सूअर की civilization है, यह कोई मनुष्य की civilization है?!

मनुष्य की civilization है अपने अस्तित्व को विशुद्ध करना। धर्म विशुद्धम्: "गुह्यं विशुद्धं दुर्बोधम्"। है तो मुश्किल समझना, बाकी शरीर और आत्मा को शुद्ध करना, यही एकमात्र काम है:
"तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं शुद्ध्येद्यस्माद् ब्रह्मसौख्यं त्वनन्तम्।"
सुख जो चाहते हो, वह तो इस संसार में है नहीं। सुख का अर्थ है 'अनंत सुखम्'। जिस सुख का कभी नाश नहीं होता, उसका नाम है सुख।

रमन्ते योगिनोऽनन्ते सत्यानन्दे चिदात्मनि ।
इति रामपदेनासौ परं ब्रह्माभिधीयते ॥
(पद्म पुराण)

यह 'राम' पद का अर्थ व्याख्यान किया, कि राम का अर्थ होता है अनंत चिदानन्द रूप में रमण करना।

तो शास्त्र में यमराज ने भी बताया है कि अपनी सत्ता को शुद्ध करने के लिए विशुद्ध जो धर्म है: "दुर्बोधम्"—यद्यपि यह समझना बहुत मुश्किल है, कठिन है; बाकी एक दफ़े अगर आप समझ जाएं कि वास्तविक धर्म क्या चीज़ है, तो क्या लाभ होता है? "यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते"—फिर उसको अमृत लाभ हो जाता है। इसका नाम धर्म है।

इसलिए भगवान स्वयं आते हैं। आकर के: "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत"। भगवान कब आते हैं? यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति। यह जो विशुद्ध धर्म है, "यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते", इसको लोग समझते नहीं और इधर-उधर के मनमाने सब धर्म बना लेते हैं। है न? हमने हिन्दू धर्म बनाया, मुसलमान धर्म बनाया, क्रिश्चियन धर्म बनाया, बौद्ध धर्म बनाया, जैन धर्म बनाया, और न जाने क्या-क्या बनाया।

तो भागवत कहती है कि इन सब धर्मों में हम लोग interested नहीं हैं:
धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सताम् ।
(श्रीमद्भागवतम् 1.1.2)
यह सब धोखाधड़ी वाले धर्म हैं, इन सबमें हम लोग interested नहीं हैं। "धर्मं तु साक्षाद् भगवत्प्रणीतम्"—उसमें interested हैं, धोखाधड़ी धर्म में हम लोग interested नहीं हैं। "धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सताम्"—जो वास्तविक धार्मिक हो जाएंगे, वे तो निर्मत्सर हो जाएंगे। और दुनिया का काम क्या है? मत्सरता। श्रीधर स्वामी इसके ऊपर टीका करते हैं:
"पर-उत्कर्ष-असहनम् इति मत्सरता।"
दूसरे की तरक्की जो सहन नहीं होती, उसका नाम है मत्सरता। और असल जो धर्म है: "परमो निर्मत्सराणां सतां वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु"।

तो इस वास्तविक धर्म की जब ग्लानि होती है, तभी भगवान आते हैं: "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति"। 'ग्लानि' का अर्थ होता है जो वास्तविक धर्म नहीं है, और धर्म के नाम से सब cheating चलती है। 'कैतव'—कैतव का अर्थ होता है cheating। तो cheating धर्म को भागवत में 'प्रोज्झित'—झाड़ू देकर सब बाहर निकाल दिया गया है। 'प्रोज्झित'—प्रकृष्टरूपेण उज्झित। जैसे कमरे में आप लोग झाड़ू देते हैं, जितनी गंदगी और कूड़ा-कचरा है, उसको सब बाहर निकाल देते हैं।

वही श्रीमद् भगवद्गीता में भी भगवान बताते हैं। नहीं तो भगवान को यह बोलने की क्या ज़रूरत थी: "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज"? भगवान ने पहले बताया:
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ।
(श्रीमद् भगवद्गीता 4.8)
धर्म को संस्थापन करने के लिए मैं एक-एक युग में अवतार ग्रहण करके आता हूँ, सिखाता हूँ। और वही भगवान अंत में बोलते हैं: "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज"।

तो यह जो हम लोगों ने सब धर्मों का आविष्कार किया है—हिन्दू धर्म, मुसलमान धर्म और यह धर्म—इन धर्मों की रक्षा करने के लिए भगवान नहीं आते। इसमें भगवान का कोई interest नहीं है। भगवान का interest है कि जो असल धर्म है—वही "धर्मं तु साक्षाद् भगवत्प्रणीतम्"—जो धर्म भगवान ने दिया है, उसमें जब ग्लानि पहुँचती है, उसके लिए भगवान आते हैं। जैसे State Government interested होती है जब government का कानून आप तोड़ते हैं, तब government interested होती है, आपको शासन करती है, आपको समझाती है। और नहीं तो घर में आपने कुछ नियम-धर्म बनाया, उसको तोड़ा, उसको फिर बनाया, उसमें government का कोई interest नहीं होता।

इसी प्रकार भगवान जो धर्म संस्थापन करने को आते हैं, वह कोई हिन्दू धर्म, मुसलमान धर्म या जैन धर्म नहीं है। यह सब मनगढ़ंत धर्म नहीं हैं, इनको तो भागवत ने 'कैतव' कह दिया है। असल जो धर्म है: "यतो भक्तिरधोक्षजे"। जिस साधन से भगवान अधोक्षज में अनन्य भक्ति उत्पन्न होती है, वही असल धर्म है—भक्तियोग।

