श्रीमद्भागवतम् के प्रथम स्कन्ध, द्वितीय अध्याय का यह छठा श्लोक है। नैमिषारण्य के ऋषियों ने जब श्रील सूत गोस्वामी से प्रश्न किया था कि जब धर्म और ज्ञान के रक्षक भगवान श्रीकृष्ण अपने परम धाम को पधार गए, तब धर्म और ज्ञान ने किसकी शरण ग्रहण की?
सूत गोस्वामी ने उत्तर दिया:
कृष्णे स्वधामोपगते धर्मज्ञानादिभिः सह ।
कलौ नष्टदृशामेष पुराणार्कोऽधुनोदितः ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.3.43)
भगवान के अपने नित्य धाम लौट जाने के पश्चात् यह श्रीमद्भागवतम् रूपी सूर्य कलियुग के अज्ञानान्धकार को दूर करने के लिए उदित हुआ है।
तो श्रीमद्भागवतम् में बताया गया है कि सबसे श्रेष्ठ धर्म कौन सा है: "स वै पुंसां परो धर्मः"।
'पर' का अर्थ होता है अप्राकृत—इस भौतिक जगत से परे। जैसे श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी दो प्रकृतियों का वर्णन किया है:
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.4-5)
भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार—यह आठ प्रकार की जड़ प्रकृति भगवान की 'अपरा प्रकृति' (भौतिक शक्ति) है। और इस अपरा से परे भगवान की एक 'परा प्रकृति' है—वह है जीव, जो चेतन आत्मा है। हम सभी जीवात्मा परा प्रकृति के अंश हैं।
इसी प्रकार धर्म भी दो प्रकार का होता है:
1. अपरा धर्म: जब केवल इस भौतिक शरीर के स्तर पर धर्म का पालन किया जाता है—कर्मकाण्ड, पुण्य-कर्म, ताकि इस जन्म में और अगले जन्म में स्वर्गलोक जाकर शरीर को सुख मिले। यह अपरा धर्म है, निकृष्ट है।
2. परा धर्म: जो आत्मा का नित्य धर्म है, वह परा धर्म है।
शास्त्र में कहा गया है: "प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला"—भौतिक सुख-भोग की प्रवृत्ति तो सभी जीवों में स्वाभाविक होती है, परंतु उस प्रवृत्ति से निवृत्त होकर आत्मा के स्तर पर कार्य करना ही महान फल देने वाला है।
तो परा धर्म क्या है?
"यतो भक्तिरधोक्षजे"—जिस धर्म के अनुशीलन से भगवान 'अधोक्षज' के प्रति विशुद्ध भक्ति जाग्रत हो, वही सर्वश्रेष्ठ परा धर्म है।
'अधोक्षज' भगवान का नाम है। अक्षज ज्ञान—अर्थात् हमारी इन भौतिक, अपूर्ण इन्द्रियों और मनोधर्म (mental speculation) की सीमा से जो परे हैं, वे 'अधोक्षज' हैं। भगवान को सांसारिक तर्क-वितर्क से नहीं जाना जा सकता, केवल भक्ति के द्वारा ही उनका साक्षात्कार सम्भव है।
और यह भक्ति भौतिक नहीं है, यह ब्रह्म-भूमि पर स्थित है:
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 14.26)
भक्तियोग त्रिगुणों से परे ब्रह्म-स्थिति है। मायावादी केवल ब्रह्म-अनुभूति (अहं ब्रह्मास्मि) तक पहुँचकर रुक जाते हैं, परंतु वास्तविक सिद्धि ब्रह्म-कार्य में प्रवृत्त होना है। और वह ब्रह्म-कार्य क्या है?
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 18.54)
जब मनुष्य यह अनुभव करता है कि "मैं यह हाड़-मांस का शरीर नहीं हूँ, मैं न भारतीय हूँ, न अमेरिकन, न हिन्दू, न मुसलमान; मैं शुद्ध आत्मा हूँ"—तब वह 'ब्रह्मभूत' अवस्था में स्थित होता है। और ब्रह्मभूत अवस्था का लक्षण है कि वह पूर्ण प्रसन्नचित्त हो जाता है; किसी अप्राप्त वस्तु के लिए शोक नहीं करता, किसी सांसारिक वस्तु की लालसा नहीं करता, और सभी जीवों को समभाव से आत्मा के रूप में देखता है:
विद्या-विनय-सम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 5.18)
और यह दिव्य ज्ञान भगवान वासुदेव की भक्ति से अत्यंत शीघ्र प्राप्त हो जाता है:
वासुदेवे भगवति भक्तियोगः प्रयोजितः ।
जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यदहैतुकम् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.2.7)
धर्म का वास्तविक अर्थ है भगवान की आज्ञाओं का पालन करना: "धर्मं तु साक्षाद् भगवत्प्रणीतम्"। और भक्ति का अर्थ है भगवान की सेवा (भज् सेवायाम्)।
भक्ति नौ प्रकार की होती है (नवधा भक्ति):
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् ।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 7.5.23)
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः: भगवान विष्णु का ही श्रवण और कीर्तन करना चाहिए, किसी सांसारिक या राजनीतिक प्रपंच का नहीं।
अर्चनम्: मन्दिर जाना, श्रीविग्रह को प्रणाम करना, आरती के दर्शन करना—यह सब अज्ञात सुकृति के खाते में जमा होता है।
यह सुकृति थोड़ी-थोड़ी संचित होते-होते एक दिन महान फल देती है:
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 2.40)
इसका प्रत्यक्ष प्रमाण श्रीमद्भागवतम् के छठे स्कन्ध में अजामिल का उपाख्यान है। अजामिल एक सदाचारी ब्राह्मण-पुत्र था, परंतु कुसङ्ग के कारण वेश्यागामी, मद्यप और दुराचारी बन गया। परंतु पूर्वकृत सुकृति के कारण उसने अपने सबसे छोटे पुत्र का नाम 'नारायण' रखा था। पुत्र-स्नेह के कारण वह दिन भर पुकारता रहता था: "बेटा नारायण, इधर आओ; नारायण, दूध पी लो।" मृत्यु के समय जब यमदूत उसे पाश में बाँधने आए, तो अत्यंत भयभीत होकर उसने अपने पुत्र को पुकारा: "नारायण!" मृत्यु-काल में अनायास ही भगवान के पवित्र नाम का उच्चारण होने से चार दिव्य विष्णुदूत तुरंत प्रकट हो गए और उन्होंने यमदूतों के बन्धन से अजामिल की रक्षा कर ली!
