परम भगवान श्रीकृष्ण... भगवान केवल मुक्ति ही नहीं देते; मुक्ति चाहिए? लीजिए। सिद्धि चाहिए? लीजिए। और भक्ति चाहिए? वह भी लीजिए। तो इसलिए सबके लिए भगवान कृष्ण के चरणों का आश्रय है:
अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः ।
तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 2.3.10)
इसलिए हम लोगों ने जो यह आन्दोलन चालू किया है, उसका मूल यही है। श्रीमद् भगवद्गीता में बताया गया है:
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.16)
आर्त और अर्थार्थी—जिनको कोई धन माँगने की इच्छा है, वे भी भगवान के पास जाते हैं और उनको मिल जाता है। जिज्ञासु—जो भगवान को समझना चाहते हैं, और ज्ञानी—जो सुकृतिवान् हैं, जिनका पूर्वकृत पुण्य है, वे सब भगवान के पास जाते हैं। परंतु ये सब शुद्ध भक्त नहीं हैं। शुद्ध भक्त भगवान से कुछ नहीं माँगता।
श्री चैतन्य महाप्रभु ने सिखाया है:
न धनं न जनं न सुन्दरीं
कवितां वा जगदीश कामये ।
मम जन्मनि जन्मनीश्वरे
भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि ॥
(श्री शिक्षाष्टकम् 4)
कोई भौतिक कारण नहीं। "न धनम्"—मुझे भौतिक धन नहीं चाहिए। "न जनम्"—बहुत से अनुयायी और लोग मेरे पीछे घूमें, यह भी नहीं चाहिए। "न सुन्दरीं कविताम्"—न कोई रूपवती स्त्री चाहिए। तो फिर क्या? "मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि"—जन्म-जन्मान्तर केवल आपकी अहैतुकी भक्ति चाहिए! मुक्ति भी नहीं चाहिए। यदि जन्म-जन्मान्तर भक्ति मिल जाए, तो मुक्ति तो उसके पीछे-पीछे दासी बनकर खड़ी ही रहती है। इसलिए शुद्ध भक्त मुक्ति की भी कामना नहीं करता, केवल भगवान की सेवा चाहता है।
तो आज की श्रीमद् भगवद्गीता की जो बात है, वह किसी केवल ज्ञानी या योगी के लिए ही नहीं है। सबके लिए है। भगवान कहते हैं:
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥
एवं परम्परा-प्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 4.1-2)
राजर्षि लोग इसको समझते थे। बड़े-बड़े राजर्षि हुए हैं, जैसे युधिष्ठिर महाराज, प्रह्लाद महाराज, जनक महाराज, इक्ष्वाकु महाराज, ध्रुव महाराज... बड़े-बड़े क्षत्रिय राजा! भारतवर्ष में अनेक बड़े-बड़े राजा हुए हैं, जो इस श्रीमद् भगवद्गीता के ज्ञान को समझते थे। यह सबके लिए है।
और यह नष्ट क्यों हो गया? 5000 वर्ष पहले जब श्रीमद् भगवद्गीता भगवान बोल रहे थे, उस समय भी यह योग नष्ट हो गया था। क्यों? वह जो परम्परा सिस्टम (paramparā system) था, वह टूट गया था। इसलिए भगवान कहते हैं:
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 4.3)
"वही पुरातन योग आज मैं तुमको फिर से बता रहा हूँ।"
अर्जुन कह सकते थे: "तो मुझे क्यों बता रहे हैं? मैं तो ब्राह्मण भी नहीं हूँ, और कोई वेदान्ती संन्यासी भी नहीं हूँ। मैं तो राजा हूँ, क्षत्रिय हूँ, और इस समय राजकाज की लड़ाई करने आया हूँ!"