यह जो भगवान बता रहे हैं कि "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज"—भगवान कृष्ण के चरणों में शरणागत होना। तो कौन शरणागत होगा? यदि कोई भगवान का भक्त नहीं है, तो वह क्यों भगवान के चरणों में शरणागत होना पसंद करेगा? बोलते हैं: "यह तो बहुत बड़ी माँग है! सब छोड़ करके कृष्ण के चरणों में ही शरणागत हो जाएं?!" ऐसा बोलते हैं, बड़े-बड़े तथाकथित विद्वान लोग सब बोलते हैं। और भगवान तो बहुत हैं—"हमारा यह भगवान है, वह भगवान है।" आजकल तो भगवान manufacture किए जाते हैं! तो यह सब भगवान मान लेते हैं, और खाली कृष्ण के लिए बोलते हैं: "आप लोग बड़े sectarian हैं, केवल कृष्ण का नाम लेते हैं और किसी का नहीं बोलते।"

तो यह सब अज्ञान की बात है। भगवान तो केवल कृष्ण ही हैं, और सब तो चोर हैं! इसको वे जानते ही नहीं। क्यों?
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.3)
भगवान को समझना कोई साधारण बात है क्या? मनमाना manufacture कर लिया, बहुत-से भगवान बना लिए! ऐसा शास्त्रों में नहीं है।

भगवान इसीलिए स्वयं आते हैं। भगवान क्या चीज़ हैं—भगवान निराकार हैं कि साकार हैं, कि मनुष्य हैं, क्या हैं—खुद आकर सबके सामने प्रत्यक्ष बताते हैं। बाकी मूर्ख लोग समझते हैं: "यह तो हमारे जैसा ही कोई साधारण मनुष्य है"—"अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्" (श्रीमद् भगवद्गीता 9.11)। क्योंकि भगवान मनुष्य-लीला करके भगवान रामचंद्र के रूप में आते हैं, भगवान कृष्णचंद्र के रूप में आते हैं, भगवान चैतन्य महाप्रभु के रूप में आते हैं—शास्त्रों के प्रमाण के अनुसार। तो वे जो धर्म सिखा जाते हैं, उसको ग्रहण करना चाहिए; अन्यथा सब वृथा श्रम होगा। इसलिए श्रीमद्भागवतम् में बताते हैं:

धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेनकथासु यः ।
नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.2.8)

"आप कौन-सा धर्म पालन करते हैं?" "हम हिन्दू धर्म का पालन करते हैं।" "आप क्या धर्म पालन करते हैं?" "हम ब्राह्मण धर्म का पालन करते हैं।" "आप?" "हम मुसलमान धर्म का पालन करते हैं।" "आप?" "हम बौद्ध धर्म।" "आप?" "जैन धर्म।" जैसे एक-एक व्यक्ति को लीजिए, बड़ी अच्छी तरह से सब पालन करता है, जैसा नियम है उनके एक-एक धर्म का। हमारे हिन्दुओं के लिए जैसे मंदिर में जाना, कोई मस्जिद में जाता है, कोई चर्च में जाता है। तो शास्त्र कहता है: "धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां"—अपना-अपना धर्म खूब अनुष्ठान करते हैं; "विष्वक्सेनकथासु यः नोत्पादयेद्यदि रतिम्"—'विष्वक्सेन' भगवान का ही एक नाम है—परंतु भगवान की कथाओं में यदि रति उत्पन्न नहीं हुई, तो "श्रम एव हि केवलम्"।

भगवान क्या चीज़ हैं, पूछिए। जितने सब धर्मध्वजी हैं, सब एक-एक ध्वजा लेकर अपने-अपने धर्म की खड़े हुए हैं, उनको पूछिए: "बोलिए, भगवान क्या चीज़ हैं?" तो कहेंगे: "भगवान क्या बोलने की चीज़ है? वह तो निराकार हैं!" कोई ठीक से बोल नहीं सकता, असल में उनको मालूम कुछ भी नहीं है। और हमारा जो भागवत धर्म है, हमसे कोई पूछे तो हम तुरंत बता देंगे: देखिए, कृष्ण भगवान श्यामसुंदर हैं, उनका address वृन्दावन है, उनके पिता का नाम नन्द महाराज है, माता यशोदा हैं... अब क्या चाहते हैं आप? बिल्कुल सब स्पष्ट बता देते हैं! और किसी से पूछिए, तो वह कहेगा: "भगवान कुछ बोलने की चीज़ है क्या? सब निराकार है, ज्योति है, यह है, वह है।"

तो इसलिए ऋषि लोग कहते हैं कि आपने धर्म का खूब याजन किया और भगवान क्या चीज़ हैं यह नहीं जाना, तो "श्रम एव हि केवलम्"—केवल व्यर्थ का परिश्रम ही किया, और तो कुछ लाभ नहीं हुआ धर्म का पालन करने से! क्योंकि "धर्मं तु साक्षाद् भगवत्प्रणीतम्"—तो जो धर्म का प्रणेता है... जैसे हम लोग जो government का कानून स्वीकार करते हैं, हम लोग जानते हैं कि श्रीमती इन्दिरा गांधी प्रधानमंत्री हैं और उन्होंने यह कानून जारी किया है, यह सब जानते हैं। इसी प्रकार धर्म का अर्थ होता है कि भगवान ने जो विधान दिया है, उसको समझना। और यदि भगवान को ही नहीं जानते हैं और उन्होंने क्या आज्ञा दी है यह नहीं जानते, तो फिर हिन्दू धर्म, मुसलमान धर्म पालन करने से क्या लाभ होगा? "श्रम एव हि केवलम्"—केवल श्रम ही रह जाता है, उसमें और कुछ लाभ नहीं है।

और श्रीमद्भागवतम् में आगे बताया है:
वासुदेवे भगवति भक्तियोगः प्रयोजितः ।
जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यदहैतुकम् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.2.7)

असल चीज़ समझी नहीं कि धर्म का क्या उद्देश्य है—"स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे"। और भगवान श्रीमद् भगवद्गीता में बताते हैं: "भक्त्या मामभिजानाति"। वह भक्ति के विषय में कुछ ज्ञान नहीं हुआ और भगवान को नहीं समझा, तो उसके लिए बताते हैं कि ये सब जो धर्म हैं, कैतव (धोखाधड़ी) धर्म हैं; और उसमें और कुछ लाभ नहीं होता, केवल धर्म याजन करने का जो शारीरिक व मानसिक परिश्रम है, वही रह जाता है।

