श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  750925BG-AHMEDABAD--Hindi.MP3
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
श्रीमद् भगवद्-गीता 7.1
अहमदाबाद, 25-सितंबर-1975
 
 
 
श्रीभगवानुवाच—
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन् मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥

"श्रीभगवानुवाच" — "कृष्ण उवाच" नहीं बोला, "भगवानुवाच" क्योंकि कृष्ण का अर्थ ही होता है भगवान और भगवान का अर्थ होता है कृष्ण। "कृष्णस्तु भगवान स्वयं।" श्रीमद्भागवतम् में भगवान के अवतार जितने हैं, मुख्य-मुख्य अवतार तो सूत गोस्वामी उसका विवरण देकर के आखिरी में सिद्धांत कर रहे हैं कि जितने भगवान का नाम हमने बताया—"रामादि मूर्तिषु कलानियमेन तिष्ठन्..." अनेक प्रकार भगवान का अवतार है, राम, नृसिंह, वराह आदि। "ये चांश-कलाः" जितने हैं, कोई भगवान का अंश है और कोई भगवान का कला है। अंश का अंश को कला कहा जाता है। मुख्य भगवान "कृष्णस्तु भगवान स्वयं।" स्वयं भगवान कृष्ण हैं, पूर्ण भगवान जो हैं वो कृष्ण हैं। "श्रीभगवानुवाच" — स्वयं कृष्ण अपने को बता रहे हैं। यह जो श्रीमद् भगवद्गीता है, जो भगवान स्वयं उपस्थित होकर अपने विषय को समझा रहे हैं। भगवान को कोई speculation करके समझ नहीं सकता। मनोधर्म से भगवान को कोई नहीं समझ पाएगा क्योंकि भगवान असीम हैं और हम लोगों की जो विद्या-बुद्धि है, वो सब सीमित है। इसलिए हमारा जो इंद्रिय ज्ञान है, अक्षज ज्ञान, वो अक्षज ज्ञान से भगवान को हम लोग नहीं समझ पाएँगे, यह असंभव है।

इसलिए जो लोग mental speculation में हैं—"भगवान इस तरह से हो गए, भगवान निराकार हैं, भगवान साकार हैं, और भगवान हैं ही नहीं, भगवान मर गया, अब हम भगवान हैं"—यह जितना speculation है, यह सब फिजूल है। क्योंकि हम लोग जो हैं, बद्ध जीव, conditioned soul, हमारा चार दोष है। एक दोष है कि भ्रम होता है हम लोगों को। बड़े-बड़े leader लोग भ्रम करते हैं, क्योंकि यह जो हम लोगों का जीवन है, इसमें भ्रम होना स्वाभाविक है। और प्रमाद, illusion—एक चीज को और एक चीज समझ लेना। जैसे हम लोग शरीर को self समझते हैं। शरीर, आत्मा... विशेष करके नास्तिक लोग, वो समझते हैं कि "यह शरीर मैं हूँ। यह जो मैं Indian हूँ, यही मैं American हूँ।" यही हम... शास्त्र में कहते हैं कि तुम शरीर नहीं हो। भगवान खुद भी कहते हैं, भगवान श्रीमद् भगवद्गीता में [गला साफ़ करने की आवाज़] "देहिनोऽस्मिन यथा देहे..." देह, यह शरीर के भीतर जो आत्मा है, वो असल चीज है, शरीर बाहरी पोशाक है। कल इस विषय में हम लोगों ने चर्चा की थी। तो इसका नाम है प्रमाद। एक चीज को और एक चीज समझते हैं। तो भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा—और दूसरे को ठगाना, cheat करना, यह भी हमारी एक प्रवृत्ति है। हमको कुछ ज्ञान नहीं है और हम leader बन गए, तो misleader हो गया। "अन्धा यथान्धैरुपनीयमानाः"—जिसको ज्ञान है नहीं, वो तो अंधा है, वो दूसरे अंधे को कैसे guide करे? यह असंभव है। तो भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा और करणापाटव—यानी हमारा जो सब इंद्रिय है, यह सब अपटु है। अब देखिए, आँख है, वृद्धावस्था होने के कारण और अपटु हो गया, चश्मा लगाने पर... अब यह कोई स्थिर है नहीं, चश्मा लगाने से ही हमको देखने को मिलेगा। इसी प्रकार सब इंद्रिय ज्ञान जो है हमारा, वो सब संपूर्ण नहीं है, उसमें बहुत-सा defects है।

