श्री चैतन्य महाप्रभु प्रमाण-वचन दे रहे हैं कि निर्विशेष और सविशेष में क्या सम्बन्ध है। विशेष का अर्थ यही होता है कि भगवान की जो विशेषता है, वह भौतिक विशेषता नहीं है। जैसा कल हम लोग बता रहे थे कि भगवान की माखन-चोरी भौतिक विशेषता नहीं है, वह पारमार्थिक, चिन्मय राज्य की विशेषता है। चिन्मय राज्य में भी जैसे यहाँ सब वस्तुएँ हैं, वैसे ही वहाँ भी हैं; क्योंकि "जन्माद्यस्य यतः"—ब्रह्म-वस्तु, चित्-वस्तु से ही समस्त वस्तुओं की उत्पत्ति होती है।
जैसे यहाँ जो विविध वृत्तियाँ हैं, वे भी वहीं से आई हैं। अंतर यह है कि वहाँ की विशेषता उपादेय (विशुद्ध) है और यहाँ की विशेषता उसकी विकृत प्रतिच्छाया है। वेदान्त में बताते हैं: "सत्यस्य सत्यम्"। वास्तविक वस्तु चिन्मय राज्य में परम सत्य रूप में विद्यमान है, और इस भौतिक जगत में उसका केवल आभास दिखाई पड़ता है। जैसे मरुभूमि में मरीचिका होती है—जल एक सत्य वस्तु है, परंतु मरुभूमि में जहाँ उसकी प्रतीति हो रही है, वहाँ वह सत्य नहीं है, मिथ्या है। इसी प्रकार संसार के समस्त रस चिन्मय जगत में सत्य रूप से प्रकाशित हैं, और यहाँ उनका विकृत प्रतिफलन है।
इसलिए वेदों और उपनिषदों में जहाँ परब्रह्म को निर्विशेष या निराकार रूप से प्रतिपादित करने का प्रयत्न दिखता है, उसका तात्पर्य केवल यही है कि भगवान का जो अप्राकृत दिव्य आकार है, उसे समझाने के लिए भौतिक आकार का निषेध किया जाता है। जैसे भगवान का स्वरूप है—सच्चिदानन्द विग्रह। अब सच्चिदानन्द विग्रह को इस बद्ध-अवस्था में हम अपनी स्थूल इन्द्रियों से अनुभव नहीं कर सकते, इसलिए उसे प्राकृत दृष्टि से 'निराकार' कह दिया जाता है कि भगवान का आकार हमारे जैसा हाड़-मांस का नहीं है।
अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद् ग्राह्यमिन्द्रियैः ।
सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः ॥
(भक्ति-रसामृत-सिन्धु 1.2.234)
हमारी इन जड़ इन्द्रियों से हम सच्चिदानन्द विग्रह का अनुभव नहीं कर सकते। केवल भगवान का विग्रह ही नहीं, अपितु भगवान का नाम, रूप, गुण, लीला और परिकर—समस्त वस्तुएँ अप्राकृत हैं।
जैसे श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि भगवान षड्-ऐश्वर्यपूर्ण हैं। जो षड्-ऐश्वर्यपूर्ण हैं, वे निराकार कैसे हो सकते हैं? अंग्रेज़ी में कहते हैं—"God is great"। अब समझ लीजिए कि 'greatness' (महानता) की अनुभूति हम कैसे करते हैं? निराकार मानने से तो उनकी महानता का कोई अनुभव ही नहीं हो सकता। हम संसार में बड़ा किसको मानते हैं? जो व्यक्ति सर्वाधिक धनी हो, उसे बड़ा मानते हैं; जो अत्यंत बलवान हो, उसे बड़ा मानते हैं; जो महा-ज्ञानवान हो, रूपवान हो, यशस्वी हो या परम त्यागी हो, उसे बड़ा मानते हैं। इस प्रकार व्यक्तित्व में ही महानता की अभिव्यक्ति होती है:
ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशसः श्रियः ।
