हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥
श्रीमद्भागवतम्, सप्तम स्कन्ध, चतुर्दश अध्याय में युधिष्ठिर महाराज नारद जी को प्रश्न कर रहे हैं:
"महाराज, आपने जो ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासियों के लिए जो विधि और कर्तव्य बताया है, वह भगवान के पास जाने के लिए, यानी मुक्त होने के लिए, जैसे-जैसे है आप सब बताए। बाकी हम लोग गृहस्थ हैं, हमारी बुद्धि विशेष कोई अच्छी नहीं है। क्यों? हम लोग दुनिया को ही सब कुछ समझते हैं। इसके बाद और कुछ जीवन है, हम लोग समझते नहीं। सब विषयी हैं। तो यह गृहस्थ दुनिया का है, और मोक्ष तो हमको है ही नहीं। आप बताइए कि गृहस्थ किस तरह से रहने से मुक्त हो सकता है?"
यह प्रश्न बहुत सुन्दर है। महात्मा जो होते हैं, सब समय भ्रमण ही करते रहते हैं—गाँव में, देश में, गृहस्थों को जगाने के लिए। तो युधिष्ठिर महाराज... युधिष्ठिर महाराज कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे। भगवान से साक्षात् सम्पर्क था, पाण्डवों में सबसे बड़े, और धर्मराज! कोई साधारण बात नहीं है। युधिष्ठिर महाराज कोई साधारण लोग नहीं हैं। फिर भी नारद मुनि के पास अपने को मूढ़ बताया।
और मूढ़ का अर्थ होता है गधा। श्रीमद्भगवद्गीता में कई जगह मूढ़ शब्द का प्रयोग हुआ है:
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.15)
तो वास्तव में यह जो गृहस्थ आश्रम है, इसमें भगवद्-विषय में विशेष ज्ञान का लाभ नहीं होता है। इसलिए यह उचित है कि साधु-सन्तों की सेवा करें, उनसे भगवद्-विषय श्रवण करें। इसलिए यह आयोजन किया है। और ये सब साधु-सन्त सारे दुनिया से इस पावन भूमि का दर्शन करने को आए हैं। यह केवल आज ही नहीं, ये तो विदेशी हैं ही हैं, सारा पृथ्वी के कोने-कोने में ये, यहाँ पर जो कृष्ण हैं, उनकी वाणी प्रचार कर रहे हैं। चैतन्य महाप्रभु का उद्देश्य है कि पृथ्वी के सारे कोने-कोने में भगवान कृष्ण की वाणी प्रचार हो।
श्री चैतन्य महाप्रभु—स्वयं कृष्ण:
श्रीकृष्ण चैतन्य, राधा-कृष्ण नहे अन्य।
भगवान कृष्ण श्रीमद् भगवद्गीता बताए, और आख़िरी में सबको समझाया:
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 18.66)
बाकी वो मूढ़ जो हैं, वह समझा नहीं। मूढ़ होने के कारण, भगवान ख़ुद आकर सबको समझा रहे हैं कि क्या चीज़ है भगवान और उनसे हमारा क्या सम्पर्क है। बाकी फिर भी जो है, समझता नहीं। इसलिए भगवान फिर भक्त रूप से आए। ये चैतन्य महाप्रभु हैं। महाप्रभु वही हैं। जो बातें भगवान कृष्ण समझाए सारे दुनिया के कल्याण के लिए, वही बातें सुनाने के लिए भगवान स्वयं कृष्ण, "कृष्ण चैतन्य" नाम से प्रकट हुए।
इसलिए श्रील रूप गोस्वामी ने जब चैतन्य महाप्रभु को प्रयाग में दर्शन किया, एक श्लोक से प्रार्थना की:
नमो महावदान्याय कृष्णप्रेमप्रदाय ते ।
कृष्णाय कृष्णचैतन्यनाम्ने गौरत्विषे नमः ॥
(श्री चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला 19.53)