इसलिए ज्ञान का लाभ करने के लिए शास्त्र में कहते हैं—"तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्।" गुरु के पास जाना चाहिए। ज्ञान लाभ, वास्तविक ज्ञान लाभ। तो गुरु कौन है? गुरु तो साक्षात् भगवान हैं, और भगवान से जो ज्ञान लेता है, वो गुरु है। हाँ, चैतन्य महाप्रभु यही बताए हैं—"आमार आज्ञाय गुरु हञा तार' एइ देश।" जिस देश में आपकी स्थिति है, उसी देश में, बाहर अगर ना भी जाइए, जिस मोहल्ला में हैं, जिस घर में हैं, जिस family में हैं, वहाँ आप गुरु बन जाइए। गुरु का अर्थ होता है दूसरों को ज्ञान देना। यह जो अज्ञान में हम लोग सब पड़े हुए हैं, इसके... इसलिए गुरु का definition है—"अज्ञान-तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन-शलाक्या। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥" गुरु का यह काम है जो अज्ञान से उसको उद्धार करके और ज्ञान में ले आना, अंधकार से प्रकाश में ले आना, यह गुरु का काम है। तो यह सभी का कर्तव्य है। अगर ज्यादा नहीं तो family-wise, अपना family में ही जो अपने बच्चे हैं और dependent हैं, स्त्री-पुत्रादि, उन्हीं का गुरु हो जाओ। और थोड़ा बढ़ा लीजिए—समाज का हो जाइए, society का हो जाइए, community का हो जाइए, देश का हो जाइए। हाँ, तो फिर गुरु कैसा होगा? उसका विषय चैतन्य महाप्रभु बताए हैं—"आमार आज्ञाय गुरु हञा तार' एइ देश। यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश॥" जो कृष्ण जो बताए हैं, कृष्ण असल गुरु हैं, भगवान, "श्रीभगवानुवाच"। इसलिए इधर कहते हैं "भगवानुवाच", उसके ऊपर कोई गुरु है ही नहीं। तो चैतन्य महाप्रभु यद्यपि स्वयं कृष्ण हैं, तथापि भक्त-अवतार से प्रचार कर रहे थे, इसलिए यह नहीं बोल रहे हैं कि "हम जो कह रहे हैं..." उनकी आज्ञा है, यह गुरु आज्ञा देते हैं, यह बात कहो। क्या बात? "यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश।" कृष्ण जो उपदेश दिया है, उसको बताओ, तब तुम गुरु हो जाओगे। और अनसंड बकोगे तो उसमें कुछ फल नहीं होगा, लाभ नहीं होगा। Real message जो है, वो कृष्ण जो बता रहे हैं, उसको लो और उसको बताओ दुनिया में।

यह चैतन्य महाप्रभु का mission है कि—"पृथिवीते आछे यत नगरादि ग्राम। सर्वत्र प्रचार हइबे मोर नाम॥" यह चैतन्य महाप्रभु का mission था। स्वयं भगवान कृष्ण ही हैं, "कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णं..."। कृष्ण आकर के समझाया, खूब समझाया श्रीमद् भगवद्गीता से—"सर्वधर्मान परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।" आदमी समझा नहीं, फिर भी misled हुआ। बहुत-से आदमी ऐसा mislead [गला साफ़ करने की आवाज़] किया। इसलिए चैतन्य महाप्रभु कृष्ण होते हुए भी भक्त-रूप से आए। हाँ, भक्त शक्ति। तो वही बात समझाया। कृष्ण बोले, "सर्वधर्मान परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज" और चैतन्य महाप्रभु बताते हैं कि जो कृष्ण जो बोल रहे हैं, उसको सुनो, उसको मानो। बात एक ही है। और हम लोग भी चैतन्य महाप्रभु की