तो इसलिए शास्त्र बताता है: "वासुदेवे भगवति भक्तियोगः प्रयोजितः । जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यदहैतुकम् ॥" मनुष्य जीवन में दो चीज़ें प्राप्त करनी हैं: एक ज्ञान और दूसरा वैराग्य। यह धर्म का उद्देश्य है।

तो ज्ञान और वैराग्य... यह जो अज्ञान है कि "मैं शरीर हूँ", यह तो घोर अज्ञान है। और ज्ञान लाभ करना चाहिए कि हम शरीर नहीं हैं: "अहं ब्रह्मास्मि"—हम तो ब्रह्म वस्तु हैं, "ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा"। जैसा नियम है, भगवान वासुदेव में भक्तियोग जब यथार्थ रूप से प्रयुक्त होता है, तो उसमें यही लाभ होता है: "जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यदहैतुकम्"।

उस ज्ञान से, जब हमको यह बोध हो जाएगा कि मैं यह शरीर नहीं हूँ, तो विचार होगा कि मैंने तो जीवन भर केवल इस नश्वर शरीर के लिए ही इतना परिश्रम किया! और उसी के लिए परेशान रहे! तो यह जब समझ आ जाता है कि मैं तो शरीर नहीं हूँ, वास्तव में तो यही ज्ञान है।

भगवान जब अर्जुन को उपदेश दिए, तो सबसे पहले यही बात समझाई:
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 2.11)
कि तुम जो इस शरीर के लिए इतने परेशान हो, यह कोई पंडित या ज्ञानी की बात नहीं है: "नानुशोचन्ति पण्डिताः"। इस शरीर का भरण-पोषण किसी तरह सात्विक रूप से करो; ऐसा नहीं कि शरीर को एकदम neglect कर दिया जाए, बाकी जहाँ तक निर्वाह की ज़रूरत है, उतना संग्रह करना चाहिए, कार्य करना चाहिए। केवल इस देह के लिए दिन भर परिश्रम करना सूअर के जैसा—यह सर्वथा अनुचित है। इसको शास्त्र मना करता है: "नायं देहो देहभाजां नृलोके कष्टान् कामानर्हते"। केवल देह-सुख के लिए दिन-रात घोर कष्ट उठाना, यह तो सूअर का स्वभाव है, मनुष्य का नहीं।

तो यही वास्तविक धर्म सिखाया जाता है, यही वैदिक धर्म है—भगवान को जानना, "यतो भक्तिरधोक्षजे"। और यदि प्रारंभ से ही भगवान वासुदेव में भक्तियोग लगाया जाए... और एक जगह बताया है:

केचित् केवलया भक्त्या वासुदेवपरायणाः ।
अघं धुन्वन्ति कार्त्स्न्येन नीहारमिव भास्करः ॥
(श्रीमद्भागवतम् 6.1.15)

तो यह वासुदेव-भक्ति जो है, इसको ग्रहण करने से: "वासुदेवे भगवति भक्तियोगः प्रयोजितः । जनयत्याशु वैराग्यम्"—यह जो भौतिक जगत में हमारा मिथ्या आकर्षण है, इससे वैराग्य हो जाएगा। भक्ति की यही सच्ची पहचान है:
"भक्तिः परेशानुभवो विरक्तिरन्यत्र च" (श्रीमद्भागवतम् 11.2.42)।
यह स्वाभाविक बात है। जो वस्तु मैं हूँ ही नहीं, उसमें हमारा इतना interest क्यों हो? मैं शरीर नहीं हूँ, और इस शरीर के लिए दिन भर सूअर और गधे के समान इतना परिश्रम करना उचित नहीं है।

परंतु जो ब्रह्म वस्तु है, उसके विषय में जिज्ञासा करनी चाहिए: "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा"—यह वेदान्त-सूत्र का सूत्र है। और इस विषय में जो जिज्ञासु है, उसके लिए सद्गुरु की आवश्यकता है:
तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम् ।
(श्रीमद्भागवतम् 11.3.21)
उत्तम विषय में... उत्तम विषय यही है: ब्रह्म वस्तु, आत्मज्ञान।

यह शुकदेव गोस्वामी ने बताया। जब महाराज परीक्षित ने निवेदन किया: "महाराज! मेरी केवल सात दिन की परमायु शेष है, मुझे क्या सुनना चाहिए, क्या करना चाहिए, आप बताइए।" तो उस समय शुकदेव गोस्वामी ने कहा:

श्रोतव्यादीनि राजेन्द्र नृणां सन्ति सहस्रशः ।
अपश्यतामात्मतत्त्वं गृहेषु गृहमेधिनाम् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 2.1.2)

यह जो गृहमेधी है, जिसका कोई आत्मिक कार्य नहीं है, केवल संसार का ही भरण-पोषण करना है, उसको 'गृहमेधी' कहा जाता है। और 'गृहस्थ' अलग चीज़ है। गृहस्थ है गृहस्थ-आश्रम—जैसे मुनि लोगों का आश्रम होता है, संन्यास-आश्रम होता है, ब्रह्मचारी-आश्रम होता है, वैसे ही गृहस्थ भी एक आश्रम है। स्त्री-पुत्र-परिवार लेकर रहते हैं, परंतु उद्देश्य होता है कि भगवान की प्राप्ति कैसे हो। उसका नाम गृहस्थ है। और वह उद्देश्य जिसका नहीं है, उसको गृहमेधी कहा जाता है।

तो गृहमेधी कौन है? "अपश्यतामात्मतत्त्वम्"—जो आत्मतत्त्व के विषय में कुछ नहीं जानता, वह गृहमेधी है। उसके विषय में क्या कहा है?