ज्ञान-वैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीङ्गना ॥
(विष्णु पुराण 6.5.47)
तो भगवान जब सर्व-ऐश्वर्य से परिपूर्ण हैं, तो वे निराकार कैसे हो सकते हैं? इसलिए चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि वेदों में जहाँ कहीं निर्विशेष का वर्णन है, वह केवल भगवान के अप्राकृत रूप को प्रतिपादित करने के लिए ही भौतिक आकार का निषेध करता है। यह नहीं कि उनका कोई आकार ही नहीं है! जैसे यह गिलास है, मैं कह सकता हूँ कि यह चश्मा नहीं है; परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि इसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। हम समझते हैं कि आकार का अर्थ केवल हमारे जैसा क्षणभंगुर शरीर होता है, जो आज है और कल नष्ट हो जाएगा। इस हिसाब से भगवान निराकार हैं, क्योंकि उनका शरीर ऐसा नश्वर नहीं है।
जैसे भगवान ने अर्जुन से कहा: "हे अर्जुन! तुम्हारे और मेरे अनेक जन्म हो चुके हैं। मुझे अपने समस्त जन्मों का स्मरण है, परंतु तुम्हें स्मरण नहीं है।" इससे सिद्ध होता है कि भगवान का स्वरूप अर्जुन के प्राकृत शरीर जैसा नहीं है। हम अपने पूर्वजन्म का स्वरूप भूल चुके हैं क्योंकि यह भौतिक शरीर क्षणिक है। और भगवान कभी नहीं भूलते, इसका अर्थ है कि उनका स्वरूप नित्य, अप्राकृत सच्चिदानन्द है:
ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः ।
अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम् ॥
(ब्रह्म-संहिता 5.1)
यदि भगवान निराकार होते, तो उनसे साकार संतानों की उत्पत्ति कैसे होती? भगवान स्वयं कहते हैं: "अहं बीजप्रदः पिता" (श्रीमद् भगवद्गीता 14.4)—मैं समस्त जीवों का परम पिता हूँ। यदि संतानों के व्यक्तिगत रूप और आकार हैं, तो परम पिता निराकार कैसे हो सकते हैं? निराकार से साकार की उत्पत्ति कैसे सम्भव है? अतः शास्त्र में जहाँ भी निराकार का वर्णन आता है, उसका गूढ़ सिद्धान्त यही है कि उनका रूप प्राकृत त्रिगुणों से परे सच्चिदानन्दमय है।
श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि उपनिषदों में ब्रह्म का लक्षण बताया गया है:
यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति
यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद्विजिज्ञासस्व तद् ब्रह्मेति ॥
(तैत्तिरीय उपनिषद् 3.1.1)
जहाँ से चराचर समस्त जीवों की उत्पत्ति होती है, जिसमें सबकी स्थिति है, और प्रलय के समय सब जिसमें विलीन हो जाते हैं—वह ब्रह्म है। वेदान्त-सूत्र का भी यही वचन है: "जन्माद्यस्य यतः"। और श्रीमद्भागवतम् के प्रथम श्लोक में भी यही प्रतिपादित है:
जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतः चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्...
(श्रीमद्भागवतम् 1.1.1)
और भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद् भगवद्गीता में कहते हैं:
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्...