आज्ञा से वही बात कहते हैं, और दूसरी बात नहीं। "जो कृष्ण पहले आया था, वो तो मर गया है, अब हम कृष्ण हो गया, हम अवतार हो गया, हम भगवान हो गया"—नहीं, यह सब बात... हम लोग वही पुरानी बात करते हैं, जैसे गुरु जी—"कृष्ण भगवान हैं और भगवान के चरण में प्रवृत्ति करो। सब समय भगवान का मनन करो, सब समय भगवान का चिंतन करो, और भगवान में भक्ति करो, भगवान का भक्त बन जाओ, भगवान को नमस्कार करो, भगवान की पूजा करो।" वही भगवान खुद जो बता रहे हैं, फिर आप लोगों के सामने उपस्थित कर रहे हैं।

"श्रीभगवानुवाच" — भगवान का अर्थ होता है, 'भगवत्' शब्द से अर्थ होता है ऐश्वर्य। हाँ, धन एक ऐश्वर्य है, बल ऐश्वर्य है, और ज्ञान ऐश्वर्य है, रूप ऐश्वर्य है, वैराग्य ऐश्वर्य है, और यश—यह सब ऐश्वर्य है। यह सब चीज का संपूर्ण अधिकारी जो है, उसको कहा जाता है भगवान। तो भगवान खुद अपने को समझा रहे हैं, जो आप लोग सब... "भगवान क्या चीज है?" सब सारा दुनिया में कोई बोलता है "भगवान है नहीं", कोई है भगवान के विषय में चर्चा है, बाकी उनको कुछ विशेष ज्ञान नहीं है। इसलिए भगवान खुद अपने को समझा रहे हैं कि—"मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन् मदाश्रयः। असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥" जिस तरह से कोई संशय नहीं है, यानी सब संशय से मुक्त होकर समग्र, संपूर्ण रूप से भगवान का ज्ञान यदि लाभ करने को चाहते हो, तो सुनो। भगवान के यह सप्तम अध्याय श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान बता रहे हैं। आप लोग सब पढ़े हुए हैं। तो उसको पहली काम कहते हैं क्या? "मय्यासक्त" — हमारे ऊपर आसक्ति बढ़ाओ। आसक्ति हम लोगों की है। क्या चीज है आसक्ति? वो हम लोग सभी जानते हैं। धन में है आसक्ति, स्त्री में आसक्ति, और family और society, nation, सभी में आसक्ति है। तो भगवान बोलते हैं कि "मय्यासक्त" — वो आसक्ति हमसे बढ़ाओ, हमारे ऊपर आसक्ति बढ़ाओ। यह जो बढ़ाओ, यह जो practice करो, "मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं..."। यह जो भगवान में आसक्ति बढ़ाना, जैसे चैतन्य महाप्रभु का है, आसक्ति क्या चीज है? [गला साफ़ करने की आवाज़] "युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितम्। शून्यायितं जगत् सर्वं गोविन्द-विरहेण मे॥" इसका नाम है आसक्ति। यह भगवान को नहीं देखकर, कृष्ण को नहीं देखकर... श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान कृष्ण, बाकी श्री राधा रानी के भाव से वो प्रचार कर रहे हैं। तो राधा रानी का यह भाव है, गोविन्द-विरह में क्या हो रहा है? "युगायितं निमेषेण" — एक निमेष मात्र समय हमारा मालूम होता है एक युग, हाँ, one moment is equal to 12 years. "युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितम्" — आँख से अनवरत पानी बह रहा है। "शून्यायितं जगत् सर्वं गोविन्द-विरहेण मे" — दुनिया सब शून्य हो गई, क्यों? "गोविन्द को हम देख नहीं रहे हैं।" इसका नाम है आसक्ति। यह आसक्ति जो राधा रानी की जो आसक्ति, यह सब समय संभव नहीं है, इसका नाम है महाभाव। परंतु कुछ-तो-कुछ आसक्ति होनी चाहिए, तभी हमारा जीवन सफल होगा।