देहापत्यकलत्रादिष्वात्मसैन्येष्वसत्स्वपि ।
तेषां प्रमत्तो निधनं पश्यन्नपि न पश्यति ॥
(श्रीमद्भागवतम् 2.1.4)

यह गृहमेधी है जो समझता है कि हमारा यह जो देह-शरीर है, बड़ा तगड़ा और सुंदर है; अपत्य—संतान भी बड़ी सुंदर है; और कलत्र—स्त्री भी बड़ी सुंदरी है, और हर बात में सब ठीक-ठाक है। वह समझता है कि ये सब हमको बचा लेंगे: "आत्मसैन्येषु"। जैसे राजा युद्ध करता है अपने सैनिकों के बल पर, वैसे ही जो व्यक्ति समझता है कि ये सब मेरे रक्षक सिपाही हैं, और यह नहीं समझता कि ये सब नाश हो जाएंगे—ये सब सिपाही एक दिन समाप्त हो जाएंगे! फिर हमको कौन बचाएगा? वह नहीं समझता: "देहापत्यकलत्रादिष्वात्मसैन्येष्वसत्स्वपि"। वह अपनी आँखों से देख रहा है कि सब विनष्ट हो रहे हैं, फिर भी उन्हीं पर निर्भर करता है। भगवान क्या चीज़ हैं, आत्मा क्या है, इसको नहीं समझता। तो उसको 'प्रमत्त' कहा जाता है—पागल! "प्रमत्तो निधनं पश्यन्नपि न पश्यति"। जैसे कोई पागल व्यक्ति देखता है कि कोई रास्ते पर सोया था और गाड़ी से कुचल गया, फिर भी वह खुद भी सड़क के बीच में जाकर सो जाता है कि "हमको परवाह नहीं।" तो "प्रमत्तो निधनं पश्यन्नपि न पश्यति"।

यह सब विचार करना है कि धर्म क्या चीज़ है। और भगवान स्वयं आकर बता रहे हैं कि असल जो धर्म है, वह उनके चरणों में शरणागत हो जाना है:

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 18.66)

उसमें तुम्हारा सब प्रकार का कल्याण है: "अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि"। उस धर्म का लाभ उठाने के लिए मनुष्य बनना चाहिए। क्योंकि धर्म से विहीन होने पर तो मनुष्य पशु ही रह जाता है। धर्म अवश्य होना चाहिए, बाकी धर्म क्या चीज़ है उसको समझना चाहिए। वह धर्म है: "यतो भक्तिरधोक्षजे"—जिससे भगवान में अनन्य भक्ति हो। भगवान से जो हमारा संबंध टूट गया है, वह पुनः कैसे स्थापित हो, उसके लिए यह वासुदेव-भक्तियोग रूपी धर्म है।

और वह इतना कठिन भी नहीं है, और बहुत सरल भी है। बाकी किसी से कहा जाए कि सब धर्म छोड़कर भगवान वासुदेव के चरणों में शरणागत हो जाओ, तो वे नाराज़ हो जाते हैं, सुनते नहीं! बात वही है। वे आज नहीं समझेंगे, परंतु यदि वे वास्तव में धर्म की खोज करते रहेंगे, तो किसी दिन ज्ञानवान होकर इसी बात को समझेंगे:

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.19)

वही काम करना पड़ेगा, परंतु अनेक जन्मों के बाद। आज नहीं समझा, जब भगवान खुद आकर आग्रह कर रहे हैं कि "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज", तब नहीं समझा। बाकी यदि वह सच्चा जिज्ञासु है—धर्म क्या है, भगवान क्या हैं, जीवन का उद्देश्य क्या है—इस विषय में यदि अनुसंधान करता रहेगा, तो अनेक जन्मों के पश्चात एक दिन अवश्य आएगा जब वह समझेगा कि "वासुदेवः सर्वम्"।

तो बुद्धिमान कौन है? जब अनेक जन्मों के बाद भगवान वासुदेव के शरणागत होना ही हमारा एकमात्र अंतिम उद्देश्य है, तो फिर हम बहुत-से जन्म क्यों नष्ट करें? जो बुद्धिमान है, वह सोचता है—भगवान स्वयं आकर कह रहे हैं, तो इसी क्षण इसे क्यों न स्वीकार कर लें? हम अनेक जन्मों की प्रतीक्षा क्यों करें? यह बुद्धिमान व्यक्ति का लक्षण है। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं:
"कृष्ण भजे सेइ बड़ चतुर"
जो कृष्ण का भजन करता है, वही सबसे अधिक चतुर है; और बाकी सब मूर्ख और गधे हैं।
थैंक यू।

[प्रश्नोत्तरी सत्र]

श्रील प्रभुपाद: आप लोग प्रश्न करिए। कोई सज्जन प्रश्न पूछना चाहें? शंका-समाधान से लाभ होता है, कोई बात सबके मन में होती है, तो उसका स्पष्ट विश्लेषण हो जाता है।

प्रश्नकर्ता 1: जी, कैतव धर्म का और विशेष रूप से प्रतिपादन कर दीजिए।

श्रील प्रभुपाद: कैतव धर्म... जिसमें कुछ वास्तविक लाभ नहीं है—cheating (धोखाधड़ी)। तो cheating में आप क्यों फंसें?

प्रश्नकर्ता 1: तो इसमें सकाम कर्म आ जाते हैं?

श्रील प्रभुपाद: यह जो कामना है कि "हे हनुमान जी! हमारा यह काम कर दीजिए। हे भगवान! हमारा अमुक काम बना दीजिए, हम आपको इतना चढ़ावा चढ़ाएंगे, इतनी पूजा करेंगे।" यह भी कैतव है। "अहैतुकी अप्रतिहता"—इसलिए बताया 'अहैतुकी'। भगवान का भजन करेंगे किसी सांसारिक स्वार्थ के लिए, तो वह भक्ति नहीं है, वह तो business है! कि "इतना पैसा दीजिए तो आपका यह काम कर देंगे। हम पाँच आने का प्रसाद चढ़ाएंगे तो हमारा यह काम हो जाए।" वह business है, वह भक्ति नहीं है।

प्रश्नकर्ता 1: श्रीमद्भागवतम् में आया है कि "चतुर्विधा भजन्ते मां..." आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी। तो उसमें अर्थार्थी भी है जो अपनी आपत्ति से बचना चाहता है और जो अपना कार्य सिद्ध करना चाहता है, उसको 'सुकृती' बताया गया है...

