ईश्वर, भगवान! बहुत से बड़े-बड़े research scholars, दार्शनिक सारी दुनिया में विचार कर रहे हैं कि "भगवान क्या चीज़ है? भगवान हैं कि नहीं?" और अनेक प्रकार के भगवद्-चिंतन मनुष्य-समाज में चालू हैं। परन्तु शास्त्र में कहते हैं:
अथापि ते देव पदाम्बुज-द्वय-प्रसाद-लेशानुगृहीत एव हि।
जानाति तत्त्वं भगवन्-महिम्नो न चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वन्॥
भगवद्-तत्त्व उसी को मालूम होता है जिसके ऊपर भगवान की कृपा हो। साधारण व्यक्ति भगवान को समझ नहीं पाएगा; क्योंकि यह भौतिक जो जीवन है, इधर भगवान को भूल जाना एकमात्र काम है। भौतिक जीवन का अर्थ ही होता है—भगवान को भूल जाना।
एक वैष्णव कवि का शास्त्र-सिद्धांत है:
कृष्ण भुलिया जीव भोग-वाञ्छा करे।
पाशते माया तारे झापटिया धरे॥
जब मनुष्य भगवान को भूल जाता है—कृष्ण भुलिया—और कृष्ण को भूलने का अर्थ होता है कि दुनिया को मैं भोग करूँ। जो कर्मी लोग हैं, उनका यही विचार है कि जहाँ तक संभव हो, मैं दुनिया को अच्छी तरह से भोग करूँगा। यही विचार चल रहा है।
हाँ, कृष्ण भुलिया जीव भोग-वाञ्छा करे—यह तो भोग कर नहीं सकता, परन्तु सोचता है कि मैं भोग करूँ। इसी का नाम है माया! वो तो वास्तविक भोग नहीं करता, भोग्य हो जाता है। यानी एक भोग का लक्ष्य करके जो काम करता है, उसके लिए काम करते-करते परेशान हो जाता है। यह भोग्य हो जाता है, उसको कोई और भोग लेता है—माया! परन्तु वो समझता है कि मैं भोग कर रहा हूँ। इसी का नाम है माया।
भोक्ता तो भगवान हैं, जैसे श्रीमद् भगवद्गीता में बताया गया है:
यह कर्मी लोग समझता है कि "मैं भोक्ता हूँ, मैं दुनिया को भोग करूँगा।" और बड़े-बड़े leader लोग जो जनता के मित्र बनते हैं minister बनने के लिए... तो वास्तविक एकमात्र मित्र जो हैं, वो भगवान कृष्ण हैं—सुहृदं सर्वभूतानाम्। यह जो संसारी मित्र हैं, यह अपनी जो जान-पहचान है, उसी के मित्र हैं। बड़े-बड़े जो लोग हैं, सबका मित्र नहीं हो सकते। अगर सबका मित्र होते, तो इन जानवरों को क्यों slaughterhouse में भेजते? सबका मित्र नहीं हो सकते। वो अपनी कोई जान-पहचान का होता है, जैसे मैं अपनी स्त्री का मित्र हूँ, पुत्र का मित्र हूँ, या दो-चार आदमियों का मित्र हूँ। सबका मित्र नहीं हो सकता, यह संभव नहीं है। सबका मित्र तो भगवान कृष्ण हैं—सुहृदं सर्वभूतानाम्।
यह जब समझ में आएगा कि हमारा जो मित्र है, असल मित्र जो है, वो भगवान हैं; जिसको यह बात समझ में आ गई, उसी को शांति मिल सकती है, दूसरे को नहीं। भगवान खुद कहते हैं: सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति।
इसलिए हमारे बड़े-बड़े जो महाजन हैं, जैसे प्रह्लाद महाराज, अम्बरीष महाराज और बड़े-बड़े भक्त सब हुए हैं, वो दुनिया को मित्र नहीं माने थे। अपने पिताजी को भी मित्र नहीं माना, जैसे प्रह्लाद; वो भगवान को मित्र माने। सब विचार... गोपी लोग भगवान को पति मानीं। ऐसे देखिए, बड़े-बड़े जो भक्त हैं, जैसे अर्जुन; अर्जुन ने कृष्ण को ही अपना मित्र माना। इस प्रकार महाजन लोगों का जो रास्ता है, उसका हम लोग अनुसरण करेंगे:
महाजनो येन गतः स पन्थाः।
तो हमको भगवान मिल सकते हैं, भगवान की कृपा मिल सकती है।
और भगवान की कृपा बिना भगवान को कोई समझ नहीं पाएगा। यह सिद्धांत है: अथापि ते देव पदाम्बुज-द्वय-प्रसाद-लेशानुगृहीत एव हि। जो भगवान की कृपा लाभ किया हुआ है, वो भगवद्-तत्त्व ज्ञान लाभ कर सकता है।
और भगवद्-तत्त्व ज्ञान लाभ होने से आपको क्या होगा? क्या लाभ होगा? यह भी भगवान खुद बता रहे हैं:
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥
जो व्यक्ति हमारे जन्म और कर्म का दिव्य तत्त्व समझता है, उसको क्या लाभ होता है? त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति—हे अर्जुन! जो हमारा जन्म कैसा होता है, कर्म कैसा होता है, इसको अच्छी तरह से तात्विक समझता है in truth, उसको यह लाभ होता है कि यह शरीर छोड़कर पुनर्जन्म... उसको फिर भौतिक जगत में पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता। फिर क्या होता है उसका? इधर जन्म नहीं होता, तो क्या सीधा लय हो जाता है? नहीं, मामेति—"वो मेरे धाम को प्राप्त होता है।"
और भगवान के पास जाने से क्या लाभ होता है? वही लाभ होता है:
यह सब विचार श्रीमद् भगवद्गीता में है। यदि आप लोग श्रीमद् भगवद्गीता ठीक-ठीक पढ़ेंगे और यह ठगबाज़ी जो श्रीमद् भगवद्गीता की मनगढ़ंत टीका-टिप्पणी है, इसको सब भूल जाएँगे, तो भगवद्-तत्त्व का आपको ज्ञान हो जाएगा। और भगवद्-तत्त्व ज्ञान होने से आपको यह जो जन्म-जन्मांतर—एक जन्म छोड़कर दूसरा जन्म लेना, फिर और एक जन्म लेना—इस प्रकार जो आदमी भ्रमण कर रहा है... इस science को, विज्ञान को कोई जानता ही नहीं, भूल गया है।
ना तो इसके लिए कोई school है, ना college है। जीव-तत्त्व क्या चीज़ है? किस प्रकार यह कुत्ता होता है? किस प्रकार देवता होता है? मनुष्य होता है, पक्षी होता है, कीड़ा होता है? क्यों? यह सभी तो जीव हैं। यह अलग-अलग पृथक-पृथक शरीर हैं, पृथक-पृथक स्थान हैं, और पृथक-पृथक उसको दुःख-शोक भोगना पड़ता है। इस विषय में कोई school नहीं है, college नहीं है, university नहीं है। परन्तु हम लोग समझते हैं कि हम लोग बहुत आगे बढ़े हैं—advancement of material science! What is this material science if you do not know yourself?
जितने दुनिया में जन्म लेते हैं, सब अबोध हैं; जन्म से ही मूर्ख हैं: जन्मना जायते शूद्रः। शूद्र का अर्थ होता है मूर्ख, जिसे आत्म-ज्ञान नहीं है। यह जो मनुष्य-जीवन मिलता है, यदि आत्म-तत्त्व का जिज्ञासु नहीं है, तो वो जो कुछ काम कर रहा है—business कर रहा है, politics कर रहा है, minister बन रहा है, और जो कुछ हो रहा है—वो समझिए सब पराभव; वो हार रहा है, being defeated!