चैतन्य महाप्रभु का प्रचार जो विषय है—"प्रेमा पुमर्थो महान्।" धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—यह पुरुषार्थ करते हैं, परंतु यह पुरुषार्थ नहीं है, इससे और आगे, वो क्या है? ना, प्रेमा, भगवत्-प्रेम लाभ, यही असल चीज है। भगवत्-प्रेम नहीं होने के कारण वो जो प्रेम है, यह भौतिक जगत में हम लोग सब विस्तारित कर दिया है। वह प्रेम फिर एकत्रित करके जब भगवान के चरण में हम लोग देंगे, उसका नाम है "मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं..."। वो योग practice करना भगवान सिखा रहे हैं। और वो योग practice किस तरह से होगा? "मदाश्रयः" — आश्रय लेना होगा भगवान का, और नहीं तो भगवान के जो निष्किंचन भक्त हैं, यानी शुद्ध भक्त, उनका आश्रय। "मदाश्रयः" — दोनों अर्थ हो सकता है कि हमारा directly आश्रय, और नहीं तो जो हमको आश्रय ग्रहण किया है, उसका आश्रय, मदाश्रय। तब यह योग साधन संपन्न होगा। "मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन् मदाश्रयः। असंशयं..." इस प्रकार से यदि आप योग साधन करें, तो निःसंशय... हाँ, सभी को भगवान के विषय में संशय होता है। किसी को पूछिए कि "भगवान—यह शब्द से आप क्या समझते हैं?" तो कोई ठीक-ठीक नहीं बता सकेगा, संशय है। पहले तो है कि "है कि नहीं है? आकार है कि निराकार है?" अनेक प्रकार से। तो भगवान बोलते हैं, "यदि आप यह योग practice करेंगे, मदाश्रयः, हमारे आश्रय में या हमारे भक्त के आश्रय में, तो असंशयम्, कोई संशय नहीं रहेगा, निश्चित हो जाएगा कि यह भगवान हैं।" और "समग्रम्" — समग्रम् का अर्थ होता है जो भगवान तो सब जगह में ही हैं। "ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।" भगवान ब्रह्म-रूप में हैं, भगवान परमात्मा-रूप में हैं, भगवान व्यक्ति भगवान के रूप में हैं, कृष्ण। "कृष्णस्तु भगवान स्वयं।" यह सब जो संदेह है, और भगवान का विस्तार किस तरह से, कहाँ, किस प्रकार है, सब श्रीमद् भगवद्गीता में... "वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥" भागवत में हम लोगों को सिखाए हैं। यदि आप कृष्ण को समझ जाएंगे, तो "असंशयं समग्रम्" — तो परमात्मा तत्व क्या है और ब्रह्म तत्व क्या है, वो भी सब समझ जाएंगे, उसको समझने में कोई मुश्किल नहीं। इसलिए हम लोगों का उचित है, जैसे भगवान बताते हैं कि "मय्यासक्त" — भगवान में आसक्ति किस तरह से बढ़े, यह प्रयास करनी चाहिए।

तो यह आसक्ति बढ़ने के जो उपाय हैं, यह गोस्वामी लोग वृंदावन में, चैतन्य महाप्रभु के जो साक्षात् शिष्य थे—श्री रूप, सनातन, भट्ट रघुनाथ, श्री जीव, गोपाल भट्ट, दास रघुनाथ—छह गोस्वामी, उनके पिता... श्री रूप गोस्वामी प्रधान माने जाते हैं। तो रूप गोस्वामी बताते हैं कि भगवान को... भगवान में आसक्ति बढ़ाने के लिए यह उपाय है। वह बताते हैं भक्तिरसामृतसिंधु में, उसमें बताते हैं क्या चीज है? ना, "आदौ श्रद्धा" — आदौ श्रद्धा, जैसे आप लोग इधर आए हैं, क्यों आए हैं? यह श्रद्धा है। "चलो जी, यह हरे कृष्ण movement होता है, चलो थोड़ा सुना जाए क्या है लोग बोलते हैं।" इसका नाम है श्रद्धा। यही श्रद्धा basic principle है। और यह श्रद्धा दृढ़ हो जाने से फिर उसको कहा जाता है निष्ठा। तो हम लोगों का गौड़ीय वैष्णव का जो आचार्य लोग हैं, वो श्रद्धा शब्द का व्याख्यान