श्रील प्रभुपाद: वह पूर्ण भक्त नहीं है। 'सुकृती' इसलिए है कि वह किसी न किसी बहाने भगवान के पास तो पहुँचा! जैसे अग्नि के पास आने से कुछ न कुछ गर्मी तो अवश्य मिलेगी। इसी प्रकार शास्त्र में बताया है कि यदि तुम्हारी कोई कामना भी है, तब भी तुम अन्यत्र न जाकर केवल भगवान का ही भजन करो। उसमें तुम्हारी कामना भी पूर्ण हो जाएगी और अंततः शुद्ध भक्ति भी प्राप्त होगी। शास्त्र में कहा है:

अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः ।
तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 2.3.10)

तीन प्रकार के व्यक्ति हैं—जिसको कोई भौतिक कामना नहीं है वह 'अकाम' है, जिसको सब प्रकार की कामनाएं हैं वह 'सर्वकाम' है, और जो मोक्ष की कामना करता है वह 'मोक्षकाम' है। यानी कर्मी, ज्ञानी, योगी और भक्त।

तो कर्मी—उसकी भौतिक कामनाएं हैं। और ज्ञानी—उसकी भी कामना है, वह मुक्ति चाहता है, भगवान के साथ एक (लीन) हो जाना चाहता है; उसकी भी अपनी माँग है। कर्मी भौतिक सुख चाहता है—"हमें धन दो, रूप दो, रूपवती भार्या दो, यश दो।" और ज्ञानी जब इन सबमें परेशान हो जाता है, देखता है कि धनी भी हो गए, मिनिस्टर भी बन गए, सब कुछ पा लिया परंतु सुख कहीं नहीं मिला, तब कहता है: "इसको छोड़ो, ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या।" परंतु उसमें भी वही कामना छिपी है कि हम भगवान में लीन हो जाएं—मुक्ति। और योगी जो हैं, वे भी अष्ट-सिद्धियाँ चाहते हैं—अणिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व... बड़ा magic दिखाना चाहते हैं; वे भी सिद्धि की कामना करते हैं।

और 'अकाम' जो है, वह अपने लिए कुछ नहीं चाहता, वह केवल भगवान की प्रसन्नता चाहता है—वही शुद्ध भक्त है।

इसलिए श्री चैतन्य-चरितामृत में बताया गया है:
"भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-कामी — सकलि 'अशान्त' ।
कृष्ण-भक्त — निष्काम, अतएव 'शान्त' ॥"
(चैतन्य-चरितामृत, मध्य 19.149)

जो भुक्ति चाहते हैं—वे कर्मी हैं; जो मुक्ति चाहते हैं—वे ज्ञानी हैं; और जो सिद्धि चाहते हैं—वे योगी हैं। ये सब अशांत हैं: "भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-कामी सकलि अशान्त"।

प्रश्नकर्ता 1: भाई, भक्त भी तो भक्ति चाहता है, वह भी तो एक चाहना ही हुई?

श्रील प्रभुपाद: नहीं, वह तो स्वाभाविक स्थिति है। जैसे... भक्ति भगवान और भक्त का नित्य संबंध है। जैसे हाथ का स्वाभाविक काम शरीर की सेवा करना है, तो हाथ का शरीर की सेवा करना कोई स्वार्थपूर्ण माँगना नहीं है, यह तो उसका स्वाभाविक धर्म है। इसी प्रकार जीव का मूल स्वरूप ही भगवान की नित्य सेवा है। अब भगवान की सेवा छोड़कर जीव जो माया की सेवा में फंसा हुआ है, उससे छूटने के लिए भगवान से प्रार्थना अवश्य करनी चाहिए कि "हे प्रभु! हमें इस माया की दासता से मुक्त कीजिए।"

तो वह प्रार्थना तो अवश्य करनी चाहिए:
अयि नन्दतनूज किङ्करं पतितं मां विषमे भवाम्बुधौ ।
कृपया तव पादपङ्कज-स्थितधूलीसदृशं विचिन्तय ॥
(शिक्षाष्टक 5)
"हे नन्दतनय! मैं आपका नित्य दास हूँ, परंतु अपने दुर्भाग्य से इस घोर भव-सागर में गिर पड़ा हूँ। कृपा करके मुझे अपने चरण-कमलों की एक धूली के समान स्वीकार कर लीजिए।" तो यह प्रार्थना तो अवश्य करनी चाहिए क्योंकि यह उसका स्वाभाविक स्वरूप है। और भुक्ति, मुक्ति, सिद्धि—यह तो माया के जाल में उलझना है। इसलिए ऐसा व्यक्ति अशांत ही रहेगा: "भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-कामी सकलि अशान्त"।

परंतु यदि कोई भुक्ति, मुक्ति अथवा सिद्धि की कामना लेकर भी भगवान की शरण में आता है, तो एक दिन उसे भी शुद्ध भक्ति का लाभ हो जाएगा। जैसे ध्रुव महाराज!

