आप लोगों ने कृपा करके मुझे यह सम्मानित किया, इसके लिए मैं आपके चरणों में आभारी हूँ। हमारी कोई योग्यता है नहीं, परंतु भगवान की कृपा और गुरु-वैष्णवों की कृपा का सम्बल करके मैं 70 वर्ष की आयु में United States गया।
भगवान की प्रेरणा और हमारे गुरु महाराज, जो कि गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के आचार्य, श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर, उनकी बहुत ही इच्छा थी कि पाश्चात्य देशों में श्री चैतन्य महाप्रभु की वाणी अच्छी तरह से प्रचारित हो। इस विषय में उनका प्रयत्न गम्भीर था और हमारे गुरुभाई लोग भी प्रयत्न कर रहे थे, परंतु विशेष सफलता प्राप्त नहीं हुई थी।
इसलिए 70 वर्ष की उम्र में वृन्दावन में, आप लोगों के चरण-रज के प्रभाव से... राधा दामोदर मन्दिर में मैं रहता था, और भगवान की प्रेरणा से मैंने अमेरिका जाने का विचार किया। और उधर जाने के पहले भगवान की कृपा से श्रीमद्भागवतम् के ऊपर अंग्रेज़ी में विस्तृत टीका-टिप्पणी लिखना शुरू किया। इसी राधा दामोदर टेम्पल (Radha Damodar Temple) में मैं बैठ-बैठकर लिखता था, और दिल्ली में जाकर के उसको छपवाता था। इस प्रकार जब तीन ग्रन्थ—श्रीमद्भागवतम् के तीन भाग प्रस्तुत हो गए, उस समय मैं बहुत कठिनाई से अमेरिका गया।
इधर पासपोर्ट लेने में और 'P' Form पास कराने में बहुत दिक्कत हुई। सब कुछ बन्दोबस्त करने के बाद जब आख़िरी 'P' Form लेने को मैं बम्बई गया, तो उधर जो ऑफिसर मिस्टर चक्रवर्ती (Mr. Chakraborty) थे, उन्होंने कहा: "महाराज, आप नहीं जा सकते।"
मैंने पूछा: "क्या बात है?"
उन्होंने कहा: "आपको किसी संस्था ने निमन्त्रण नहीं दिया है। आप एक व्यक्तिगत भद्र महोदय के निमन्त्रण पर जा रहे हैं, गवर्नमेन्ट (Government) आपको जाने की अनुमति नहीं दे सकती।"
तो मैंने उनसे निवेदन किया: "आप कृपा करके आपके जो प्रधान हैं, उनके पास हमको भेज दीजिए, मैं थोड़ा उनको समझाऊँ।" उस समय Foreign Exchange के Chief Controller Mr. Rao थे, उनका पूरा नाम मुझे अभी याद नहीं है। फिर उनके सेक्रेटरी (Secretary) के पास जाकर मैंने कहा: "हमारी फाइल बहुत दिनों से इधर पड़ी है, आप कृपा करके साहब के पास इसे पहुँचा दीजिए, मैं उनसे मुलाक़ात करूँ।" तो सेक्रेटरी महोदया उसी वक्त फाइल निकालकर राव साहब के पास ले गईं और मुझसे कहा: "आप थोड़ा बैठिए।"
मैं तो बैठा ही था, भगवान की ऐसी अहैतुकी कृपा हुई कि राव साहब ख़ुद ही बाहर निकल आए और बोले: "स्वामी जी, आपका काम पास कर दिया है, आप चिन्ता न कीजिए।" यह भी भगवान की ही कृपा थी।
फिर Scindia Steam Navigation Company की जो प्रोप्राइटर और मैनेजिंग डायरेक्टर श्रीमती सुमति मोरारजी (सुमति बाई) थीं, उनसे प्रार्थना की। तो उन्होंने अपना जो ख़ास कमरा जहाज़ में होता है—पहले जहाज़ से ही गया था, हवाई जहाज़ से जाने के लिए पैसे तो नहीं थे—तो उन्होंने एक रिटर्न टिकट (return ticket) मुझे मुफ़्त दे दिया। और कैप्टन को विशेष रूप से कह दिया कि "स्वामी जी का सब प्रकार से ध्यान रखना।" कैप्टन बेचारे Mr. Pandia ने बहुत ही यत्न किया, और विशेष करके उनकी धर्मपत्नी ने जहाज़ में बहुत श्रद्धापूर्वक हमारी सेवा की।
उस यात्रा में भी बहुत तकलीफ़ हुई। रास्ते में दो बार तो हृदय-रोग (heart attack) के कारण मर जाने जैसी स्थिति हो गई थी। फिर भगवान की कृपा से मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ही जहाज़ को चला रहे हैं और वे मुझे सुरक्षित पहुँचा देंगे।
तो किस प्रेरणा से मैं उधर गया था, उसका पूरा इतिहास संक्षेप में आपको बताता हूँ। उस समय कलकत्ता में एक बहुत बड़ी केमिकल लेबोरेटरी (Dr. Bose's Laboratory) में मैं मैनेजर (Manager) था। मेरी उम्र उस समय ज़्यादा से ज़्यादा 24-25 वर्ष की थी, नौजवान था। तो हमारे एक मित्र ने मुझसे कहा: "इधर गौड़ीय मठ खुला है, सुनते हैं कि वहाँ बड़े-बड़े वैष्णव साधु आए हुए हैं, आप भी हमारे साथ चलिए।"
उस समय मैं विशेष रूप से कांग्रेस का भक्त था (महात्मा गांधी के आन्दोलन में)। यद्यपि मेरा जन्म एक शुद्ध वैष्णव परिवार में हुआ था—हमारे पिताजी ही परम वैष्णव थे, इसलिए बचपन से ही हमारा वैष्णव संस्कार था—परंतु आजकल की आधुनिक पढ़ाई-लिखाई के प्रभाव से जैसे अधिकांश लोग भगवद्-विरोधी और निराकारवादी हो जाते हैं, मैं भी थोड़े दिनों के लिए वैसा ही बन गया था।
फिर वह हमारे मित्र मुझे श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद से मिलाने ले गए। भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद ने मुझे देखते ही पहली बात यह कही: "देखो जी, आप लोग ऐसे पढ़े-लिखे नौजवान हैं, आप चैतन्य महाप्रभु के विचार पाश्चात्य देशों में जाकर प्रचार क्यों नहीं करते?"