किया है कि—"श्रद्धा'-शब्दे—विश्वास कहे सुदृढ़ निश्चय। कृष्णे भक्ति कैले सर्वकर्म कृत हय॥" इसके नाम है श्रद्धा। जो भगवान जो कहते हैं—"सर्वधर्मान परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज", इसमें जिसको विश्वास पूर्ण है कि भगवान के चरण में शरणागति होने से ही हमारा जीवन सफल हो जाएगा, इसके नाम है श्रद्धा। उसको पहले कुछ श्रद्धा नहीं है, हाँ, इसको संपूर्ण विश्वास है। हाँ, "सर्वधर्मान परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज" — यह जो भगवान कहते हैं, यह कौन करेगा? जिसकी श्रद्धा है। "हाँ, भगवान जो बोल रहे हैं, यह ठीक है, यही हमको करनी चाहिए।" उसका नाम श्रद्धा। हाँ, इसलिए कृष्णदास कविराज गोस्वामी यह श्रद्धा शब्द का व्याख्यान कर रहे हैं—"श्रद्धा'-शब्दे—विश्वास कहे सुदृढ़ निश्चय।" कृष्ण बोलते हैं, "हम तुमको हर तरह से रक्षा करेंगे—अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि।" तो यह विश्वास, सुदृढ़ निश्चय—"हाँ, कृष्ण जब बोल रहे हैं जो हमको हर तरह से भगवान रक्षा करेंगे, ठीक है, हम कृष्ण का चरण ही..." हाँ, बस शरणागति। इसका नाम है श्रद्धा, आदौ श्रद्धा। फिर श्रद्धा को रक्षा करना चाहिए। sentimental एक श्रद्धा हो गया और उसको फिर ठीक-ठीक रक्षा नहीं किया तो वो क्यों रहेगा? इसलिए श्रद्धा को अटूट रखने के लिए, आदौ श्रद्धा, ततः साधु-संगः। साधु किसको कहा जाता है? साधु का अर्थ होता है भगवान के जो भक्त हैं, अनन्यभाक्, साधारण भक्त नहीं जो कि भगवान को छोड़कर कुछ जानता है, उसका नाम है साधु। [गला साफ़ करने की आवाज़] "अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः..." भगवान स्वयं कहते हैं, "वो साधु वही है।" कौन? ना, अनन्यभाक्, और कुछ जानते नहीं, कृष्ण छोड़कर और कुछ नहीं जानते। कृष्ण, "कृष्णस्तु भगवान स्वयं", कृष्ण के चरण में शरणागति, कृष्ण की सेवा, कृष्ण की पूजा, कृष्ण को नमस्कार, यह करते हैं, उसका नाम है साधु। और साधु का description अनेक जगह है, हाँ, बाकी भगवान खुद साधु का description देते हैं, उसका मतलब होता है जो अनन्यभाक् भक्त है, वो साधु है। जैसे अर्जुन, अर्जुन अनन्यभाक् भक्त हैं भगवान के, इसलिए "साधुरेव स मन्तव्यः"। तो साधु-संग करना चाहिए। साधु-संग कोई मुश्किल नहीं है। हाँ, अगर आपको कोई साधु नहीं मिलता है, तो और जो साधु हैं, उनकी बात सुनिए, वो क्या कहते हैं, वो भगवान को कैसे माने हैं? हाँ, अर्जुन कहते हैं दशम अध्याय में—"परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्। पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्॥" अर्जुन मान लिया। तो अर्जुन जैसे कहते हैं, मानिए। और अर्जुन फिर authority देते हैं कि ऐसी बात नहीं है कि "क्योंकि आप हमारे मित्र हैं, इसीलिए हम आपको कह दिया परं ब्रह्म।" नहीं, "आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा। असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे॥" व्यासदेव कहते हैं आप परं ब्रह्म हैं, नारद कहते हैं आप परं ब्रह्म हैं, असित, देवल, सब बड़े-बड़े ऋषि लोग, बड़े-बड़े आचार्य लोग सब कहते हैं। उस समय आचार्य अवश्य नहीं थे, फिर पीछे जैसा हमारा अभी भारतवर्ष में आचार्य लोग का ही अनुसरण