कामस्य न इन्द्रिय-प्रीतिः—काम का अर्थ केवल इन्द्रियों की तृप्ति नहीं है;
लाभो जीवेत यावता—जीवन-निर्वाह के लिए जितना आवश्यक हो, केवल उतना ही लाभ प्राप्त करना चाहिए;
जीवस्य तत्त्व-जिज्ञासा—मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य परम तत्त्व की जिज्ञासा करना है;
नार्थो यश्चेह कर्मभिः—संसार में सकाम कर्मों द्वारा केवल भौतिक धन उपार्जन करना जीवन का लक्ष्य नहीं है।
एक अनुवादक मिल गया तेलुगु का, हिन्दी से तेलुगु में अनुवाद करेंगे। अच्छा, तो आप हिन्दी में... अच्छा।
मनुष्य जीवन में चार पुरुषार्थ बताए गए हैं—धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। साधारण आदमी यही चाहता है कि धर्म-अनुष्ठान करके कुछ अर्थ (धन) प्राप्त करे। साधारण तौर से लोग मंदिर में जाते हैं, जैसे इधर तिरुपति बालाजी के मंदिर में आते हैं, तो कुछ अर्थ की कामना के लिए आते हैं।
अर्थ चाहिए, क्योंकि जीवन-निर्वाह करने के लिए सभी को कुछ अर्थ की अवश्य आवश्यकता है। परन्तु वो जो अर्थ हमको मिलता है, उसके द्वारा केवल अपना इन्द्रिय-तर्पण करना उचित नहीं है। इसलिए श्रीमद्भागवतम् में शास्त्र बता रहे हैं: कामस्य नेन्द्रियप्रीतिः।
'काम' का अर्थ यह नहीं है कि खूब पैसा हमको मिल गया और हम खूब भोग-विलास में लग गए, यह उचित नहीं है। लाभो जीवेत यावता—भगवान की कृपा से अपने सामर्थ्य अनुसार जीवन-निर्वाह के लिए जो कुछ मिल जाए, उसी में संतोष रखना चाहिए।
वैदिक धर्मानुसार चार वर्णों का विभाजन है—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।
ब्राह्मण का कर्तव्य है: पठन, पाठन, यजन, याजन, दान और प्रतिग्रह। ब्राह्मण विद्वान् बने, अच्छी तरह से वेदादि शास्त्रों का अध्ययन करे और दूसरों को समझाए; इसका नाम है पठन-पाठन।
क्षत्रिय जो हैं, उनके लिए कर (tax) लेकर जीविका उपार्जन करना विहित है। प्रजा द्वारा जो उत्पादन होता है, उसमें से यथोचित अंश ग्रहण करके क्षत्रिय समाज का रक्षण करें और अपना जीवन निर्वाह करें।
वैश्य कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य करें, और शूद्र सेवा कार्य करें।
इसलिए शास्त्र कहते हैं: कामस्य नेन्द्रियप्रीतिः। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—विशेष करके जो खूब रुपया कमाए, खूब आमदनी हो, तो उसे केवल इन्द्रिय-भोग में लगा दे, यह उचित नहीं है।
आजकल कलयुग में विशेष करके सभी लोग केवल इसी चिंता में हैं कि किस प्रकार अधिक से अधिक रुपया मिले और उसे अपने इन्द्रिय-सुख में लगाया जाए; यही सब जगह चल रहा है। इसी कारण से यद्यपि आजकल दुनिया में बहुत से लोगों के पास धन बहुत है, परन्तु कोई सुखी नहीं है; किसी के मन में शांति नहीं है।
शांति क्यों नहीं है? क्योंकि हमारे पास धन है, दूसरा आदमी उसे छीनना चाहता है। बाज़ार में चीज़ों के दाम बढ़ते जाते हैं; आज एक दाम है, कल दूसरा दाम है। सभी लोग अशांत और परेशान हैं।
इसलिए इन्द्रिय-तृप्ति में न लगकर, भगवान की कृपा से जो उपार्जन हो, उसमें अपना जीवन संयमित रखना चाहिए। यह बात नहीं है कि मनुष्य कम खाए या भूखा रहे; शास्त्र में बताते हैं:
जितनी आपको आवश्यकता है, उस प्रकार सात्विक जीविका निर्वाह कीजिए। परन्तु "और धन चाहिए, और धन चाहिए" की हवस में पड़कर उसे केवल इन्द्रिय-भोग में लगाना, यह मनुष्य के लिए उचित नहीं है।
इसलिए शास्त्र में कहते हैं: जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा। 'जीवस्य' का अर्थ होता है हर एक जीवात्मा के लिए—चाहे हिन्दू हो, मुसलमान हो, Christian हो—सभी मनुष्यों के लिए तत्त्व-जिज्ञासा अनिवार्य है। इसीलिए वेदान्त-सूत्र में पहला ही सूत्र है:
अथातो ब्रह्मजिज्ञासा।
यह जो मनुष्य जीवन है, अनेक जन्मों के पश्चात हमको मिला है। चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करते-करते यह दुर्लभ मनुष्य जीवन मिलता है। इसलिए इस मनुष्य जीवन में परम तत्त्व की जिज्ञासा करनी चाहिए।
जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभिः।
सब मनुष्य अपने-अपने कर्म में लगे हैं, रुपया-पैसा कमाने के लिए सभी व्यस्त हैं। परन्तु केवल रुपया कमाकर भोग-विलास करना जीवन का लक्ष्य नहीं है। तत्त्व-जिज्ञासा केवल मनुष्य जीवन में ही हो सकती है, क्योंकि जो अन्य पशु हैं—कुत्ता है, बिल्ली है, या अन्य जानवर हैं—वो तत्त्व-जिज्ञासा नहीं कर सकते।
तत्त्व-जिज्ञासा का अर्थ होता है ज्ञान और वैराग्य। ज्ञान से ही तत्त्व-जिज्ञासा जागृत होती है। अब प्रश्न उठता है कि तत्त्व क्या वस्तु है, और किसके पास जाकर उसके विषय में पूछा जाए?
