श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  731115SB-DELHI_Hindi
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
श्रीमद् भागवतम 1.2.10
दिल्ली, 15-नवंबर-1973
 
 
 
कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभो जीवेत यावता ।
जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभिः ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.2.10)

So our foreign students will excuse me, I promised to speak in Hindi tonight.

कल एक भद्र पुरुष ने मुझसे अनुरोध किया था कि "स्वामी जी, कम से कम पाँच मिनट आप हिन्दी में बोलिए।" पाँच मिनट नहीं, आज पूरा प्रवचन मैं हिन्दी में ही करूँगा। हिन्दी में बोलने का मुझे विशेष अभ्यास नहीं है, शरीर भी बंगाल का है, परंतु टूटी-फूटी बोलने पर भी आप लोग केवल भावार्थ ग्रहण कीजिएगा; भाषा के व्याकरण की दृष्टि से नहीं। क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण भी 'भावग्राही जनार्दन' हैं, वे भाषा नहीं, हृदय का शुद्ध भाव देखते हैं।

तो श्रीमद्भागवतम् में श्रील सूत गोस्वामी बता रहे हैं: "कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभो जीवेत यावता।"
इन्द्रिय-तर्पण—हमारी ये जो दसों इन्द्रियाँ हैं, इनके निर्वाह के लिए कुछ भोग तो चाहिए ही। इन्द्रियों को बिल्कुल सुखा देना—यह हमारा prescription (निर्देश) नहीं है। परंतु इन्द्रियों का संयम करना होगा, क्योंकि मनुष्य जीवन का मूल धर्म ही है—इन्द्रिय-संयम। पशु और मनुष्य में यही एकमात्र भेद है।

एक कुत्ता मार्ग पर स्वच्छन्द मैथुन करता है, उसमें कोई संयम नहीं है; और उसे कुछ कहने से लाभ भी नहीं क्योंकि वह पशु है। परंतु यदि कोई मनुष्य मार्ग पर ऐसा आचरण करे, तो पुलिस तुरंत उसे गिरफ़्तार करेगी, क्योंकि समाज में कानून और मर्यादा है। जितने भी नियम, विधान, पुस्तकें और शिक्षा हैं—वे सब मनुष्यों के लिए हैं, पशुओं के लिए नहीं।

मनुष्य के पास भी काम-वासना और इन्द्रियाँ हैं, उन्हें भी कुछ न कुछ आहार और निर्वाह देना ही होगा। इसलिए शास्त्रों में नियमित विधि का विधान है:
लोके व्यवायामिषमद्यसेवा
नित्यास्तु जन्तोर्न हि तत्र चोदना ।
व्यवस्थितिस्तेषु विवाह-यज्ञ-
सुराग्रहैरासु निवृत्तिरिष्टा ॥
(श्रीमद्भागवतम् 11.5.11)

समस्त जीवों में स्त्री-सङ्ग, मांसाहार और नशे की स्वाभाविक पशु-प्रवृत्ति होती है। इसके लिए किसी University में पढ़ने की आवश्यकता नहीं होती। परंतु मनुष्य का कर्तव्य है कि वह इस पशु-प्रवृत्ति को नियन्त्रित करे। जो अपनी इन्द्रियों को वश में कर लेता है, वही 'जितेन्द्रिय' कहलाता है। इसलिए तपस्या, ब्रह्मचर्य और धर्म के नियम केवल इसीलिए बनाए गए हैं ताकि जीव को इस पाशविक पतन से रोका जा सके।

भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद् भगवद्गीता में कहते हैं: "धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ" (श्रीमद् भगवद्गीता 7.11)—धर्म के अनुकूल जो काम है, वह मेरा ही स्वरूप है। विवाह का संस्कार इसीलिए है ताकि मनुष्य एक पत्नी के साथ मर्यादित रहकर जीवन बिताए, कुत्तों और सूअरों की तरह जहाँ-तहाँ स्वच्छन्द न भटके।

इसलिए शास्त्र कहते हैं: "कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभो जीवेत यावता"—अपनी कामनाओं को केवल जीवन-निर्वाह तक सीमित रखो; इन्द्रिय-तृप्ति को जीवन का लक्ष्य मत बनाओ। जितनी शरीर की आवश्यकता है, उतना ही ग्रहण करो। ऐसा नहीं कि घर से भरपेट भोजन करके निकले और बाज़ार में कटलेट-चाप देखकर जीभ के वशीभूत होकर पुनः खा लिया! यह तो पशु-स्वभाव है।

पाश्चात्य देशों में आप मार्गों पर केवल तीन चीज़ों के बड़े-बड़े विज्ञापन देखेंगे—शराब, सिगरेट और नग्न स्त्री! यही कामुकता का जाल है। शास्त्र कहते हैं कि इसे सीमित करो, केवल उतना ही स्वीकार करो जिससे शरीर स्वस्थ रहे और भगवान का भजन हो सके।