करके हम लोग आगे बढ़ते हैं—रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्क, विष्णुस्वामी, यह सब आचार्य लोग भी "कृष्णस्तु भगवान स्वयं" मानते हैं। शंकराचार्य भी कृष्ण को मानते हैं भगवान स्वयं, "स स्वयं कृष्णः" — यह शंकराचार्य ने स्वीकार किया है। तो आचार्योपासनम्, हमको तो चाहिए कि आचार्य लोग जैसे बताए, साधु लोग जैसे बताए, उसको अनुसरण करना चाहिए। साधु-मार्गानुगमनम्, साधु लोग जैसा... "महाजनो येन गतः स पन्थाः।" इसलिए यह जो श्रद्धा है, यह श्रद्धा को बढ़ाने के लिए साधु-संग होना चाहिए। हम लोग तो सारा दुनिया में एक-एक केंद्र खोल रहे हैं, तो इसका कारण क्या है? जो उधर साधु बना रहे हैं और सबको मौका दे रहे हैं कि "आइए, तब साधु का संग कीजिए, हाँ, साधु का संग कीजिए।" यह हमारा मुख्य विषय है—एक तरफ से साधु तैयार करना और दूसरे को मौका देना, "आइए, साधु-संग कीजिए।" आदौ श्रद्धा ततः साधु-संगः।

और साधु-संग यदि अगर ठीक होगा, तो भजन-क्रिया, फिर उसकी इच्छा होगी, "मैं भी भजन करूँगा।" यह लोग भजन करते हैं, यह European, American बालक लोग, यह इतना भगवान के लिए नाच रहे हैं, गा रहे हैं, तो हम लोग भी करें, हम तो भूल गए, सब जलांजलि दे दिया। इसलिए इन लोगों को, इन लोगों को ले आए जो कुछ दिन इनका संग कीजिए, साधु-संग। आदौ श्रद्धा ततः साधु-संगः, हाँ, तो साधु-संग ठीक-ठीक होने से भजन-क्रिया। भजन-क्रिया जो है, शास्त्र में जैसा—"आदौ गुरु-प्रणिपातः, साधु-मार्गानुगमनम्, सद्धर्म-पृच्छा..." यह सब जैसे-जैसे नियम हैं, उसका नाम है भजन-क्रिया। और भजन-क्रिया होने से क्या होगा? अनर्थ-निवृत्ति। जितना अनर्थ हम लोग ग्रहण किया है, सब... यह material civilization का अर्थ होता है केवल अनर्थ। चीज का कोई जरूरत नहीं है, झूठ-मूठ हम लोग सामने ले आए। जैसे समझ लीजिए बीड़ी फूँकना, इसका कोई जरूरत है क्या? तो बीड़ी नहीं फूँकने से आदमी मर जाता है क्या? देखिए, बीड़ी का factory हजारों-करोड़ों रुपया है, यह सब अनर्थ है। इसी प्रकार एक-एक चीज लीजिए, देखिएगा इसका कोई जरूरत ही है नहीं, और उसी में हम लोग फँसेंगे, अनर्थ। हाँ, इसलिए इस भागवत में बताते हैं—"अनर्थोपशमं साक्षाद् भक्तियोगमधोक्षजे।" अनर्थोपशम, यह जो दुनिया में सब अनर्थ हो गया, मनुष्य जीवन का अर्थ यही है जो plainly, सरल भाव से जीवन को यापन करना और समय को बचा करके हमारा भगवान से क्या संपर्क है, भगवान क्या चीज हैं, मैं क्या चीज हूँ, और हमको दुनिया में क्यों इतना दुख उठाने पड़ते हैं, और कुछ इसका उपाय है कि नहीं—"अथातो ब्रह्मजिज्ञासा।" हाँ, यह हमको बहुत जरूरी है। बाकी यह सब हम लोग भूल गए, वही अनर्थ में फँस गए। हाँ, अनर्थ, अर्थ... उसमें कोई अर्थ नहीं निकलता है, परंतु उसी में हम लोग फँस गए हैं, अनर्थ। तो यदि भजन-क्रिया ठीक-ठीक होगा, तो वो जो भगवान में जैसा आसक्ति बढ़ती जाएगी, यह अनर्थ छूट जाएगा। हाँ, देखिए, यह लोग जो सब American, European भक्त हैं, इनको शुरू से ही वो illicit sex और क्या नाम अवैध स्त्री-संग और मांसादि भक्षण... बचपन से उनको पिता-माता यह powder, क्या नाम meat, उसको पानी से घोल करके पिलाया, तो बेचारी क्या करें? और शराब पीना, तो माँ-बाप शराब पीते हैं, बच्चा भी बैठा है, उसको