और षड्-गोस्वामी आकर... श्री रूप, सनातन, भट्ट रघुनाथ, श्री जीव, गोपाल भट्ट, दास रघुनाथ... चैतन्य महाप्रभु की आज्ञा से इधर आए हैं, और वृन्दावन की महिमा प्रचार करने के लिए अनेक पुस्तकें लिखीं:
नाना-शास्त्र-विचारणैक-निपुणौ सद्धर्म-संस्थापकौ
लोकानां हित-कारिणौ त्रि-भुवने मान्यौ शरण्याकरौ ।
राधा-कृष्ण-पदारविन्द-भजनानन्देन मत्तालिकौ
वन्दे रूप-सनातनौ रघ्युगौ श्री-जीव-गोपालकौ ॥
(श्री षड्-गोस्वाम्यष्टकम् 2)
तो षड्-गोस्वामी—रूप, सनातन, श्री जीव... चैतन्य महाप्रभु के उपदेश प्रचार किए, और उन्हीं का अनुसरण करते हुए हम लोग भी वही बात विचार कर रहे हैं जो महाप्रभु सबको बताते हैं कि: "आप लोग सब गुरु हो जाइए।"
हम गुरु हो जाएँ? कृष्ण चैतन्य महाप्रभु सबको बताते हैं:
आमार आज्ञाय गुरु हञा तार' एइ देश ।
यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश ॥
(श्री चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला 7.128)
"आप लोग सब गुरु हो जाइए।"
"गुरु किस तरह से? हम तो कुछ नहीं जानते, गुरु कैसे बन जाएँ?"
तो चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि इसमें आपको ज़्यादा कोई कठिनता नहीं है, क्योंकि आप पुस्तक उठाकर के कृष्ण का उपदेश सबको समझाइए—"यारे देख, तारे कह कृष्ण-उपदेश"। और यदि और कुछ उद्देश्य है—कृष्ण को उड़ा देना है और खुद ईश्वर बनना है—यदि यह गुरुआई करना है, तो फिर गुरु नहीं बन सकते। यह गुरु का लक्षण नहीं है। गुरु कौन हो सकता है? जो भगवान जैसे बताते हैं, उस प्रकार का वह बताता है, वह गुरु।
एवं परम्परा-प्राप्तम्... भगवान कृष्ण कहते हैं: "कोटि वर्ष पूर्व में, मैंने इसको सूर्यदेव को बताया था।"
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥
एवं परम्परा-प्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 4.1-2)
यह जो है, भगवान कहते हैं: "यह कोई नई बात नहीं है। पहले भी, पूर्वकाल में भी मैंने इसको समझाया था।" कह रहे हैं—40 करोड़ वर्ष पहले! मनु का उम्र विचार करने से, 40 करोड़ वर्ष पहले श्रीमद् भगवद्गीता सूर्यदेव को कही गई: "विवस्वान् मनवे प्राह"—सूर्य ने वह मनु को बताया, और मनु महाराज इक्ष्वाकु को बताया। इसी प्रकार परम्परा से श्रीमद् भगवद्गीता, भगवान की वाणी आई। "स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप"—वह परम्परा-सूत्र नष्ट होने के कारण वह योग नष्ट हो गया।
इस विषय में हम लोगों को ध्यान देना चाहिए कि हमारे देश में, जहाँ स्वयं भगवान आकर भगवान की चीज़ बताए हैं, उस देश में भगवान को भूल जाना कितनी दुर्भाग्य की बात है! इसलिए चैतन्य महाप्रभु का जो उद्देश्य है कि सब कोई भारतवासी जो सब कोई हैं, उनको उचित है कि सब जगह में जाकर के जो कृष्ण का गुण है, उसको समझाएँ। कृष्ण-भावनाभावित का यही उद्देश्य है। यह कोई धार्मिक... जैसे साधारण धार्मिक ही है, परंतु आजकल धर्म बहुत बन चुके हैं। धर्म एक ही है:
धर्मं तु साक्षाद् भगवत्प्रणीतं
न वै विदुऋषयो नापि देवाः...