ध्रुव महाराज—जैसे कहा "चतुर्विधा भजन्ते मां"—तो ध्रुव महाराज अपने पिता से भी बड़ा राज्य प्राप्त करने की कामना लेकर वन में तपस्या करने गए थे। नारद जी ने समझाया: "बेटा, तुम अभी बालक हो, तुम्हें इतना क्रोध क्यों है? तुम्हारा क्या मान और क्या अपमान? माता-पिता की बात पर..." बहुत कुछ समझाया। परंतु ध्रुव महाराज ने कहा: "नहीं, यह सब नीति की बातें मैं नहीं सुनना चाहता। आप मुझे कोई उपाय बताइए जिससे मैं साक्षात भगवान का दर्शन कर सकूँ और उनसे अपना राज्य माँग सकूँ।"

तो उन्होंने कठोर तपस्या की और भगवान का साक्षात दर्शन हुआ। और जब भगवान का दर्शन हुआ, तब जब भगवान ने कहा: "लो वत्स, क्या वरदान चाहते हो, माँगो!" तब ध्रुव महाराज बोले:
"स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे।"
(हरिभक्तिसुधोदय 7.28 / चैतन्य-चरितामृत, मध्य 22.42)
"हे नाथ! आपके दर्शन पाकर मैं पूर्णतः कृतार्थ हो गया हूँ, अब मुझे किसी वरदान की किंचित् मात्र भी कामना नहीं रही!"

तो यह परम लाभ होता है यदि कोई भुक्ति, मुक्ति या सिद्धि की कामना लेकर भी भगवान के पास जाता है। जब भगवान की अहैतुकी कृपा उन पर हो जाती है, तब वे फिर सांसारिक वरदान नहीं चाहते। वे कहते हैं: "हे प्रभु! मुझे कुछ नहीं चाहिए, स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे—मैं तो कृतार्थ हो गया।"

"काचं विचिन्वन्नपि दिव्य-रत्नं लब्धं मया..."—मैं तो काँच का टुकड़ा ढूंढने निकला था, और मुझे अमूल्य चिंतामणि-रत्न प्राप्त हो गया! अब मुझे क्या चाहिए?

जब भगवान मिल जाते हैं, फिर मनुष्य संसार की समस्त वस्तुओं को अत्यंत तुच्छ समझता है। जैसे षड्-गोस्वामी गण—वे सब बड़े-बड़े मंत्री थे, सब राज-वैभव त्याग दिया: "त्यक्त्वा तूर्णं अशेष-मण्डल-पति-श्रेणीं सदा तुच्छवत्"। और सब कुछ छोड़कर भिक्षुक बन गए: "कौपीनवन्तौ"। यह सब विचार है।

"परं दृष्ट्वा निवर्तते"—परम सत्य का साक्षात्कार होने पर संसार की तुच्छ भौतिक वस्तुएं स्वतः छूट जाती हैं। इसलिए सभी शास्त्रों में यही निर्देश है कि यदि आपके मन में भुक्ति, मुक्ति या सिद्धि की कोई भी कामना हो, तब भी आप केवल भगवान का ही अनन्य भजन कीजिए। और निष्काम भक्तों के लिए तो कहना ही क्या, केवल भगवद्-भजन ही सर्वोपरि है।

प्रश्नकर्ता 2: ध्यान-योग के विषय में थोड़ा प्रकाश डालिए।

श्रील प्रभुपाद: ध्यान-योग... पहली बात तो यह कि कलियुग में ध्यान-योग का साधन संभव ही नहीं है।
"कृते यद् ध्यायतो विष्णुं..."। 'कृते'—कृत-युग अर्थात सत्य-युग। सत्य-युग में ध्यान, धारणा, प्राणायाम, आसन—यह सब संभव था। अब इस युग में यह संभव नहीं हो सकता।

कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः ।
द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 12.3.52)

कलियुग में वही फल श्रीहरि-संकीर्तन से प्राप्त होता है। संकीर्तन ही सर्वश्रेष्ठ ध्यान है।

और योगियों के लिए जो कहा गया है: "ध्यानावस्थित-तद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनः"। योगी लोग ध्यान करते हैं, तो भगवान श्रीमद् भगवद्गीता में स्वयं स्पष्ट करते हैं:

योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।
श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 6.47)

कि जो योगी अपने अंतःकरण से निरंतर मुझमें मग्न रहकर श्रद्धापूर्वक मेरा भजन करता है, वह सब योगियों में परम श्रेष्ठ है। हरे कृष्ण महामंत्र का जप करने से चौबीसों घंटे भगवान कृष्ण का स्मरण बना रहता है, अतः वह सबसे बड़ा योगी है। उससे बढ़कर ध्यान करने वाला और कौन हो सकता है?! यदि भगवान कृष्ण का निरंतर ध्यान किया जाए, तो वही तो बता रहे हैं—आप सर्वश्रेष्ठ योगी बन जाएंगे।

प्रश्नकर्ता 2: इसके लिए विशेषकर कौन-सा समय उपयुक्त है? क्या कोई नियमित स्मरण-काल है?

श्रील प्रभुपाद: इसके लिए कोई काल-नियम नहीं है। हर समय! हरे कृष्ण महामंत्र का द्वार सबके लिए सदैव खुला हुआ है।

प्रश्नकर्ता 3: ...भगवद्-विषयक राग होने से ही निवृत्ति होती है। तो यह जो आपका उपदेश हुआ, यह तो निवृत्ति की बात अधिक कहता है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि संसार की प्रवृत्ति में पड़ा हुआ मनुष्य भी भगवान को प्राप्त कर ले? तो इसे प्रवृत्ति-मूलक माना जाए या निवृत्ति-मूलक?

श्रील प्रभुपाद: नहीं, इसीलिए तो हमने प्रारंभ में ही कहा था: "स वै पुंसां परो धर्मो..."। 'परो धर्मः' का अर्थ ही है निवृत्ति-मूलक। और प्रवृत्ति-मूलक जो है, वह 'पर धर्म' नहीं है, वह 'अपर धर्म' है। और हम लोग यहाँ पर-धर्म के विषय में चर्चा कर रहे हैं: "स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे"। दो प्रकार का धर्म होता है—प्रवृत्ति-मूलक और निवृत्ति-मूलक। "प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला"। तो निवृत्ति-मूलक धर्म ही ग्रहण करना चाहिए।

प्रश्नकर्ता 3: तो क्या भक्ति को प्रवृत्ति-मूलक नहीं माना जा सकता?

श्रील प्रभुपाद: नहीं, भक्ति प्रवृत्ति-मूलक नहीं है। "भक्तिः परेशानुभवो विरक्तिरन्यत्र च"—भक्ति से स्वतः ही संसार से विरक्ति और निवृत्ति हो जाती है।

प्रश्नकर्ता 3: महाराज जी, भगवद्-विषयक राग तो निवृत्ति-मूलक ही है? राग तो सांसारिक रूप में प्रवृत्ति-मूलक होता है...

श्रील प्रभुपाद: नहीं, राग तो रहेगा ही। एक निकृष्ट व तुच्छ विषय में राग है; उसको त्यागकर जो परम उत्तम विषय में राग होता है, उसका नाम वास्तविक राग है: "परं दृष्ट्वा निवर्तते"।

प्रश्नकर्ता 3: महाराज जी, ऐसा तो नहीं है कि कहीं वेदान्त के ज्ञान-मार्ग को भक्ति के साथ मिलाकर यह बात कही गई हो?

श्रील प्रभुपाद: उसे ज्ञान-मिश्रा भक्ति कहा जाता है। परंतु शुद्ध भक्ति जो है, वह ज्ञान से भी परे और अतीत है।

प्रश्नकर्ता 3: जैसे अजामिल हैं, वे तो कोई ज्ञानी भक्त नहीं थे?

श्रील प्रभुपाद: नहीं, अजामिल अंत में शुद्ध भक्त हो गए। जब उन्होंने मृत्यु के समय भगवान नारायण का नाम उच्चारण किया, तो वे शुद्ध भक्त बन गए। भगवान का नाम और भगवान अभिन्न हैं। जैसे भगवान कहते हैं: "सर्वधर्मान्परित्यज्य... अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि", तो वे समस्त पापों से मुक्त हो गए।

प्रश्नकर्ता 3: नाम की बड़ी अपार महिमा है...

श्रील प्रभुपाद: और ज्ञानी भक्त जो है... सच्चा भक्त स्वतः ही ज्ञानी होता है, भक्त कभी मूर्ख नहीं होता! ज्ञान के पश्चात् ही वास्तविक भक्ति का उदय होता है। यह जो समाज में गलत धारणा है कि मूर्ख लोग ही भक्त बनते हैं और ज्ञानी लोग उनसे बहुत श्रेष्ठ होते हैं, यह भी एक भारी मूर्खता है। क्योंकि बिना यथार्थ ज्ञान के भक्ति हो ही नहीं सकती!
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।"
यह जो भगवान के चरणों में प्रपत्ति (शरणागति) है, यही भक्ति है। और यह कौन करता है? जो अनेक जन्मों तक ज्ञान की साधना करके जब पूर्ण ज्ञानवान बनता है, तब वह भगवान के शरणागत होता है।

प्रश्नकर्ता 3: अनन्य भक्ति का क्या स्वरूप है?

श्रील प्रभुपाद:
अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम् ।
आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ॥
(भक्तिरसामृतसिंधु 1.1.11)

यह उत्तमा भक्ति का लक्षण है। उसमें मानसिक ज्ञान (शुष्क तर्क) की भी आवश्यकता नहीं है और सकाम कर्म की भी आवश्यकता नहीं है। अनुकूल भाव से निरंतर श्री कृष्ण का अनुशीलन करना ही उत्तमा भक्ति है। यह शुष्क ज्ञान से भी बहुत ऊपर की स्थिति है।

भगवान श्रीमद् भगवद्गीता में भी बताते हैं:
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 18.54)

यह ज्ञान की पराकाष्ठा है—ब्रह्मभूत अवस्था, "अहं ब्रह्मास्मि"। उसके बाद सांसारिक हानि-लाभ का कोई शोक नहीं रहता, कोई सांसारिक आकांक्षा नहीं रहती: "न शोचति न काङ्क्षति"। "समः सर्वेषु भूतेषु"—सब जीवों में आत्म-भाव का दर्शन करते हैं। उस ब्रह्मभूत अवस्था के पश्चात्: "मद्भक्तिं लभते पराम्"—तब परा-भक्ति की प्राप्ति होती है। तो भक्ति कोई अज्ञानियों का साधन नहीं है; पूर्ण ज्ञानवान होने के पश्चात् ही मनुष्य सच्चा भक्त बनता है।

और यह जो लोग समझते हैं कि भक्त प्रायः मूर्ख होते हैं—भक्त मूर्ख नहीं हैं, वे ही यथार्थ ज्ञानवान हैं। बाकी संसारी मूर्ख लोग उनको मूर्ख समझते हैं! क्योंकि भगवान स्वयं कहते हैं कि जो मेरा अनन्य भक्त होता है, उसके हृदय का अज्ञान मैं स्वयं दूर करता हूँ:

तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 10.11)

अब बताइए, वह अज्ञानी कैसे रह सकता है, जिसके अज्ञान को नष्ट करने का charge स्वयं सर्वेश्वर भगवान लेते हैं?! उससे बड़ा ज्ञानी और कौन हो सकता है? साधारण ज्ञानी तो केवल mental speculator (मानसिक कल्पक) है, उसके पास वास्तविक ज्ञान कहाँ? और भक्तों के लिए तो भगवान स्वयं विशेष कृपा करते हैं: "तेषामेवानुकम्पार्थम्"।

भगवान सबके हृदय में विराजमान हैं:
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 10.10)
भगवान अंतःकरण से उन्हें ऐसी दिव्य बुद्धि प्रदान करते हैं जिससे वे भगवान को प्राप्त कर सकें। तो उससे बढ़कर ज्ञानी कौन होगा, जो साक्षात भगवान से ज्ञान प्राप्त करता है?! इसलिए जब वह भगवान से ज्ञान प्राप्त करता है, तब वह भली-भाँति समझता है कि "वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः"—वही पूर्ण ज्ञानी है।

प्रश्नकर्ता 3: "भक्त्या मामभिजानाति"—भक्ति के द्वारा वह भगवान के स्वरूप को जानता है कि वे कैसे हैं। तो मनुष्य भक्ति के द्वारा भगवान को जानता है, या जानने के बाद भक्ति करता है?