परंतु भगवान कहते हैं: "भक्तोऽसि मे सखा चेति"—तुम मेरे भक्त हो और मेरे प्रिय सखा हो! इसलिए श्रीमद् भगवद्गीता को यथारूप समझने का अधिकार दूसरों को नहीं है, जब तक कि वह भगवान का भक्त न हो। भगवान का प्रिय होना चाहिए और भगवान का भक्त होना चाहिए। यदि किसी में भक्ति का रंग है, तभी वह श्रीमद् भगवद्गीता समझ सकता है।
हमारा यही कहना है कि यदि आप लोगों में थोड़ी भी बुद्धि है, तो श्रीमद् भगवद्गीता का गम्भीरता से विचार कीजिए। नहीं तो मनुष्य समाज सब मन्द है:
प्रायेणाल्पायुषः सभ्य कलावस्मिन् युगे जनाः ।
मन्दाः सुमन्दमतयो मन्दभाग्या ह्युपद्रुताः ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.1.10)
मनुष्य जीवन का उद्देश्य है: "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा"—ब्रह्म के विषय में पूछना। यह मनुष्य जीवन का वास्तविक कार्य है। इसकी कौन परवाह करता है? यदि मनुष्य जीवन मिला है, तो ब्रह्म-ज्ञान हमको अवश्य होना चाहिए।
इसलिए कलियुग में बताया है: "प्रायेणाल्पायुषः सभ्याः कलावस्मिन् युगे जनाः"। पहली बात तो अल्प आयु है। सत्ययुग में मनुष्य 1,00,000 वर्ष जीवित रहता था। फिर त्रेतायुग में 10,000 वर्ष हुआ। फिर द्वापरयुग में 1,000 वर्ष हुआ। और अभी कलियुग में 100 वर्ष अधिक से अधिक है, वह भी पूरा नहीं मिलता! हमारे भारतवर्ष में तो औसत आयु 30-35 वर्ष ही रह गई है।
तो मनुष्य जीवन को सफल करना चाहिए, और आयु-काल बहुत कम है। उसमें भी "मन्दाः"—बहुत मन्द गति से चलते हैं कि "चलो, बुढ़ापे में देखा जाएगा!" "सुमन्दमतयो"—अनेक प्रकार के मनगढ़ंत मत बना लिए हैं: "जितने मत, उतने पथ!" और सब भ्रम के शिकार हो गए। क्या दुर्भाग्य है! "मन्दभाग्या ह्युपद्रुताः"—दुर्भाग्य इसलिए है कि मनुष्य जीवन मिला था ब्रह्म-ज्ञान के लिए, भगवद्-ज्ञान के लिए, परमात्मा के ज्ञान के लिए, और उसको भौतिक भोगों में गँवा दिया! कितना बड़ा दुर्भाग्य है!
और इस दृष्टि से भी देखिए कि आज शरीर के निर्वाह के लिए जो चार आवश्यकताएँ हैं—आहार, निद्रा, भय और मैथुन—वह भी ठीक से नहीं मिलतीं! पशु-पक्षियों को मिल जाती हैं, पर कलियुग में मनुष्य को वह भी दुर्लभ है। जो आज सुबह खाया, शाम को क्या खाएगा, उसका ठिकाना नहीं है। शादी-विवाह तो ठीक से चलता ही नहीं; दो-चार वर्ष के लिए कोर्ट में रजिस्ट्री हुई और फिर सम्बन्ध समाप्त। स्त्री-पुरुष का सम्बन्ध केवल वासना पर टिका हुआ है। श्रीमद्भागवतम् के 12वें स्कन्ध में कलियुग के लक्षण बताए हैं: "दाम्पत्येऽभिरुचिर्हेतुः"—केवल काम-वासना ही विवाह का आधार रहेगी; "विप्रत्वे सूत्रमेव हि"—दो पैसे का जनेऊ पहन लिया तो ब्राह्मण मान लिया गया; "केश-धारणमेव सौन्दर्यम्"—लम्बे-लम्बे बाल रख लिए तो सुन्दर मान लिया गया।
तो कलियुग में दोष ही दोष है। इसलिए शास्त्र कहते हैं:
कलेर्दोष-निधे राजन् अस्ति ह्येको महान् गुणः ।
कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्त-सङ्गः परं व्रजेत् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 12.3.51)
"हे राजन्! कलियुग तो दोषों का समुद्र है, परंतु इसमें एक बहुत बड़ा गुण है। वह क्या है? कीर्तनादेव कृष्णस्य—केवल भगवान श्रीकृष्ण के नाम-कीर्तन करने से ही मनुष्य सब बन्धनों से मुक्त होकर परम धाम को प्राप्त हो जाता है।"
और बृहन्नारदीय पुराण में आता है:
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम् ।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥
केवल भगवान के नाम का कीर्तन कीजिए:
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥
इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देखिए—ये जो यूरोप और अमेरिका के लड़के हैं, इनका कोई वैदिक बैकग्राउंड (background) नहीं था, न किसी ब्राह्मण के घर में जन्म था, न कोई संस्कार था। मांसाहार, शराब पीना—सब कुछ था। परंतु एक ही बात का प्रमाण है—यदि आप प्रामाणिक शास्त्र का निर्देश मानेंगे, श्रीमद् भगवद्गीता और भागवत के अनुसार चलेंगे और भगवान के पवित्र नाम का कीर्तन करेंगे, तो सब पवित्र हो जाएँगे। इसमें कोई सन्देह नहीं है।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