श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  760408LE-VRNDAVAN_Hindi.MP3
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
हरि कथा
वृंदावन, 08-अप्रैल-1976
 
 
 
शास्त्र में बताया गया है कि जिसको देखने मात्र से हृदय में कृष्ण-नाम का उदय हो जाए, वह परम वैष्णव है:
याँहार दर्शने मुखे आइसे 'कृष्ण'-नाम ।
ताँहारे जानिह तुमि 'वैष्णव-प्रधान' ॥
(श्री चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला 16.74)

एक बार मैं लन्दन से अफ़्रीका जा रहा था, और रात को बारह बजे हमारा विमान एथेंस (Athens, Greece) में उतरा। वहाँ पैंतालीस मिनट का ठहराव था, इसलिए हम सब विमान से उतरकर प्रतीक्षालय में थोड़ा विश्राम कर रहे थे। हम तीन-चार लोग थे। जैसे ही वहाँ उपस्थित कुछ ग्रीक नवयुवकों ने हमें देखा, वे तुरंत ज़ोर से पुकार उठे—"Hare Krishna!" वह भी रात के बारह बजे और एथेंस में! तो पूरे विश्व में हम 'हरे कृष्ण' के नाम से ही जाने जाते हैं। हमें देखते ही लोग स्वाभाविक रूप से 'हरे कृष्ण' कहने लगते हैं।

कभी-कभी पाश्चात्य समाचार-पत्रों में बड़े सुन्दर कार्टून (cartoons) भी छपते हैं। एक कार्टून छपा था—एक वृद्धा अपने पति से आग्रहपूर्वक कह रही है: "Chant! Chant! Chant!" और वह वृद्ध पति उत्तर दे रहा है: "I can't! I can't! I can't!" तो यह स्थिति है!

आप सभी को बहुत-बहुत धन्यवाद। ये जो विदेशी भक्त यहाँ आए हैं, ये बहुत धन व्यय करके आए हैं। एक-एक व्यक्ति के विमान का टिकट कम से कम दस हज़ार रुपया होता है। ये चार-पाँच सौ भक्त आए हैं, जिससे सरकार को लाखों रुपयों की विदेशी मुद्रा की प्राप्ति होती है, और सरकार का इसमें कोई नुकसान नहीं है। फिर भी जब ये आते हैं, तो वीज़ा (visa) की अवधि समाप्त होते ही बाधाएँ आती हैं कि "अब बाहर जाओ!" जब भी कोई भगवद्-भक्ति का कार्य करता है, तो उसमें ऐसी अनेक बाधाएँ आती हैं। उन्हें वापस लौटना पड़ता है, फिर दोबारा आना पड़ता है।

इसलिए आप सभी वृन्दावनवासियों से मेरी प्रार्थना है कि जो अब विदेश से वृन्दावन आना आरम्भ किए हैं, आप लोग उन्हें हर प्रकार की सुविधा और सहयोग प्रदान कीजिए। यह आपका परम कर्तव्य है। आप सब वृन्दावनवासी हैं—जय जय श्री वृन्दावनवासी!

हमारी भारतीय नीति का सिद्धान्त है (चाणक्य नीति):
शत्रुरप्युचितं कार्यमातिथ्यं गृहमागते ।
छेत्तुः पार्श्वगतां छायां नोपसंहरते द्रुमः ॥

यदि हमारे घर में कोई शत्रु भी आ जाए, तो उसका भी ऐसा आतिथ्य-सत्कार करना चाहिए कि वह भूल जाए कि वह शत्रु के घर में है। जैसे वृक्ष काटने वाले को भी अपनी शीतल छाया से वंचित नहीं करता। यह तो हमारी सनातन संस्कृति है। अब ये भक्त वृन्दावन आए हैं, और यदि आप लोग इनसे घृणा करें कि "ये यवन हैं, ये म्लेच्छ हैं, इनके स्पर्श करने से हम अपवित्र हो जाएँगे, इनके साथ हम कैसे भोजन करेंगे?"—तो कैसे कार्य चलेगा? इस दृष्टिकोण को थोड़ा बदलना होगा। आप सभी से मेरा यही विनम्र निवेदन है कि परिस्थिति को गम्भीरता से समझिए।

वैष्णव में जाति-बुद्धि करना घोर नारकीय अपराध है:
अर्च्ये विष्णौ शिला-धीर् गुरोषु नर-मतिर् वैष्णवे जाति-बुद्धिः...
नारकी सः ॥
(पद्म पुराण)

भगवान के श्रीविग्रह को पाषाण मानना, गुरु को साधारण मनुष्य समझना और शुद्ध वैष्णव में जाति या कुल की दृष्टि रखना—यह सब नारकीय बुद्धि है। कोई हज़ारों मील दूर से श्रीविग्रह के दर्शन करने आए और यहाँ आकर पूछे कि "यह कृष्ण की मूर्ति किस पत्थर से बनाई गई है?"—अरे मूर्ख! क्या तू पत्थर देखने इतनी दूर से आया है? इसी प्रकार वैष्णवों के बाह्य शरीर या जन्म-स्थान को देखकर जाति का विचार नहीं करना चाहिए।

श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं कहते हैं:
येइ भजे सेइ बड़, अभक्त—हीन, छार ।
कृष्णेर भजने नाहि जाति-कुलादि-विचार ॥
(श्री चैतन्य-चरितामृत, अन्त्य-लीला 4.67)

जो भगवान का भजन करता है, वही श्रेष्ठ है; और जो अभक्त है, वही हीन है। कृष्ण-भजन में जाति और कुल का कोई विचार नहीं होता।

और स्वयं भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद् भगवद्गीता में कहते हैं:
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पाप-योनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 9.32)

यदि कोई तथाकथित पाप-योनि में भी उत्पन्न हुआ हो, परंतु यदि उसने मेरी अनन्य शरण ग्रहण कर ली है, तो वह परम गति को प्राप्त होता है।

इसलिए आप सभी से मेरा यही अनुरोध है कि यहाँ का वातावरण इस प्रकार शुद्ध और उदार होना चाहिए कि यह संकीर्ण जाति-बुद्धि समाप्त हो जाए। ये सब भक्त आपके पास सनातन धर्म सीखने आए हैं; आप इन्हें प्रेमपूर्वक सिखाइए, इन्हें पढ़ाइए। यदि आप ऐसा करेंगे, तभी एक नए और आध्यात्मिक भारत का निर्माण होगा। आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद। Thank you very much. हरे कृष्ण!
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