(श्रीमद् भगवद्गीता 14.27)
उस निर्विशेष ब्रह्म की प्रतिष्ठा भी स्वयं श्रीकृष्ण हैं। अपादान, करण और अधिकरण—ये तीनों कारक ब्रह्म-वस्तु के हैं। ब्रह्म से इस विश्व का जन्म है, ब्रह्म में स्थिति है और ब्रह्म में ही लय है। इसलिए ब्रह्म निर्विशेष नहीं हो सकता, वह पूर्णतः सविशेष है।
जब सृष्टि के प्रारम्भ में भगवान ने इच्छा की: "एकोऽहं बहु स्याम्"—मैं एक हूँ, बहुत हो जाऊँ; तब भगवान ने अपनी दृष्टि से प्रकृति में गर्भाधान किया। श्री चैतन्य महाप्रभु यहाँ सूक्ष्म विचार प्रस्तुत करते हैं कि जब भौतिक सृष्टि हुई ही नहीं थी, उस समय भगवान ने ईक्षण (विलोकन) किया। अतः भगवान का वह ईक्षण, उनका मन और उनकी इच्छा पूर्णतः अप्राकृत है। जैसे बाइबल में भी कहा गया है: "God said, let there be light, and there was light." जब सृष्टि से पूर्व ईश्वर ने कहा, तो वह वाणी और उनकी सत्ता प्राकृत नहीं थी।
श्रीमद् आद्य शंकराचार्य ने भी अपने गीता-भाष्य में स्वीकार किया है:
"नारायणः परोऽव्यक्तादण्डमव्यक्तसम्भवम्।"
नारायण अव्यक्त प्रकृति और महत्तत्त्व से परे हैं। अतः भगवान का अवलोकन और उनका सच्चिदानन्द विग्रह प्राकृत नहीं है।
भगवान के स्वरूप के तीन स्तर शास्त्रों में बताए गए हैं:
वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम् ।
ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.2.11)
परमतत्त्व एक ही है, जिसे साधक अपनी योग्यता के अनुसार ब्रह्म, परमात्मा और भगवान के रूप में अनुभव करते हैं। जो साधक दूर से देखता है, उसे केवल ब्रह्म-ज्योति का आभास होता है; जो योग द्वारा भीतर देखता है, उसे परमात्मा की अनुभूति होती है; और जो प्रेम-भक्ति द्वारा साक्षात् दर्शन करता है, उसे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण की प्राप्ति होती है।
जैसे दूर से किसी पर्वत को देखने पर वह काले मेघ जैसा एक आकारहीन पिण्ड प्रतीत होता है। थोड़ा निकट जाने पर वृक्ष, हरियाली और शिलाएँ दिखाई देती हैं। और जब कोई पर्वत पर स्वयं पहुँच जाता है, तो वहाँ नगर, लोग, पशु-पक्षी, झरने सब विशेषताएँ प्रत्यक्ष दिखाई देती हैं। इसी प्रकार जब तक कोई भगवान के दिव्य स्वरूप तक नहीं पहुँचता, तब तक उसे केवल निर्विशेष ब्रह्म का ही भान होता है।
श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान कहते हैं:
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.19)
अनेक जन्मों के ज्ञान-अनुशीलन के पश्चात् जब मनुष्य यह समझता है कि भगवान वासुदेव ही सर्वस्व हैं, तब उसका ज्ञान पूर्ण होता है। केवल अपने को 'मुक्त' मान लेने से मुक्ति नहीं होती:
येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्
त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः ।
आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः
पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः ॥
(श्रीमद्भागवतम् 10.2.32)
जिन्होंने भगवान के चरण-कमलों का आश्रय नहीं लिया, वे कठिन तपस्या करके ब्रह्म-पद तक पहुँचकर भी पुनः इस संसार में गिर जाते हैं, क्योंकि उनकी बुद्धि अविशुद्ध है।
वेदों का वास्तविक अर्थ समझाने के लिए ही व्यासदेव ने पुराणों और महाभारत की रचना की:
स्त्री-शूद्र-द्विज-बन्धूनां त्रयी न श्रुति-गोचरा ।
कर्म-श्रेयसि मूढानां श्रेय एवं भवेदिह ।
इति भारतमाख्यानं कृपया मुनिना कृतम् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.4.25)
वेदों के गूढ़ मन्त्रों को जनसाधारण समझ नहीं सकते थे, इसलिए व्यासदेव ने कृपा करके महाभारत के रूप में इतिहास प्रस्तुत किया, जिसमें श्रीमद्भगवद्गीता का सार निहित है।