तो फिर मनुष्य का वास्तविक कार्य क्या है?
"जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभिः।"
मनुष्य जीवन का एकमात्र प्रयोजन है—तत्त्व-जिज्ञासा! यह मानव जीवन केवल खाने, पीने और इन्द्रिय-भोग करके अंत में कुत्ते-बिल्ली की योनि में जाने के लिए नहीं मिला है:
न ते विदुः स्वार्थ-गतिं हि विष्णुं
दुराशया ये बहिरर्थ-मानिनः ।
अन्धा यथान्धैरुपनीयमानास्
तेऽपीश-तन्त्र्यामुरु-दाम्नि बद्धाः ॥
(श्रीमद्भागवतम् 7.5.31)

वेदान्त-सूत्र का पहला सूत्र है: "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा"—अब मनुष्य जीवन में परब्रह्म के विषय में जिज्ञासा करो। और उसी वेदान्त-सूत्र का प्रामाणिक भाष्य श्रीमद्भागवतम् है:
अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां भारतार्थ-विनिर्णयः ।
गायत्री-भाष्य-रूपोऽसौ वेदार्थ-परिवृंहितः ॥
(गरुड़ पुराण)

वेदान्त-सूत्र की 'ब्रह्म-जिज्ञासा' और श्रीमद्भागवतम् की 'तत्त्व-जिज्ञासा' एक ही हैं। परमतत्त्व क्या है?
वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम् ।
ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.2.11)

"जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभिः"—सकाम कर्मों के फेर में पड़कर दिन-रात गधों की तरह पिसने में कोई सार्थकता नहीं है। कर्मी लोग दिन-रात धनोपार्जन के लिए पागल रहते हैं:
दिवा चार्थेहया राजन् कुटुम्ब-भरणेन वा ।
निद्रया ह्रियते नक्तं व्यवायेन च वयस्तथा ॥
(श्रीमद्भागवतम् 2.1.3)

दिन में धन कमाने की दौड़-धूप और रात में निद्रा व मैथुन में अमूल्य आयु बीत जाती है!
अपश्यतामात्म-तत्त्वं गृहेषु गृह-मेधिनाम् ।
(श्रीमद्भागवतम् 2.1.2)
ये अज्ञानी लोग आत्म-तत्त्व को नहीं देखते।

हमारा यह Krishna Consciousness Movement (कृष्ण-भावनामृत आन्दोलन) केवल इसी तत्त्व-जिज्ञासा के लिए है। श्रीमद् भगवद्गीता को यथारूप पढ़िए, उसमें अपनी मनगढ़ंत खिचड़ी मत पकाइए! जैसे डॉक्टर की लिखी हुई औषधि की शीशी पर निर्देश होता है कि पानी के साथ भोजन से पूर्व दो बूँद लीजिए; यदि आप उसमें अपनी मनमानी करेंगे, तो स्वास्थ्य लाभ नहीं होगा। उसी प्रकार श्रीमद् भगवद्गीता को वैसे ही समझिए जैसा स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है।

और यह तत्त्व-जिज्ञासा कहाँ जाकर करनी होगी?
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्
समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥
(मुण्डक उपनिषद् 1.2.12)

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 4.34)

किसी बीड़ी-सिगरेट पीने वाले तथाकथित पण्डित के पास नहीं, जो गीता बोलते-बोलते गला सूखने पर कहे कि "लाओ जी, दो बीड़ी लाओ!" ऐसे पाखण्डियों से चार हज़ार वर्ष तक भी गीता सुनेंगे, तो कोई ज्ञान प्राप्त नहीं होगा। प्रामाणिक, ब्रह्मनिष्ठ, तत्त्वदर्शी गुरु के चरणों में जाइए।

वहाँ जाकर तीन बातें कीजिए:
1. प्रणिपातेन: पूर्ण शरणागति। यह स्वीकार करना कि "मैं अज्ञानी हूँ, हे गुरुदेव! मैं आपके चरणों में समर्पित हूँ।"
2. परिप्रश्नेन: तत्त्व की गम्भीर जिज्ञासा।
3. सेवया: निष्कपट सेवा। क्योंकि आध्यात्मिक ज्ञान सेवा के द्वारा ही हृदय में प्रकाशित होता है।

भगवान का सच्चा प्रतिनिधि वही है जो केवल वही बात कहे जो स्वयं भगवान ने कही है: "मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु" और "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज"। जो अपनी ओर से कोई नई बात नहीं गढ़ता, वही प्रामाणिक गुरु है।

दिन-रात सकाम कर्मों में गधे की तरह भटकने की कोई आवश्यकता नहीं है। गधा दिन भर धोबी के मैले कपड़ों का भारी बोझ ढोता है, और बदले में उसे केवल थोड़ी सी सूखी घास मिलती है! वह यह नहीं सोचता कि यह घास तो मुझे वन में भी मिल सकती थी, फिर मैं इस धोबी का बोझ क्यों ढो रहा हूँ? इसी प्रकार आज के कर्मी लोग दिन-रात कार्यालयों और फ़ैक्टरियों में पसीना बहाते हैं, और खाते क्या हैं? दो टोस्ट और एक कप चाय!