इसके ऊपर मेरी उनसे काफ़ी बहस और तर्क-वितर्क हुआ। उस समय मैंने उनसे कहा: "हम लोग तो एक पराधीन देश के नागरिक हैं, हमारी बात वहाँ कौन सुनेगा?" उस समय यह मेरी पहली ही मुलाक़ात थी, गुरु-शिष्य का विधिवत सम्बन्ध नहीं हुआ था, परंतु वे तो गुरु ही थे! उन्होंने मुझे तर्क और प्रमाणों से ऐसा समझाया कि मैं निरुत्तर हो गया, मैं हार गया। तो उनकी कृपा से पहली ही भेंट में उनका यह आदेश था कि "आप परदेश जाकर श्री चैतन्य महाप्रभु की भक्ति-शिक्षा का प्रचार कीजिए।"
फिर आख़िरी में, सन् 1936 में, अपने अन्तर्धान होने से केवल 15 दिन पहले उन्होंने मुझे एक पत्र लिखा: "देखो जी, तुम अंग्रेज़ी भाषा में प्रचार करो। इससे तुम्हारा भी परम मंगल होगा और पूरे जगत का भी मंगल होगा।" इस प्रकार उनकी प्रेरणा मुझे निरन्तर मिलती रही।
अपनी अयोग्यता के कारण सन् 1922 से लेकर 1965 तक मुझे केवल तैयारी और साधन जुटाने में ही समय लग गया, अवसर नहीं मिल पाता था। फिर अन्ततः भगवान की कृपा और गुरु महाराज के आदेश का अवलम्बन करके मैं न्यूयॉर्क पहुँचा।
वहाँ जब मैं पहुँचा, जैसा मैंने पहले बताया, मेरी जेब में केवल 40 डॉलर ($40) थे, पचास भी नहीं, केवल चालीस डॉलर! और न्यूयॉर्क में दो-चार डॉलर खर्च हो जाना तो घण्टे-दो घण्टे की बात है। और डॉलर का उस समय का हिसाब देखें, तो दो डॉलर का मतलब आजकल के हिसाब से बीस रुपया समझिए। कोई विशेष सहायता नहीं थी।
परंतु भगवान की कृपा से आगरा के हमारे एक मित्र के पुत्र बटलर (Butler, Pennsylvania) शहर में रहते थे। वे आकर मुझे ले गए। मैं लगभग 10-15 दिन उनके घर में रहा। उन्होंने एक अमेरिकन कन्या से विवाह किया था और वे बड़े भद्र पुरुष थे।
उसके बाद मैं न्यूयॉर्क शहर आया। न्यूयॉर्क में एक कमरा लिया। पैसे का अभाव था। भागवत की पुस्तकें बेच-बेचकर किसी तरह गुज़ारा कर रहा था। वह भी सब चोरी हो गया—हमारा टाइपराइटर (typewriter), टेप-रिकॉर्डर (tape recorder) और कुछ पुस्तकें—सब चोरी चली गईं! न्यूयॉर्क में भी चोरी होती है, यानी चोर तो हर जगह होते हैं।
सब कुछ चोरी हो जाने के बाद एक व्यक्ति, जो मेरी थोड़ी सेवा करता था, वह मुझे अपने घर ले गया। वहाँ कुछ दिन रहा। इस प्रकार लगभग एक वर्ष तक मुझे बहुत कष्ट उठाने पड़े—कभी इधर, कभी उधर। न रहने का ठिकाना, न खाने का ठिकाना, और न ही कोई धन। बस अपने साथ लाई हुई श्रीमद्भागवतम् की पुस्तकें थीं।
फिर जब किसी प्रकार 200 डॉलर एकत्र हुए, तो हमने एक दुकान-घर किराये पर लिया, जिसे वहाँ 'स्टोरफ़्रंट' (storefront) कहते हैं। वहाँ रोज़ाना सत्संग और कीर्तन शुरू किया। शुरू-शुरू में तीन, चार, पाँच—यही लड़के आते थे, कोई वृद्ध व्यक्ति नहीं आया।
हाँ, देखिए, नौजवान लड़के बड़े जिज्ञासु थे। वे जीवन में कुछ वास्तविक चाहते थे। अपने माता-पिता के भौतिक ऐश्वर्य को देखकर वे समझ चुके थे कि इसमें वास्तविक सुख नहीं है। इसलिए आप लोग जानते हैं कि उस समय अमेरिका में बहुत से 'हिप्पी' (hippies) हो गए थे। वे बहुत धनी और सम्भ्रान्त परिवारों के लड़के थे, परंतु वे उस भौतिक जीवन से ऊब चुके थे...
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