(श्रीमद्भागवतम् 6.3.19)
धर्म और कोई बना नहीं सकता है, यह भगवान ही बना सकते हैं। तो भगवान जो धर्म को बता रहे हैं कि "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज"—शरणागत हो जाओ। यही असल धर्म है। और सब... इसलिए भागवत में पहले बताया:
धर्मः प्रोज्झित-कैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां...
(श्रीमद्भागवतम् 1.1.2)
यह जो छलवादी धर्म जितना है, दूर कर दिया। श्रीधर स्वामी अपने टीका में बताए हैं कि "मोक्ष-अभिसन्धि अपि निरस्तम्"—मोक्ष की कामना भी कैतव है। यह सब बाहरी चीज़ है, और असल धर्म है भगवद्-भक्ति।
तो चैतन्य महाप्रभु की वाणी है कि सब कोई आप लोग गुरु बन जाएँ। और गुरु होने में कोई मुश्किल नहीं है। यदि आप दूसरे को ठगना नहीं चाहते हैं, तो गुरु होना कोई मुश्किल नहीं है। क्योंकि गुरु का काम क्या है? जो भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद् भगवद्गीता में बताए हैं, उसको आप थोड़ा सुना दीजिए। क्या उसमें मुश्किल है? भगवान श्रीमद् भगवद्गीता में बताते हैं:
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.7)
"मुझसे बढ़कर के और कोई परतत्त्व है नहीं।" यह सब शास्त्र का प्रमाण है:
ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः ।
अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम् ॥
(ब्रह्म-संहिता 5.1)
कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्... अर्जुन जब श्रीमद् भगवद्गीता समझा, तो कहते हैं:
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 10.12)
भगवान श्रीकृष्ण ही परतत्त्व हैं। सब शास्त्र का सिद्धान्त है, सब आचार्य लोग स्वीकार किए हैं। शंकराचार्य भी स्वीकार किए हैं: "स भगवान् स्वयं कृष्णः"। और रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्क, विष्णुस्वामी... और चैतन्य महाप्रभु की बात ही क्या कहना! "कृष्ण-वर्णं त्विषाकृष्णम्"... सब कृष्ण का ही केवल वर्णन करते हैं। वेद, सब शास्त्र:
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 15.15)
वेदादि शास्त्रों को पढ़ने का उद्देश्य क्या है? भगवान कृष्ण को समझना। यह सब शास्त्र का सिद्धान्त है।
चैतन्य महाप्रभु वही बताते हैं: "यारे देख, तारे कह कृष्ण-उपदेश"। यह जो कृष्ण-भक्ति प्रचार हो रहा है, इसमें कोई ज़्यादा मुसीबत नहीं है। हम लोग सारे दुनिया में वही बात कहते हैं जो भगवान बताते हैं। भगवान बताते हैं: "मुझसे बढ़कर और कोई परतत्त्व है नहीं", और हम लोग भी यही कहते हैं: "देखो जी, भगवान कृष्ण हैं, इनसे बढ़कर और कोई नहीं, परतरं नान्यत्।" और ये लोग मान लेते हैं! Western countries में यही एक सुविधा है कि इनको जब बताया जाता है कि "कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्", भगवान का अर्थ होता है कृष्ण, और कृष्ण का अर्थ होता है भगवान—ये लोग मान लेते हैं! ये लोग तर्क नहीं करते हैं कि देखो, यह हमारा भगवान है, यह हमारा भगवान है, कृष्ण क्यों भगवान हैं? और भारतवर्ष की दुर्गति का कारण है कि यहाँ हज़ारों "भगवान" हो गए, और कृष्ण को छोड़ दिया! यह दुर्दशा है।