शास्त्र में श्रील प्रह्लाद महाराज और श्रील व्यासदेव कहते हैं:
तस्यैव हेतोः प्रयतेत कोविदो
न लभ्यते यद्भ्रमतामुपर्यधः ।
तल्लभ्यते दुःखवदन्यतः सुखं
कालेन सर्वत्र गभीर-रंहसा ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.5.18)

चौरासी लाख योनियों में भटकते हुए जो दुर्लभ भगवद्-भक्ति प्राप्त नहीं हुई, केवल उसी के लिए बुद्धिमान मनुष्य को प्रयत्न करना चाहिए! जहाँ तक भौतिक सुख और दुःख का प्रश्न है, वह तो पूर्वजन्मों के कर्मानुसार बिना माँगे ही मिलता है। जैसे कोई भी व्यक्ति दुःख नहीं चाहता, फिर भी सिर पर दुःख आ ही जाता है; उसी प्रकार जितना सुख आपके भाग्य में लिखा है, वह भी समय आने पर अपने आप मिल जाएगा।

ब्रह्मलोक में ब्रह्मा जी की आयु भी लाखों-करोड़ों वर्ष है:
सहस्र-युग-पर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।
रात्रिं युग-सहस्रान्तां तेऽहोरात्र-विदो जनाः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 8.17)

परंतु वहाँ भी मृत्यु निश्चित है:
आब्रह्म-भुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
(श्रीमद् भगवद्गीता 8.16)

हिरण्यकशिपु ने ब्रह्मा जी से अमरता माँगी। ब्रह्मा जी ने कहा: "मैं स्वयं नित्य नहीं हूँ, तुम्हें अमर कैसे बना सकता हूँ?" तो हिरण्यकशिपु ने छल से वरदान माँगे कि न दिन में मरूँ, न रात में, न अस्त्र से, न शस्त्र से, न भीतर, न बाहर। परंतु भगवान नृसिंहदेव बनकर आए और उसकी समस्त चतुराई को एक क्षण में समाप्त कर दिया!
मृत्युः सर्वहरश्चाहम्...
(श्रीमद् भगवद्गीता 10.34)

जो लोग भगवान की शरण में नहीं आते, उनके लिए भगवान काल और मृत्यु बनकर आते हैं और उनका सारा धन, सत्ता, परिवार और अहंकार एक पल में छीन लेते हैं!

भगवान कहते हैं:
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.15)
दुष्कृति: जिनकी बुद्धि बड़ी प्रखर है, परंतु वे उसका उपयोग विनाशकारी कार्यों में, एटम बम बनाने में करते हैं।
मूढ़: जो गधे की तरह केवल पेट भरने के लिए दिन-रात कोल्हू के बैल बने रहते हैं।
नराधम: जिन्हें दुर्लभ मनुष्य शरीर मिला, परंतु उन्होंने तत्त्व-जिज्ञासा नहीं की।
माययापहृतज्ञाना: जिनके पास लौकिक डिग्रियाँ हैं, परंतु माया ने जिनका वास्तविक ज्ञान हर लिया है।
आसुरं भावमाश्रिताः: जो नास्तिक हैं और कहते हैं कि "ईश्वर कुछ नहीं है!" जैसे रावण और हिरण्यकशिपु।

जब भगवान नृसिंहदेव ने प्रह्लाद महाराज से वरदान माँगने को कहा, तो प्रह्लाद जी ने कहा: "हे नाथ! मैं कोई व्यापारी नहीं हूँ जो आपकी भक्ति का सौदा करूँ। मेरे पिता हिरण्यकशिपु इतने बलवान थे कि देवता भी उनके भय से काँपते थे, परंतु आपने उन्हें क्षण भर में समाप्त कर दिया। मुझे ऐसा कोई भौतिक ऐश्वर्य नहीं चाहिए। मुझे तो केवल अपने शुद्ध भक्तों के दासों के दासों की सेवा का सौभाग्य प्रदान कीजिए!"

यही वास्तविक तत्त्व-जिज्ञासा है। अपने मनुष्य जीवन को व्यर्थ मत गँवाइए; काम को नियमित कीजिए, श्रीमद्भागवतम् का आश्रय लीजिए, तत्त्व-जिज्ञासा कीजिए और श्रीकृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन करके अपने जीवन को कृतार्थ कीजिए। हरे कृष्ण!
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