soda water देता है, पियो, सीखता है। तो यह उनका देश का आचार है। अब देखिए, जब से यह लोग कृष्णभक्त हो गए, हाँ, सब छोड़ दिया, बिल्कुल छोड़ दिया। बालक हैं, ऐसे कुछ नहीं है जो अभी तो जो युवा हैं, और मन का अस्थिर चित्त होना ही चाहिए, बाकी नहीं, कोई नहीं। यह जितना है, कभी-कभी हमको बोलता है, "नहीं प्रभुपाद, हमको कुछ पैसा दीजिए, अच्छा cinema है, हम देखने को..." "नहीं, बिल्कुल नहीं।" सब... इसका नाम है अनर्थ-निवृत्ति। जो चीज जरूरत नहीं है, उसमें क्यों फँस जाना? हाँ, नहीं, यह भजन-क्रिया होने से यह अनर्थ-निवृत्ति हो जाएगी। आदौ श्रद्धा ततः साधु-संगोऽथ भजन-क्रिया ततोऽनर्थ-निवृत्तिः स्यात्। और साधु-संग करने से—"सङ्गात् सञ्जायते कामः" — जैसा संग कीजिएगा, वैसी कामना होगी। शराबियों के साथ संग कीजिए, तो शराब पीना अच्छी तरह से सीख जाएँगे, और यदि आप साधु का संग कीजिएगा, आप भी जरूर साधु हो जाएँगे। इसलिए यह साधु-संग की जरूरत है। आदौ श्रद्धा ततः साधु-संगोऽथ भजन-क्रिया ततोऽनर्थ-निवृत्तिः स्यात्। ततो निष्ठा रुचिस्ततः अथासक्तिः। यह आसक्ति का stage है। "ततो भावस्ततः साधकनामयं प्रेम्णः प्रादुर्भावे भवेत् क्रमशः।" यह क्रमशः पंथा है, इस तरह से भगवत्-प्रेम लाभ होता है। और भगवत्-प्रेम लाभ होने से ही जीवन सफल हो जाता है, क्योंकि जैसा आपको सुनाया कि भगवत्-प्रेम हो जाने से फिर भगवान को नहीं देखने से "शून्यायितं जगत् सर्वं", फिर जगत शून्य हो जाता है, जैसे चैतन्य महाप्रभु। इसका मतलब यही हुआ कि भगवत्-प्रेम से भगवान के पास आप जा सकेंगे, और कोई उपाय नहीं है।

और इसीलिए भगवान आते हैं, "कृष्णा... के इधर क्यों सड़ रहे हो? दुखालयम् अशाश्वतम्, जन्म-जन्मांतर केवल दुख ही प्राप्त करते हो। एक जीवन शेष हो गया और तथा देहान्तर-प्राप्तिः, फिर एक शरीर शुरू हो गया।" और वो कोई guarantee है ही नहीं, अभी तो समझ लो Indian शरीर है, और कोई American शरीर है, हम लोग समझते हैं कि हम बड़ा leader हैं भाई, यह शरीर जब छूट जाएगा, तुमको तो और एक शरीर लेना पड़ेगा। इसलिए नास्तिक लोग वो पूर्वजन्म, परजन्म है, वो मानते ही नहीं। हाँ, उसमें बड़ा बखेड़ा... बाकी नहीं मानने से क्या होगा? प्रकृति छोड़ देगी क्या? नहीं। "कारण गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु।" जो जैसा आप संग किया है, उस प्रकार आपको जन्म लेना पड़ेगा, यह प्रकृति का नियम है। "प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥" बोलते हैं "हम कर्ता हैं, हम independent हैं।" नहीं, completely under the grip of material nature. "दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥" तो यह जो Krishna consciousness आंदोलन है, यह कोई religious movement नहीं है। religion तो होता ही है, religion का अर्थ दूसरा... यह हम लोग जो dictionary में देखते हैं—religion is a kind of faith. It is not a question of faith, it is compulsory duty, that is religion. Characteristic, that is. हाँ, जैसा पदार्थों में आप देखिए कि जो लंका है, वो झाल होता है, pungent, वो उसका religion है, और sugar जो है, वो मीठा होता है, वो उसका religion है। इसी प्रकार प्रत्येक द्रव्य, प्रत्येक पदार्थ का एक-एक characteristic, वो characteristic को religion कहा जाता है। तो हम लोग जो जीवात्मा हैं, क्या characteristic है? यह चैतन्य महाप्रभु बताए हैं—"जीवेर 'स्वरूप' हय—कृष्णेर 'नित्य-दास'।" यह characteristic है कि हम लोग नित्यकाल भगवान के दास हैं, यह हमारा character है। वो जब भूल जाते हैं, तो हम तो दास तो रह जाते हैं, बाकी भगवान के दास नहीं, माया के दास। दासत्व छूटता नहीं। इसलिए हम लोग सब society के दास हो जाते हैं, और पुत्र के दास हो जाते हैं, कन्या के दास हो जाते हैं, स्त्री के दास हो जाते हैं, समाज के दास होते हैं, देश के दास हो जाते हैं। ऐसे दास ही हम लोग रहते हैं, बाकी भगवान के दास नहीं। इतना ही। यह master नहीं हैं हम। देखिए, America इतना बड़ा भारी देश है, वो Nixon थोड़ा कुछ गलती किया, तो दास ही था, उसको निकाल बाहर कर दिया बाहर। तो वो समझता है जहाँ हम master हैं, नहीं, वो दास है, सब दास हैं। तो यह जो चैतन्य महाप्रभु definition दिए हैं—"जीवेर 'स्वरूप' हय—कृष्णेर 'नित्य-दास'।" तो है तो वो कृष्णदास, भगवान का दास, बाकी यह माया-मोहित होकर वो समझते हैं "master हम, भगवान हैं।" इसका नाम है माया। इसको छोड़ने से सुखी होगा, और उसके लिए भगवान जो बता रहे हैं—"मय्यासक्तमनाः पार्थ" — भगवान में आसक्ति बढ़ाओ, यह प्रयास। यह हम लोगों का प्रचार विषय है, जो—"भक्तिः परेशानुभवो विरक्तिरन्यत्र च।" इसका नाम है मुक्ति। "मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः।" इसका नाम है मुक्ति। यह जो "हित्वान्यथारूपं" — अभी हम अन्यथा रूप में इसका दास, उसका दास, उसका... हजारों विषय का दास हो गया, इसको छोड़ के, "हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण..." स्वरूप क्या है? कृष्णदास। हाँ, भक्तिविनोद ठाकुर एक बड़ा भक्त आचार्य गीत गाए हैं—"मायार वशे जाच्छे भेसे', खाच्छे हाबुडुबु भाई।" You are being... कह रहा है आप माया की नदी में स्रोत में बह जा रहे हैं और इसमें आपको तकलीफ हो रही है। एक दफा आप स्वीकार कर लीजिए कि आप कृष्ण के दास हैं, सब दुख मिट जाएगा।

तो कृष्ण इसीलिए आते हैं, जब भूल जाते हैं हम लोग कि हम कृष्ण के दास हैं, तो उसका नाम है धर्मस्य ग्लानि, वो ग्लानि है। "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥" जब हम लोग भूल जाते हैं कि हम भगवान के दास हैं, वो धर्मस्य ग्लानि। इसीलिए भगवान वो जो धर्मसंस्थापनार्थाय आते हैं, वो धर्म क्या है? "सर्वधर्मान परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।" और जितने सब दास बने हो, यह धर्म का दास है, वो धर्म का दास, यह सब छोड़ो। असल में तुम हमारा दास हो, हमको... हमारे चरण में शरणापत्ति करो। तो यह ज्ञान कब होता है? "बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥" तो यह प्रचार का विषय है। आप लोग सब गुजराती हैं, साधारण तौर से भगवान के भक्त हैं, इसको अच्छी तरह से ग्रहण कीजिए और सारा दुनिया में अच्छी तरह से जैसे प्रचार हो, इसका ग्राहक है, ऐसी बात नहीं है, आप लोग देख रहे हैं। organized वैसे इसको प्रचार कीजिए, सहयोग कीजिए कृष्ण का। इतना ही आप लोगों से निवेदन है।
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