तो बाकी भारतवासी जनसाधारण जो है, वह कृष्ण को भूला नहीं है। अगर कृष्ण को भूलता तो क्यों इतने नर-नारी सब उपस्थित हैं कृष्ण-कथा सुनने के लिए? यह तो मथुरा, भगवान कृष्ण का स्थान ही है। हम लोग कहीं भी यह "हरे कृष्ण" पण्डाल खोलते हैं—अभी दिल्ली में खोला था, अलीगढ़ में किया था, बम्बई में किया था—कृष्ण को भूले नहीं हैं, यह मंगल का कारण है। तो कृष्ण को भूलने से... यह बंगाली वैष्णव पद लिखा है:
कृष्ण भुलिया जीव भोग-वाञ्छा करे ।
पाशते माया तारे झापटिया धरे ॥
(प्रेम-विवर्त 6.2)
जीवात्मा भगवान कृष्ण को भूल जाता है और भौतिक भोग चाहता है, उसी समय माया उसको पकड़ लेती है: "कृष्ण भुलिया जीव भोग-वाञ्छा करे, पाशते माया तारे झापटिया धरे।" तो हम लोग सब माया के वशीभूत हैं:
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कार-विमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 3.27)
सब कोई हम लोग स्वाधीनता प्रकाश करते हैं, बाकी यह सम्भव नहीं है। सब प्रकृति के वश में है—"प्रकृतेः क्रियमाणानि"। और प्रकृति के जो तीन गुण हैं—सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण—वह गुणों के साथ हम लोग जैसे मिलते-जुलते हैं, उसी प्रकार हमको शरीर मिलता है। और यह जो जीवात्मा अनेक शरीर पलटते हैं जन्म-जन्मान्तर, इसी का नाम है संसार।
यही सब एक शरीर मिलता है, उसमें जहाँ तक हो भोग और दुःख जो कुछ मिलना है, मिलता है। फिर अपने कर्म के अनुसार और एक शरीर मिलता है। इसी प्रकार जन्म-जन्मान्तर एक शरीर से और एक शरीर मिलता है। और सुख-दुःख जो कुछ मिलने का मिलता है—सुख तो है नहीं, केवल दुःख ही है! जब तक हमको यह भौतिक शरीर धारण करना है, चाहे स्वर्गलोक में, इन्द्रलोक में, चन्द्रलोक में शरीर मिले, अथवा पाताल, अतल, वितल, तलातल, रसातल... कहीं भी भौतिक शरीर मिले, वह कष्टदायक है:
दुःखालयमशाश्वतम्...
(श्रीमद् भगवद्गीता 8.15)
यह हम लोग भूल गए। हम लोग स्वाधीनता से समझते हैं कि हम लोग इतना सब सुख का बन्दोबस्त कर लेंगे। यह हो नहीं सकेगा।
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.14)
तब भगवान श्रीमद् भगवद्गीता में बता दिए हैं... जो हम लोग इस भौतिक जगत में सुखी होने को चाहते हैं, सुखी होने कहाँ देगा? यह तो punishment (सज़ा) है! भगवान को भूल गया, उसके लिए यह एक शास्ति (दण्ड) है भौतिक जन्म लेना। इसलिए भगवान ख़ुद आते हैं और यही सिखाते हैं कि "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज"।
भगवान और भगवान की वाणी, उसमें कोई फ़र्क नहीं है। भगवान अद्वय-ज्ञान-तत्त्व हैं। भगवान का नाम और भगवान एक ही चीज़ है। भगवान का उपदेश और भगवान एक ही हैं। इसी प्रकार यदि हम लोग भगवान कृष्ण का उपदेश रोज़ाना ठीक-ठीक से पढ़ें... ठीक-ठीक से पढ़ें, इसका मतलब यही होता है, क्योंकि आजकल गीता पढ़ाने वाले सब बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ, विद्वान, बड़े-बड़े scholar लोग हो गए हैं, और उनका एक ही उद्देश्य है कि भगवान को उड़ा दो, बस! और उनका कोई... इस प्रकार के व्यक्तियों का पाठ श्रीमद् भगवद्गीता यदि आप लोग पढ़ें, तो उसका कभी आस्वादन नहीं कर सकते। इसलिए भगवान बताते हैं:
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 4.34)
जो तत्त्वदर्शी भक्त हैं, उनकी यदि आप भगवद्-वाणी सुनेंगे, तो वह काम आएगी। और जो तत्त्वदर्शी हैं नहीं, अपने को बड़ा विद्वान समझते हैं, leader समझते हैं, और अनर्थ का भाष्य करते हैं, वह सब श्रीमद् भगवद्गीता पढ़ने से कुछ काम नहीं होगा।
इसलिए चैतन्य महाप्रभु के जो सेक्रेटरी (secretary) थे, स्वरूप दामोदर गोस्वामी, उन्होंने एक ब्राह्मण को बताया था: "याओ, भागवत पड़ो वैष्णवेर स्थाने"। यदि कोई व्यक्ति भागवत है, जिसका जीवन भागवत है, उसके पास जाकर के भागवत सुनिए। इसी प्रकार जो कृष्ण-भक्त है... कृष्ण को समझना तो कोई साधारण बात नहीं है:
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.3)
तथापि कृष्ण सबके हृदय में बैठे हुए हैं:
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
(श्रीमद् भगवद्गीता 18.61)
सबके हृदय में भगवान बैठे हुए हैं। बाकी जो भगवान का भक्त है, भगवान की सेवा करने के लिए सब समय यत्नशील है, इस प्रकार के व्यक्ति को भगवान गीता में बताते हैं:
तेषां सतत-युक्तानां भजतां प्रीति-पूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 10.10)
भगवान सबसे बातचीत नहीं करते, बाकी जो भगवत्-प्रेमी है, जो भगवान की सेवा करने में सब समय लगा रहता है, उसको भगवान समझाते हैं।
इसीलिए श्रीमद् भगवद्गीता अर्जुन को समझाए। पहले भगवान समझाए कि यह जो पद्धति है, परम्परा पद्धति, यह नष्ट हो गई। इसलिए "स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप"। "तो फिर तुमको समझा रहे हैं, तुम समझो।"
"हमको क्यों समझा रहे हैं? हम तो कोई योगी हैं नहीं, और कोई संन्यासी और वेदान्ती यह सब तो हैं नहीं। साधारण गृहस्थ हैं, वह भी राजा हैं, क्षत्रिय हैं, सब रुपया-पैसा, युद्ध, यही चिन्ता है। हमको आप क्यों समझा रहे हैं?"
इसलिए भगवान कहते हैं:
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 4.3)
"यह सब होने की कोई ज़रूरत नहीं है। असल चीज़ है—श्रीमद् भगवद्गीता वही समझेगा जो कि हमारा भक्त और प्रिय सखा है।" तो यदि हम लोग भक्त नहीं हैं, तो वह श्रीमद् भगवद्गीता हम लोग नहीं समझ पाएँगे।
उदाहरणस्वरूप, जैसे मधु (शहद) की बोतल है, और वह बोतल को बाहर से चाटने से मधु का आस्वादन नहीं हो सकेगा। वह बोतल खोल के उसके भीतर जो मधु है, उसको चखने से काम होगा। इसी प्रकार भगवान जो श्रीमद् भगवद्गीता बताए हैं, उसका बाहर से यदि कोई आस्वादन करने को चाहे, तो उसको नहीं मिलेगा। भीतर भक्ति है।
तो भक्त... यह जो अंग्रेज़ लड़के हमारे साथ आए हैं, इनको सब भक्त बनाया गया है। भक्त बनने के लिए जो सब नियम हैं, वह सब मानते हैं। भक्त होना कोई साधारण बात नहीं है। इनको बताया जाता है कि देखो:
1. अवैध स्त्री-पुरुष का जो सङ्ग होता है, इसको छोड़ना चाहिए—यह सब छोड़ दिया।
2. किसी प्रकार मादक द्रव्य ग्रहण नहीं करना चाहिए—मद्यपान, बीड़ी, सिगरेट, चाय, कॉफ़ी—यह सब छोड़ दिया।
3. मांसादि भक्षण—यह सब छोड़ देना—यह छोड़ दिया।
4. और जुआ खेलना—यह सब छोड़ दिया।
