श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  760408SP-VRNDAVAN_Hindi.MP3
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
उपदेश
वृंदावन, 08-अप्रैल-1976
 
 
 
नमो महावदान्याय कृष्णप्रेमप्रदाय ते ।
कृष्णाय कृष्णचैतन्यनाम्ने गौरत्विषे नमः ॥
(श्री चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला 19.53)

श्री चैतन्य महाप्रभु, अवतारों में श्रेष्ठ अवतार हैं। क्योंकि स्वयं भगवान कृष्ण सबको बोले: "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज", परंतु लोग ठीक-ठीक ग्रहण नहीं किए। चैतन्य महाप्रभु... किस तरह से भगवान कृष्ण की शरण में शरणागत लोग हो सकेंगे, उसको सिखाने के लिए फिर चैतन्य महाप्रभु के रूप से आए।

इसलिए रूप गोस्वामी ने जब उनको प्रयाग में प्रथम—प्रथम नहीं, द्वितीय दर्शन किया, उस समय इसी मंत्र से उनको नमस्कार किया:
नमो महावदान्याय कृष्णप्रेमप्रदाय ते ।
कृष्णाय कृष्णचैतन्यनाम्ने गौरत्विषे नमः ॥

एक तो कृष्ण को समझना ही बहुत मुश्किल है:
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.3)

इस प्रकार कृष्ण को तो समझना ही बड़ा मुश्किल है। बाकी चैतन्य महाप्रभु ऐसी कृपा में हैं, केवल कृष्ण को ही नहीं दिया, कृष्ण-प्रेम दिया! इसलिए रूप गोस्वामी कहते हैं: "नमो महावदान्याय"—सबसे दानी जो अवतार हैं, आप ही हैं, क्योंकि आप कृष्ण-प्रेम दे रहे हैं। और कृष्ण-प्रेम ही पंचम पुरुषार्थ है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—ये जो चार पुरुषार्थ हैं, उसके ऊपर है भगवत्-प्रेम।

इसलिए आप लोग सब जानते हैं, भागवत में पहले ही बताया गया:
धर्मः प्रोज्झित-कैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां...
(श्रीमद्भागवतम् 1.1.2)

कैतव... धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—यह सब कैतव हैं। इसके ऊपर जाना पड़ेगा। इसके ऊपर, मोक्ष के ऊपर भी जो चीज़ है, वह है भगवत्-प्रेम। जिसका भगवत्-प्रेम है, उसको समझ लीजिए मोक्ष हो गया बहुत दिन पहले। इसलिए जो भगवद्-भक्त हैं, वह मोक्ष के लिए कभी लालायित नहीं होते।

बिल्वमंगल ठाकुर कहते हैं:
मुक्तिः स्वयं मुकुलिताञ्जलि सेवितेवा...
(कृष्ण-कर्णामृत 107)
"मुक्ति के लिए मैं क्यों कोशिश करूँ? वह तो हमारे दरवाज़े पर हाथ जोड़कर खड़ी है—'महाराज, आपके लिए क्या सेवा करूँ?'"

तो यह भगवद्-भक्ति, और विशेष करके कलियुग में यह जो भगवन्नाम:
नाम चिन्तामणिः कृष्णश्चैतन्य-रस-विग्रहः ।
पूर्णः शुद्धो नित्य-मुक्तोऽभिन्नत्वान्नाम-नामिनोः ॥
(पद्म पुराण)

जैसे भगवान पूर्ण हैं, इसी प्रकार भगवान का नाम भी पूर्ण है। कोई नाम और नामी में भेद नहीं है। यह शास्त्र-सिद्धान्त है। सब आचार्य लोग यही बताते हैं।

तो समय तो हो गया, भगवान की आरती का समय है। आप लोग इतना ही... हम लोगों का प्रचार जो विषय है, सभी जगह हम लोग प्रचार करते हैं कि नाम-संकीर्तन।

पहले-पहले जब अमेरिका में गए, तो बहुत भारी हिस्ट्री (history) है। पहले हम उनको यह नहीं बताया कि तुमको यह छोड़ना पड़ेगा, यह करना पड़ेगा। कौन सुनता है? नहीं, बस "आओ, थोड़ा बैठो, नाम-कीर्तन करो।" बस इसी से हम शुरू किया था। एक वर्ष इधर-उधर भटकते रहते थे। In 1966, in the month of July, I registered this Association. दो-चार लड़के सब आते गए। फिर यही नाम सुनते-सुनते, सुनते-सुनते... एक Tompkins Square Park—what is that name? To that park चले जाते थे। और एक पेड़ के नीचे बैठ के, कुछ खोल भी नहीं, करताल भी नहीं, ऐसे ही मंजीरा बजाया। ये लोग सब आना शुरू किया, फिर नाचना शुरू किया। फिर New York Times में निकला।