तो कलियुग में यह जो भक्ति का मार्ग है, विशेषकर श्रवण और कीर्तन, यह परम प्रशस्त मार्ग है। हमारा यह कृष्ण-भावनामृत आन्दोलन यही सिखाता है कि आपको अपना घर-बार या व्यवसाय छोड़ने की आवश्यकता नहीं है:
ज्ञाने प्रयासमुदपास्य नमन्त एव
जीवन्ति सन्मुखरितां भवदीयवार्ताम् ।
स्थाने स्थिताः श्रुतिगतां तनुवाङ्मनोभिर्
ये प्रायशोऽजित जितोऽप्यसि तैस्त्रिलोक्याम् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 10.14.3)
आप जहाँ हैं, वहीं रहिए; केवल अपने कानों को भगवान श्रीकृष्ण की अमृतमयी कथा और नाम सुनने में लगाइए:
शृण्वतां स्व-कथाः कृष्णः पुण्य-श्रवण-कीर्तनः ।
हृद्यन्तस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत् सताम् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.2.17)
भगवान प्रत्येक जीव के हृदय में परमात्मा रूप से विराजमान हैं: "ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति"। जब वे देखते हैं कि कोई जीव उनकी कथा सुनने में रुचि ले रहा है, तो वे स्वयं उसके हृदय में बैठकर जन्म-जन्मान्तरों के संचित कलिमल को धोकर निर्मल कर देते हैं।
मनुष्य जीवन भोग के लिए नहीं, अपितु तपस्या के लिए मिला है:
नायं देहो देहभाजां नृलोके
कष्टान् कामानर्हते विड्भुजां ये ।
तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं
शुद्ध्येद्यस्माद् ब्रह्मसौख्यं त्वनन्तम् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 5.5.1)
ऋषभदेव अपने पुत्रों से कहते हैं कि यह मानव शरीर सूअर और गधे की तरह दिन-रात केवल इन्द्रिय-तृप्ति और विष्ठा के लिए भटकने हेतु नहीं मिला है। मनुष्य जीवन दिव्य तपस्या के लिए है, जिससे हमारा अस्तित्व शुद्ध हो और हमें अक्षय ब्रह्म-सुख प्राप्त हो।
यही हमारी सनातन भारतीय संस्कृति है। महाराज भरत, जिनके नाम पर इस देश का नाम 'भारतवर्ष' पड़ा, उन्होंने मात्र चौबीस वर्ष की आयु में अपना विशाल साम्राज्य, सुन्दरी रानी और राज-सुख त्यागकर वन में जाकर तपस्या की थी!
तो इस तपस्या का प्रारम्भ चार नियमों के पालन से होता है:
1. अवैध स्त्री-सङ्ग का त्याग
2. मांसाहार (पशु-हिंसा) का त्याग
3. नशे (शराब, बीड़ी, चाय, कॉफ़ी) का त्याग
4. द्यूत (जुआ) का त्याग
जब मनुष्य इन चार पाप-कर्मों से मुक्त होता है, तभी वह दृढ़तापूर्वक भगवान का भजन कर सकता है:
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.28)
और कलियुग में सबसे सरल और सार्वभौमिक साधन है—श्रीकृष्ण का नाम-संकीर्तन:
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम् ।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥
(बृहन्नारदीय पुराण)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥
इस हरिनाम पर प्रत्येक मनुष्य का समान अधिकार है:
किरात-हूणान्ध्र-पुलिन्द-पुल्कशा
आभीर-शुम्भा यवनाः खसादयः ।
येऽन्ये च पापा यदपाश्रयाश्रयाः
शुद्ध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः ॥
(श्रीमद्भागवतम् 2.4.18)
चाहे कोई किसी भी देश, कुल या जाति में उत्पन्न हुआ हो, यदि वह भगवान के अनन्य भक्तों का आश्रय लेकर हरिनाम का कीर्तन करता है, तो वह तत्काल परम पवित्र हो जाता है।
श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं:
चेतो-दर्पण-मार्जनं भव-महा-दावाग्नि-निर्वपणम्...
(श्री शिक्षाष्टकम् 1)
जैसे दर्पण पर जमी धूल साफ़ हो जाने पर मुख स्पष्ट दिखाई देता है, उसी प्रकार हरिनाम के संकीर्तन से हृदय-दर्पण का मैल साफ़ हो जाता है और जीव अपने शुद्ध चिन्मय स्वरूप का साक्षात्कार करके नित्य आनन्द को प्राप्त होता है।
यही हमारा सन्देश है। आप सब अपने-अपने घरों में रहिए, मर्यादापूर्वक रहिए, प्रतिदिन श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीमद्भागवतम् का श्रवण कीजिए और हरे कृष्ण महामन्त्र का जप कीजिए। इसी से आपका यह मानव जीवन परम सफल हो जाएगा। Thank you very much. हरे कृष्ण!
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