पुराण तीन श्रेणियों में हैं—सात्विक, राजसिक और तामसिक। श्रीमद्भागवतम् अमलमहापुराण है, जो विशुद्ध सात्विक है:
सत्यं परं धीमहि ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.1.1)
राजसिक और तामसिक पुराणों में जो मांस-मद्य या बलि की अनुमति दी गई है, वह प्रवृत्ति को बढ़ाने के लिए नहीं, अपितु उसे नियन्त्रित और मर्यादित करने के लिए है:
लोके व्यवायामिषमद्यसेवा
नित्यास्तु जन्तोर्न हि तत्र चोदना ।
व्यवस्थितिस्तेषु विवाह-यज्ञ-
सुराग्रहैरासु निवृत्तिरिष्टा ॥
(श्रीमद्भागवतम् 11.5.11)
जैसे सरकार मदिरा की दुकान खोलती है और भारी टैक्स लगाती है, इसका अर्थ यह नहीं कि सरकार सबको शराबी बनाना चाहती है; वह अनियन्त्रित व्यसन को रोकने का एक उपाय है। शास्त्र का वास्तविक उद्देश्य तो पूर्ण निवृत्ति है।
और हृदय के समस्त विकारों को नष्ट करने का एकमात्र उपाय है—भगवत्-कथा का श्रवण:
शृण्वतां स्व-कथाः कृष्णः पुण्य-श्रवण-कीर्तनः ।
हृद्यन्तस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत् सताम् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.2.17)
जब भगवान देखते हैं कि कोई जीव निष्कपट भाव से उनकी कथा सुन रहा है, तो वे स्वयं उसके हृदय में बैठकर समस्त कलिमल को धो देते हैं।
प्रश्नोत्तर एवं दार्शनिक विचार
प्रश्न: महाराज, 'सत्, चित्, आनन्द' का क्या स्वरूप है?
श्रील प्रभुपाद: सत् का अर्थ है जो नित्य रहे, जिसका कभी विनाश न हो। चित् का अर्थ है पूर्ण ज्ञान, चेतना। और आनन्द का अर्थ है दिव्य सुख। वेदान्त-सूत्र कहता है: "आनन्दमयोऽभ्यासात्"—भगवान स्वभाव से ही आनन्दमय हैं।
भगवान और जीव दोनों का स्वरूप आनन्दमय है। जीव भगवान का नित्य अंश है: "ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः"। जैसे हमारे शरीर का एक हाथ है—जब तक यह शरीर से जुड़ा है, तब तक इसमें जीवन और आनन्द है। यदि इसे काट दिया जाए, तो यह व्यर्थ हो जाता है। इसी प्रकार जब जीव अपने को भगवान से पृथक् कर लेता है, तो वह दुखी होता है।
भगवान अग्नि के समान हैं और जीव अग्नि की चिनगारी (स्फुलिंग) के समान है। चिनगारी में भी अग्नि के गुण होते हैं, परंतु वह आकार में अति सूक्ष्म है। जीव में भगवान के दिव्य गुणों का आंशिक (लगभग 78%) प्रकाश होता है, जबकि भगवान में 100% पूर्णता होती है।
प्रश्न: 'राम' शब्द की क्या व्युत्पत्ति है?
श्रील प्रभुपाद: पद्म पुराण में कहा गया है:
रमन्ते योगिनोऽनन्ते सत्यानन्दे चिदात्मनि ।
इति राम-पदेनौसौ परं ब्रह्माभिधीयते ॥
योगी जिस अनन्त, नित्य, चिन्मय आनन्द में रमण करते हैं, उस परब्रह्म का नाम 'राम' है। जो भगवान से जुड़ जाता है, वह अक्षय आनन्द प्राप्त करता है।
प्रश्न: यदि जीव दिव्य है, तो संसार में गिरकर पतित क्यों हो जाता है?
श्रील प्रभुपाद: जैसे अग्नि की चिनगारी यदि उड़कर सूखे तृण पर गिरे, तो वहाँ भी अग्नि प्रज्वलित कर देती है—यह सत्त्वगुण है। यदि भूमि पर गिरे, तो मन्द होकर बुझने लगती है—यह रजोगुण है। और यदि जल में गिर जाए, तो तुरंत बुझकर काली पड़ जाती है—यह तमोगुण है।
परंतु जैसे भीगी हुई लकड़ी को यदि धूप और वायु से सुखाया जाए, तो वह पुनः अग्नि पकड़ लेती है। इसी प्रकार तमोगुण में पड़े जीव को जब प्रामाणिक गुरु और वैष्णवों द्वारा हरिनाम का श्रवण कराया जाता है, तो यह सुखाने की प्रक्रिया (drying process) आरम्भ होती है! हमारे ये विदेशी शिष्य पहले मांसाहार और नशे में आकण्ठ डूबे थे, परंतु निरन्तर श्रवण-कीर्तन के प्रभाव से वे पूर्णतः शुद्ध होकर आज वैष्णव बन गए।
प्रश्न: क्या गृहस्थों को अपना घर-बार और कर्म छोड़ना पड़ेगा?