इसी तरह से आहिस्ता-आहिस्ता फिर आपका West California गया, फिर Canada... इसी प्रकार आप लोगों की कृपा से अभी पृथ्वी में सर्वत्र विशेष-विशेष शहरों में—London, New York, और Moscow भी, Tokyo—सब जगह में हम लोगों का संस्थान है। यही नाम का प्रचार हो रहा है।

और यह जो किताबें हैं, यह भी नाम-कीर्तन हैं। केवल खोल-करताल से ही नाम-कीर्तन नहीं होता है। भगवन्नाम, जैसा शुकदेव गोस्वामी कीर्तन... "वैयासकिः कीर्तने"। कीर्तन का अर्थ होता है, जैसा भागवत का पाठ किया शुकदेव गोस्वामी ने, यह भी कीर्तन है। केवल खोल-करताल से कीर्तन नहीं होता है। और हमारे गुरु महाराज कहते थे, यह जो किताबें हैं, यह "बृहद् मृदङ्ग" हैं, यह बृहद् खोल हैं। अब देखिए ना, खोल इधर बजाइए—10, 20, 50, 100 आदमी सुन सकेगा। और यह जो बृहद् मृदङ्ग है, इसको बजाइए तो एक देश से और एक देश सुनता है! यह बृहद् मृदङ्ग है। तो जो इस तरह हम लोगों के यह समाज का आदर है, यह भगवान की कृपा से वह बृहद् मृदङ्ग बजाने से हुआ है।

तो आप लोग सब कृपा करके आए, इतने लोग तकलीफ़ किए, इसलिए धन्यवाद। और आया कीजिएगा। नहीं तो आप लोगों को... चैतन्य महाप्रभु कहते हैं: "एकला माली आमि, काहाँ काहाँ याब?" चैतन्य महाप्रभु कहाँ तक क्या करेंगे? आप लोग सब साहाय्य कीजिए। हमारी भी यही प्रार्थना है।

थोड़ा-बहुत यह जो उद्यम हम लोग कर रहे हैं कि भगवान का नाम दुनिया में प्रचार हो, इसमें आप लोग सब कृपा करके साहाय्य कीजिए। इसमें कोई द्वेष-भाव और द्वैत-भाव नहीं होना चाहिए। भगवान का नाम-कीर्तन है, यह तो भारत की सम्पत्ति है। और चैतन्य महाप्रभु भारतवासियों सबको यह उपदेश दिए कि:
भारत-भूमिते हइल मनुष्य-जन्म यार ।
जन्म सार्थक करि' कर परोपकार ॥
(श्री चैतन्य-चरितामृत, आदि-लीला 9.41)

भारतवर्ष का काम है परोपकार। तो यह परोपकार है। क्योंकि:
कृष्ण भुलिया जीव भोग-वाञ्छा करे ।
पाशते माया तारे झापटिया धरे ॥
(प्रेम-विवर्त 6.2)

कृष्ण को जब हम लोग भूल जाते हैं, इसी में माया पकड़ लेती है। तो यदि माया के हाथ से छुट्टी चाहते हैं:
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.14)

तो यह भगवान... भगवान तो साक्षात् हो ही सकते हैं। उसको दर्शन करने की जो आँख चाहिए। यद्यपि सब जगह भगवान मौजूद हैं, तो कनिष्ठ अधिकारी हमारे जैसे के लिए कि मन्दिर में भगवान हैं, यहाँ से शुरू किया जाए। यह नहीं है कि मन्दिर सब उड़ा दो, "भगवान सब जगह हैं"—यह बात नहीं। जैसे-जैसे आचार्य लोग हमको बताए हैं:
श्री-विग्रहाराधन-नित्य-नाना-
शृङ्गार-तन्-मन्दिर-मार्जनादौ ।
युक्तस्य भक्तांश्च नियुञ्जतोऽपि
वन्दे गुरोः श्री-चरणारविन्दम् ॥
(श्री श्री गुर्वाष्टकम् 3)

यह सब ज़रूर-ज़रूर। तो मन्दिर में आया कीजिए, और घर बैठ के सब कीर्तन कीजिए। कोई कठिन नहीं है:
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥

इसमें कम से कम आपका कुछ नुकसान तो है ही नहीं। अगर लाभ कुछ है, तो थोड़ा परख करना चाहिए। यही हम लोगों का अनुरोध है। और कृपा करके माफ़ कीजिए जो त्रुटि हो गई। आप लोग पधारे, इसलिए धन्यवाद। Thank you very much.
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