श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  720217LE-VISAKHAPATNAM_Hindi
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
हरि कथा
विशाखापत्तनम, 17-फरवरी-1972
 
 
 
और यह जो पाश्चात्य देशों में प्रचार करने का विषय है... सन 1965 साल में जब मैं उधर Boston गया था, तो उधर मालवाहक जहाज़ (steamship) से गया था। उस समय हवाई जहाज़ में जाने की परिस्थिति नहीं थी। वो मुंबई में Scindia Steam Navigation Company है, उन्होंने हमको ticket दिया था। तो किसी तरह से मैं उधर पहुँचा था, और Boston Port पर बैठकर मैं सोच रहा था कि इनको भगवद्-भक्ति किस तरह से सिखाई जाए।

हाँ, पहले तो हम अगर कहेंगे कि, "देखो जी! तुमको माँस खाने को नहीं मिलेगा, अवैध स्त्री-सङ्ग करने को नहीं मिलेगा, जुआ खेलने को नहीं मिलेगा, और नशा-पान—चाय, coffee भी नहीं पी सकोगे।" तो ये जब सुनेंगे, उसी वक्त हमको बोलेंगे, "स्वामी जी महाराज, आप अपने घर लौट जाइए; आपकी ये सब बातें इधर नहीं चलेंगी।"

हमसे पहले एक स्वामी जी London में गए थे, तो Lord Zetland ने उनसे पूछा था, "महाराज, क्या आप हमको ब्राह्मण बना सकेंगे?" तो उनको बताया गया कि, "यह चार चीज़ें यदि आप छोड़ देते हैं, तो हम आपको ब्राह्मण बना सकते हैं।" वो बोले, "यह असंभव है! हमारे देश में यह संभव नहीं है। यह जो अवैध स्त्री-सङ्ग, जुआ खेलना, नशा-पान और माँसाहार है, यह तो हमको चाहिए ही।"

इसलिए मैं सोच रहा था कि किस तरह से इनको समझाया जाए और किस तरह से वैष्णव बनाया जाए। तो भगवान से मैंने प्रार्थना की, "इतनी दूर जब आप मुझे इधर ले आए हैं, तो ज़रूर आपका कोई उद्देश्य होगा। आप कृपा कीजिए, ताकि मैं इसका प्रचार कर सकूँ।"

तो भगवान की कृपा से, पहले-पहले तो हम Park में कीर्तन करते थे। ये बालक लोग इकट्ठे होते थे, पहले कुछ नहीं। फिर कुछ दिनों बाद इनमें से कोई-कोई बोलने लगे, "महाराज, हमको आप दीक्षा दीजिए, हमको अपना शिष्य बनाइए।" तो हमने यही शर्त रखी कि, "देखो जी, यह चार नियम पहले तुमको पालन करने पड़ेंगे। यदि इसमें तुम राज़ी हो, तो हम तुमको दीक्षा देंगे।" तो उन्होंने सब छोड़ दिया! अब एक नहीं, हज़ारों शिष्यों ने यह सब छोड़ दिया।

क्या आप लोग नहीं छोड़ सकते? जो लोग जीवन की शुरुआत से ही इन सब चीज़ों में पले-बढ़े थे, वो भगवान के नाम के प्रभाव से सब छोड़ दिए और परम वैष्णव बन गए। ये लोग बीड़ी-सिगरेट को छूते भी नहीं, चाय-coffee भी नहीं पीते हैं। आप जानते हैं, अभी जुलूस (procession) में आते-आते एक छोटी बच्ची को किसी ने coffee दी, तो उसने कहा, "नहीं, हम coffee नहीं पीते।" यह बच्चे भी संयम का पालन कर रहे हैं।

तो भगवान को प्राप्त करने के लिए ज़रूर मनुष्य को पाप से विवर्जित होना पड़ेगा। क्योंकि भगवान स्वयं श्रीमद् भगवद्गीता में कहते हैं:

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥

जो दृढ़-व्रत होकर भजन करने वाले हैं, वो साधारण व्यक्ति नहीं हैं। पापी व्यक्ति भजन नहीं कर सकेगा; केवल पुण्यवान् ही कर सकेंगे। भगवान कह रहे हैं ना—येषां त्वन्तगतं पापं—जिनके पापों का सर्वथा अंत हो चुका है और जो केवल पुण्य कर्मों में लगे हैं, वही निष्कपट भाव से भगवद्-भजन कर सकेंगे।

यह कोई साधारण बात नहीं है, क्योंकि अर्जुन ने भगवान से गीता सुनकर भगवान को क्या कहा?

परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्।

भगवान जो हैं, वे 'पवित्रं परमम्'—परम पवित्र हैं। तो परम पवित्र भगवान के पास कोई अपवित्र पापी नहीं पहुँच सकेगा। इसलिए मनुष्य को अपना जीवन पवित्र करना चाहिए।

और जीवन पवित्र करने के लिए पाप के जो चार प्रमुख स्तंभ हैं, उनसे बचना होगा। पहला है—अवैध स्त्री-सङ्ग। अपनी जो विवाहित स्त्री है... मनुष्य-समाज में विवाह-संस्कार होता है, पशु-समाज में विवाह नहीं होता। क्यों? क्योंकि मनुष्य को पाप से बचाने के लिए यह व्यवस्था है। अपनी विवाहित पत्नी को छोड़कर अन्य किसी स्त्री से संबंध नहीं रखना चाहिए। यह हमारे चाणक्य पंडित ने अपनी नीति में बताया है, साधारण सामाजिक नीति:

मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत्।
आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः॥

पंडित किसे कहा जाता है? केवल M.A. या Ph.D. पास करने से कोई पंडित नहीं होता। पंडित की पहचान क्या है? जो अपनी पत्नी को छोड़कर अन्य सभी स्त्रियों को माता के समान देखता है; दूसरे के धन को मिट्टी के ढेले के समान समझता है; और सभी जीवों को अपने समान देखता है—वही वास्तव में पंडित है।

यह नहीं कि, "हमारी भी स्त्री है और दूसरी स्त्रियों को भी फँसा लो।" यह सब घोर पाप करने से भगवान कभी प्राप्त नहीं होते। इसलिए जो महापापी होते हैं, उनका भगवान से कोई संबंध नहीं हो पाता। और वो पाप करते-करते इतने अंधे हो जाते हैं कि आगे जाकर कहने लगते हैं कि, "भगवान कुछ नहीं है, भगवान मर गया है!" अरे, भगवान हैं और तुम्हारा उनसे नित्य संबंध है!

तो देखिए, इन विदेशी नवयुवकों को समझाया गया, उन्होंने सब समझ लिया और उसी प्रकार पवित्र जीवन व्यतीत कर रहे हैं। और देखिए, वे कितने सुखी हैं! एक नहीं, हज़ारों भक्त! यह आंदोलन Europe और America में बहुत अच्छी तरह से चल रहा है, और हम लोगों का केंद्र कम से कम महीने में एक-दो नया खुल रहा है।

तो आप लोग देखिए, इसीलिए इन भक्तों को आपके सामने लेकर आए हैं। आप लोग इनको देखिए और सीखिए। आपका तो स्वाभाविक तौर से भगवान से प्रेम है, क्योंकि जिसका भारतवर्ष में जन्म हुआ है, वो तो महान् पुण्य के प्रभाव से हुआ है। फिर आप लोग अपने इस पुण्य को क्यों खो बैठते हैं?

भगवद्-भजन कीजिए, और उसका सबसे सरल उपाय यही है:

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥

धन्यवाद। Thank you. हरे कृष्ण!
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