इसलिए वैदिक शास्त्रों में आदेश दिया गया है:
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्
समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्॥
उस परम तत्त्व वस्तु को जानने के लिए गुरु के पास अवश्य जाना चाहिए। और गुरु का लक्षण भी शास्त्रों में बताया गया है: श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्—जो वेदों के ज्ञाता हों और परब्रह्म में पूर्णतया निष्ठावान् हों।
शास्त्रों में जैसा बताया गया है, गुरु-परंपरा का ज्ञान होना चाहिए:
एवं परंपराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।
भगवान ने स्वयं यह तत्त्व-ज्ञान पहले सूर्यदेव विवस्वान् को बताया था, सूर्यदेव ने मनु को, और मनु ने इक्ष्वाकु को। इसी प्रकार गुरु-परंपरा से यह ज्ञान आता है।
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर गुरु के लक्षण के विषय में बताते हैं:
गुरु का प्रमुख लक्षण यही होता है। यह संसार दावानल (जंगल की आग) के समान है, जिसमें सारा संसार जल रहा है। दावानल का अर्थ होता है जंगल की आग; जंगल में कोई आग लगाने नहीं जाता, वह स्वतः ही बाँसों के घर्षण से लग जाती है।
[श्रील प्रभुपाद द्वारा श्री गुर्वाष्टकम् प्रार्थना का कीर्तन]
तो यह सिद्धांत है कि तत्त्व-जिज्ञासा करने के लिए, तत्त्व वस्तु को समझने के लिए प्रामाणिक गुरु के पास जाना चाहिए। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने इन आठ श्लोकों में गुरु के दिव्य लक्षण बताए हैं। गुरु का पहला लक्षण है कि वे शिष्य को इस संसार रूपी दावानल से पार उतार देते हैं।
और गुरु को सब तत्त्व ज्ञात होता है, जैसा श्रीमद् भगवद्गीता में बताया गया है:
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥
गुरु तत्त्वदर्शी होने चाहिए। जिन्होंने तत्त्व का साक्षात् दर्शन किया है, वही तत्त्व का ज्ञान दे सकेंगे।
और वह तत्त्व क्या है? यह श्रीमद्भागवतम् में स्पष्ट बताया गया है:
तत्त्वज्ञानी पुरुष जानते हैं कि परम तत्त्व वस्तु एक अद्वय-ज्ञान वस्तु है। उसी एक तत्त्व को कोई निराकार ब्रह्म कहता है, कोई अन्तर्यामी परमात्मा कहता है, और कोई साक्षात् भगवान कहता है।
अद्वय-ज्ञान का अर्थ होता है कि वस्तु एक ही है, परन्तु समझने वाले की योग्यता और अनुभूति के अनुसार वह पृथक-पृथक रूप में समझी जाती है। जो ज्ञानी हैं, वे निराकार ब्रह्म का अनुभव करते हैं; जो योगी हैं, वे परमात्मा का ध्यान करते हैं; और जो अनन्य भक्त हैं, वे साक्षात् परम पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण की सेवा करते हैं।
जो अपनी शुष्क बुद्धि से परम तत्त्व को समझना चाहते हैं, उनकी दौड़ केवल निराकार ब्रह्म तक ही सीमित रह जाती है। परन्तु यदि तत्त्व वस्तु को केवल निराकार ब्रह्म तक ही जाना, तो इसका अर्थ यह हुआ कि हमारा ज्ञान अभी अधूरा है, संपूर्ण नहीं हुआ। इसलिए जो अपने को ज्ञानी समझते हैं, जब तक वे भगवान वासुदेव को नहीं समझेंगे, तब तक उनका ज्ञान अपूर्ण रहेगा।
यह निराकारवादी ब्रह्मज्ञानी जब अनेक जन्मों तक तपस्या और प्रयत्न करते हैं, तब पूर्ण ज्ञान प्राप्त होने पर भगवान वासुदेव के साकार रूप को समझ पाते हैं। इसलिए श्रीमद् भगवद्गीता में बताया गया है:
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥
यह तथाकथित ज्ञानी जब अनेक जन्मों के बाद पूर्ण ज्ञान को प्राप्त होते हैं, तब समझते हैं कि भगवान वासुदेव, श्री कृष्ण ही सब कारणों के कारण हैं, और फिर वे उनके चरण-कमलों में पूर्णतया समर्पित हो जाते हैं।
तो इसलिए, अभी समय अधिक हो रहा है। आप लोग भी थक रहे होंगे। फिर कल यदि अवसर मिलेगा, तो इस तत्त्व के विषय में आगे विस्तार से समझाएंगे।
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