श्रील प्रभुपाद: भक्ति के द्वारा ही भगवान को समझता है, और समझने के बाद फिर निरंतर भक्ति ही करता है। इसलिए भक्तों का जो प्रयास (साधन) है और उस प्रयास का जो फल (साध्य) है, दोनों एक ही वस्तु हैं। साधन और साध्य दोनों चिन्मय भक्तियोग ही हैं।

प्रश्नकर्ता 3: ज्ञान तो अगम्य है, उसकी कोई थाह नहीं। तो यह कैसे समझा जाए कि हम ज्ञानी हो गए?

श्रील प्रभुपाद: ज्ञान अगम्य उसके लिए है जो अभी तक भगवान तक नहीं पहुँचा; उसके लिए वह अगम्य ही बना रहेगा। और जो भगवान के श्रीचरणों तक पहुँच गया—"वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः"—वह ज्ञानी ज्ञान की पराकाष्ठा तक पहुँच गया है। अतः उसके लिए ज्ञान अब अगम्य नहीं रहा।

प्रश्नकर्ता 4: भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की जो सबसे बड़ी देन हमारे लिए है, उसके विषय में दो मिनट... महाप्रभु चैतन्य के व्यक्तित्व में क्या विशेष वैशिष्ट्य है?

श्रील प्रभुपाद: विशेष वैशिष्ट्य यही है, जो श्रील रूप गोस्वामी जी ने जब महाप्रभु के दर्शन किए और उन्हें साष्टांग प्रणाम किया, तो उन्होंने कहा:

नमो महावदान्याय कृष्णप्रेमप्रदाय ते ।
कृष्णाय कृष्णचैतन्यनाम्ने गौरत्विषे नमः ॥
(चैतन्य-चरितामृत, मध्य 19.53)

यही उनका सर्वोच्च वैशिष्ट्य है। 'वदान्य' किसे कहा जाता है? जो महादानी हो, जो दोनों हाथों से मुक्त हस्त होकर दान करता है, उसे 'वदान्य' कहा जाता है। तो श्रील रूप गोस्वामी ने चैतन्य महाप्रभु को केवल 'वदान्य' नहीं, बल्कि 'महावदान्याय' कहा है। यह चैतन्य महाप्रभु का विशेष वैशिष्ट्य है। क्यों? "कृष्णप्रेमप्रदाय ते"—क्योंकि वे बिना किसी योग्यता का विचार किए मुक्त हस्त से परम दुर्लभ कृष्ण-प्रेम बाँट रहे हैं! यह चैतन्य महाप्रभु की अद्भुत देन है। भगवान कृष्ण को समझना ही अत्यंत कठिन है, और महाप्रभु उस दुर्लभ कृष्ण-प्रेम का ही सहज दान कर रहे हैं!

प्रश्नकर्ता 4: महाराज जी, महाप्रभु जी का जो प्रथम श्लोक है शिक्षाष्टक का—"चेतोदर्पणमार्जनम्", उसकी थोड़ी-सी अपने मुखारविंद से व्याख्या कर दीजिए।

श्रील प्रभुपाद: असल में हम सब जीवों को जो मूल कष्ट है, वह यह है कि हमारे चित्त में अनेक जन्म-जन्मांतरों का मैल और गर्द भरी हुई है; उसका प्रक्षालन होना चाहिए। तो श्रीहरि-संकीर्तन का ऐसा अमोघ प्रभाव है कि सबसे पहला कार्य यही संपन्न होता है:

चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वपणं
श्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधूजीवनम् ।
आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनं
सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्णसङ्कीर्तनम् ॥
(शिक्षाष्टक 1)

जो मैल अनेक जन्म-जन्मांतरों की कठिन तपस्या करके, ज्ञान की शुष्क चर्चा करके और अष्टांग योग करके भी कठिनाई से साफ होता है, वह इस संकीर्तन से सहज ही धुल जाता है—"परं विजयते श्रीकृष्णसङ्कीर्तनम्", "कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं व्रजेत्" (श्रीमद्भागवतम् 12.3.51)। यह जो शास्त्र का निर्देश है कि भगवान कृष्ण के पावन नाम का कीर्तन करने मात्र से ही चित्त-दर्पण में संचित सारा मैल तत्काल विनष्ट हो जाता है—this is the first installment of chanting Hare Krishna mantra: "चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वपणम्"।

और चित्त-दर्पण का मार्जन हो जाने से यह जो हमारा भव-महादावाग्नि है—भूत्वा भूत्वा प्रलीयते, एक बार जन्म लेना, फिर घोर परिश्रम करना, फिर मर जाना और फिर नया जन्म लेना—यह दावाग्नि-रूपी संसार चक्र स्वतः शांत हो जाता है: "भवमहादावाग्निनिर्वपणम्"।

तदुपरांत जीवन का जो वास्तविक परम श्रेय है—विशुद्ध भक्ति—उसका हृदय में पूर्ण विकास होता है: "श्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणम्"। जैसे चंद्रमा की ज्योत्स्ना प्रतिपदा से प्रारंभ होकर पूर्णिमा तक धीरे-धीरे पूर्ण रूप से खिलती है, उसी प्रकार भक्ति-रूपी चंद्र-किरणों का हृदय में क्रमशः विकास होता है। और साधक को पग-पग पर दिव्य परमानंद का आस्वादन प्राप्त होता है: "प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनम्"।

इसलिए "परं विजयते श्रीकृष्णसङ्कीर्तनम्"—conclusion यह है कि भगवान श्री कृष्ण का संकीर्तन ही सदा सर्वोपरि विजय प्राप्त करे।
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