यह चार चीज़ें हम इनको मना करते हैं। और इनको दीक्षा देने के पहले ही प्रतिज्ञा करनी पड़ती है कि यह सब चीज़ छोड़ना चाहिए। तो छोड़ देते हैं। क्योंकि जिसका जीवन पापमय है, वह भगवद्-भजन नहीं कर सकेगा:
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.28)
भगवद्-भजन दृढ़ता से वही कर सकेगा जिसका पापमय जीवन ख़त्म हो गया। और यह पापमय जीवन के चार खम्भे हैं—अवैध स्त्री-सङ्ग, मांसाहार, नशा और द्यूत (जुआ)। यह चार चीज़ें छोड़नी पड़ेंगी यदि आप भगवान को समझना चाहें।
परन्तु कलियुग में सब पतित होते हुए भी, एक बहुत बड़ी सुविधा शास्त्र में बताई गई है। शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित को समझाया, जब कलियुग का वर्णन किया कि सभी पाप ही पाप है, दोष ही दोष है, तो आख़िरी में यह बताया:
कलेर्दोष-निधे राजन् अस्ति ह्येको महान् गुणः ।
कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्त-सङ्गः परं व्रजेत् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 12.3.51)
"हे राजन्! कलियुग तो दोषों की निधि है, यह तो दोषों का समुद्र है। बाकी इसमें एक बड़ा भारी गुण है, बहुत लाभदायक है। वह क्या चीज़ है? कीर्तनादेव कृष्णस्य—केवल भगवान कृष्ण के नाम-कीर्तन करने से ही मनुष्य सब दोषों से, भौतिक संग से मुक्त हो जाता है और परम धाम को प्राप्त होता है।"
श्री चैतन्य महाप्रभु यही बात कह रहे हैं:
चेतो-दर्पण-मार्जनं भव-महा-दावाग्नि-निर्वपणं
श्रेयः-कैरव-चन्द्रिका-वितरणं विद्या-वधू-जीवनम् ।
आनन्दाम्बुधि-वर्धनं प्रति-पदं पूर्णामृतास्वादनं
सर्वात्म-स्नपनं परं विजयते श्रीकृष्ण-सङ्कीर्तनम् ॥
(श्री शिक्षाष्टकम् 1)
तो आप लोगों को तो... कृष्ण तो आप ही लोगों के हैं! हमारे जैसे तुच्छ व्यक्ति आपको कृष्ण का विषय क्या समझाएँगे? आप लोगों के पास तो हम लोग सीखने के लिए आए हैं। तो यह शास्त्र द्वारा हम लोग यही समझते हैं कि कलियुग में अत्यन्त दोषयुक्त होते हुए भी, यदि कृष्ण-कीर्तन हम लोग सब मिलकर करें... कृष्ण-कीर्तन मिलकर करने से उसका नाम होता है "संकीर्तन"। सब मिलकर कीर्तन करते हैं। और कलियुग में यही यज्ञ-साधन है, ऐसा शास्त्र-प्रमाण है:
कृष्ण-वर्णं त्विषाकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्र-पार्षदम् ।
यज्ञैः सङ्कीर्तन-प्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः ॥
(श्रीमद्भागवतम् 11.5.32)
जो संकीर्तन-यज्ञ द्वारा भगवान की उपासना करते हैं, वे ही सुमेधा (बुद्धिमान) हैं। इसमें कोई खर्च नहीं। और सब यज्ञ कलियुग में असम्भव हैं। वह पैसा भी नहीं है, वह सरंजाम (सामग्री) भी नहीं है, और वह ब्राह्मण भी नहीं हैं जो शुद्ध आहुति और मन्त्र-साधन कर सकें। इसलिए शास्त्र में बताया है: "कीर्तनादेव कृष्णस्य"—भगवान कृष्ण का कीर्तन कीजिए:
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥
तो इसमें कोई मुश्किल नहीं है। चैतन्य महाप्रभु हमको रास्ता दिखा रहे हैं कि आप लोग सब गुरु हो जाइए। घर में गुरु हो जाइए। शाम को बैठकर कीर्तन कीजिए, श्रीमद् भगवद्गीता पाठ कीजिए। जैसा कि नारद मुनि ने उपदेश दिया है:
श्रीभगवदवतारकथां यथाकालं उपशृण्वन्...