श्रील प्रभुपाद: नहीं! कर्म छोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है। अर्जुन ने श्रीमद् भगवद्गीता सुनने के बाद युद्ध करना नहीं छोड़ा; केवल अपना देहात्म-बुद्धि का भाव बदल दिया और भगवान की प्रसन्नता के लिए युद्ध किया।
अपने कर्म को भगवान की सेवा में लगाइए:
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 9.27)
श्रील रूप गोस्वामी ने आदर्श प्रस्तुत किया कि अपनी आय का पचास प्रतिशत (50%) भगवान के प्रचार और यज्ञ में लगाना चाहिए, पच्चीस प्रतिशत (25%) परिवार के निर्वाह में, और शेष पच्चीस प्रतिशत (25%) विपत्ति-काल के लिए सुरक्षित रखना चाहिए।
जो केवल अपने भोग के लिए भोजन बनाता है, वह पाप खाता है:
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 3.13)
घर में भगवान को भोग लगाकर प्रसाद पाइए, तो भोजन भी यज्ञ बन जाएगा।
प्रश्न: 'युक्त-वैराग्य' और 'मुक्ति' क्या है?
श्रील प्रभुपाद: जो वस्तु हमारी है ही नहीं, उसे छोड़ने का क्या अहंकार? "ईशावास्यमिदं सर्वम्"—समस्त सम्पत्ति भगवान की है। प्रत्येक वस्तु को भगवान की सेवा में लगाना ही 'युक्त-वैराग्य' है:
अनासक्तस्य विषयान् यथार्हमुपयुञ्जतः ।
निर्बन्धः कृष्णसम्बन्धे युक्तं वैराग्यमुच्यते ॥
(भक्ति-रसामृत-सिन्धु 1.2.255)
और मुक्ति का वास्तविक अर्थ है:
मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः ।
(श्रीमद्भागवतम् 2.10.6)
'अन्यथा-रूप' क्या है? "अहं ममेति"—मैं यह शरीर हूँ और यह परिवार व धन मेरा है। इस भ्रम को त्यागकर जब जीव अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाता है कि "मैं भगवान श्रीकृष्ण का नित्य दास हूँ", वही वास्तविक मुक्ति है!
प्रश्न: भक्ति में प्रगति का क्या क्रम है?
श्रील प्रभुपाद: शास्त्र में भक्ति का क्रमिक मार्ग बताया गया है:
आदौ श्रद्धा ततः साधुसङ्गोऽथ भजनक्रिया ।
ततोऽनर्थनिवृत्तिः स्यात् ततो निष्ठा रुचिस्ततः ॥
अथासक्तिस्ततो भावस्ततः प्रेमाभ्युदञ्चति ।
साधकानामयं प्रेम्णः प्रादुर्भावे भवेत् क्रमः ॥
(भक्ति-रसामृत-सिन्धु 1.4.15-16)
सर्वप्रथम थोड़ी श्रद्धा, फिर साधु-सङ्ग, फिर भजन-क्रिया (नाम-जप व श्रवण), जिससे अनर्थों की निवृत्ति होती है। तत्पश्चात् निष्ठा, रुचि, आसक्ति, भाव और अन्त में शुद्ध भगवत्-प्रेम का प्रादुर्भाव होता है।
आप सब अपने घर में बाल-बच्चों के साथ बैठकर प्रतिदिन श्रीमद् भगवद्गीता पढ़िए, हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन कीजिए और भगवान का प्रसाद पाइए। इसी से आपका जीवन पूर्णतः कृतार्थ हो जाएगा। बहुत-बहुत धन्यवाद। हरे कृष्ण!
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