(श्रीमद्भागवतम् 7.14.4)
यह पद्धति बताई है। भगवद्-अवतार-कथा... भगवान निराकार नहीं हैं। निराकार जो है, जैसे सूर्य है, सूर्य निराकार नहीं है; सूर्य का जो प्रकाश (धूप) है, वह निराकार है। इसी प्रकार:
वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम् ।
ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.2.11)
परतत्त्व जो है, वह ब्रह्म, परमात्मा और भगवान रूप से विख्यात है। तो ज्ञानी लोगों के लिए ब्रह्म-ज्ञान, योगी लोगों के लिए परमात्मा-ज्ञान, और भक्तों के लिए भगवत्-स्वरूप साक्षात् श्रीकृष्ण। तो यह सब उपदेश मौजूद हैं। कम से कम श्रीमद् भगवद्गीता आप लोग सब पढ़िए और कीर्तन कीजिए। इसमें आपको कोई नुकसान नहीं।
हाँ, कम से कम... आजकल जो गृहस्थ होते हैं, वह तो... जैसा हम लोगों की वैदिक सभ्यता, वर्णाश्रम, वह तो अभी छूट गया है। जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—चार वर्ण; और ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास—चार आश्रम। यह है वैदिक सभ्यता:
वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान् ।
विष्णुराराध्यते पन्था नान्यत्तत्तोषकारणम् ॥
(विष्णु पुराण 3.8.9)
भगवान विष्णु की आराधना करने के लिए यह वर्णाश्रम धर्म था। सो सब छोड़ दिया, कलियुग है, सब टूट-फूट गया है। बाकी वह संशोधन हो सकता है। और यदि संशोधन नहीं भी हो, तो यह जो शास्त्र का निर्देश है कि "यारे देख, तारे कह कृष्ण-उपदेश"—सबको कृष्ण-उपदेश सुनाइए। इसमें क्या मुश्किल है?
कृष्ण क्या उपदेश करते हैं?
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिज्ञाने प्रियोऽसि मे ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 18.65)
भगवान कृष्ण का चिन्तन करना, उनका भक्त हो जाना, उनकी पूजा करना, और उनको एक नमस्कार करना। इसीलिए तो पूर्व आचार्यों ने इतने सब मन्दिर बनाए हैं! जो हमारे सब अनपढ़ या मूर्ख जितने हैं, कम से कम मन्दिर में जाकर भगवान के चरणों में नमस्कार तो करें! इसमें कोई मुश्किल नहीं।
बाकी सब छोड़ दे रहे हैं। यह जो हमारी भारतीय संस्कृति है, यह सब छोड़ देकर आज इस दुर्दशा में हम लोग गिरे हुए हैं। यदि आप लोग इस कठिन समस्या से उत्तीर्ण होना चाहते हैं:
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 18.66)
भगवान स्वयं आपका मंगल करेंगे। केवल आप लोग भगवान के चरणों में शरणागत हो जाइए। बहुत-बहुत धन्यवाद। हरे कृष्ण!
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