और यही science दुनिया में लोग समझते नहीं। वो समझता है कि हम किसी तरह से President बन जाएँ, तो हमारी समस्या हल हो जाएगी। देखिए, बड़ी भारी जाति, United States of America, उसके President Mr. Kennedy... बहुत रुपया-पैसा खर्च करके, आप लोग जानते हैं यह लोग जब President, Minister बनते हैं तो कितना रुपया खर्च करते हैं, कितना सब साधन लगाते हैं। बहुत बड़े धनी आदमी, सब खर्च करके President बने, परन्तु एक second में उनका सब खत्म हो गया! एक आदमी ने गोली मार दी। जैसे हमारे इधर गांधी जी को भी मार दिया, बंदूक से मार दिया; आप लोग सब जानते हैं।
तो प्रकृति का नियम ऐसा ही है। हम लोग बहुत कुछ कोशिश कर रहे हैं इधर भोक्ता बनने के लिए, बड़ा होने के लिए; बाकी:
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
प्रकृति का ऐसा नियम है कि सब एक second में खत्म कर देगी, एक second में! ज्यादा नहीं। इसको हम लोग नहीं समझते। और एक second में शरीर जब खत्म हो गया, उसके बाद आपका Presidency और बिड़ला-टाटा कुछ नहीं चलेगा। उसके बाद तो फिर प्रकृति के नियम से आपको दूसरा शरीर लेना पड़ेगा। अगर आपने कुत्ते जैसा काम किया है, तो कुत्ते का शरीर लेना पड़ेगा; और यदि देवता जैसा काम किया है, तो देवता का शरीर। यह प्रकृति का नियम है: कर्मणा दैव-नेत्रेण।
इस science को समझना चाहिए। और यह science जो है, यह विज्ञान श्रीमद् भगवद्गीता में अच्छी तरह से समझाया हुआ है। दुर्भाग्य है कि गीता का जो व्याख्यान करने वाले हैं, यह सब अलग-अलग मनमाना व्याख्यान करते हैं और आदमी को पथभ्रष्ट कर देते हैं।
इसलिए यह जो Krishna consciousness movement है, कृष्ण-भक्ति-रस-भाविता, इसका एकमात्र उद्देश्य है कि श्रीमद् भगवद्गीता As It Is—यथारूप—इसका प्रचार करना। श्रीमद् भगवद्गीता में कृष्ण भगवान कहते हैं:
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
भगवान कहते हैं कि, "मुझसे बढ़कर और कोई तत्त्व नहीं है।" और यह शास्त्र का सिद्धांत है, ऐसा नहीं कि कृष्ण केवल advertise कर रहे हैं। यह सब शास्त्रों का सिद्धांत है: कृष्णस्तु भगवान् स्वयं। मुख्य भगवान, मूल भगवान जो हैं, वो कृष्ण हैं। उनके वैभव, प्राभव, विलास अनेक मूर्तियाँ हैं, परन्तु असल जो मूल भगवान हैं, वो कृष्ण हैं।
और कृष्ण ऐसे नहीं हैं कि केवल भारत के लिए हैं, या हिन्दुओं के लिए हैं। कृष्ण कहते हैं:
"सारी योनियों में जितने शरीर उत्पन्न होते हैं, मैं उन सबका बीज-प्रदाता पिता हूँ।" सबके पिता भगवान हैं। इसलिए भगवान कृष्ण केवल भारतवासियों या हिन्दुओं के लिए नहीं हैं। यह विचार American लोग, European लोग ठीक से समझे हुए हैं, इसीलिए उन्होंने कृष्ण-भक्ति को ग्रहण किया। यह कोई साम्प्रदायिक हिन्दू धर्म ग्रहण नहीं किया। हिन्दू धर्म, मुसलमान धर्म, Christian धर्म—यह सब तो अलग-अलग संप्रदाय हैं। परन्तु भगवान कहते हैं: सर्वधर्मान् परित्यज्य। यह कृष्ण-धर्म, Krishna consciousness, यह सबके लिए है, सारी दुनिया के लिए है। इसीलिए सारी दुनिया इसे ग्रहण भी कर रही है।
आप लोगों का कर्तव्य है कि आपके देश में भगवान कृष्णचन्द्र आविर्भूत हुए थे, इसलिए आपका विशेष कर्तव्य है; विशेषकर आपका गुजरात! कृष्ण तो गुजराती थे, आप लोगों के अपने थे। मथुरा में तो उनका ननिहाल था, उधर जन्म हुआ था; उनका कर्मक्षेत्र, ससुराल, राज्य द्वारका—गुजरात था। यह तो हमारा स्वाभाविक प्रेम का आदान-प्रदान है। कृष्ण सबके लिए हैं, परन्तु आपको विशेष प्रेम होना चाहिए।
जैसे भगवान कृष्णचन्द्र को यादव कहा जाता है। कृष्ण किसी वंश के नहीं हैं, परन्तु कृपा करके जहाँ आविर्भूत होते हैं, उनका नाम उस वंश से प्रसिद्ध होता है। जैसे उदाहरणस्वरूप, चन्दन मलय देश में पैदा होता है, इसलिए चन्दन को 'मलयज चन्दन' कहा जाता है। इसी प्रकार भगवान कृष्णचन्द्र ने वृन्दावन में लीला की थी और आपके द्वारका में राज्य किया था। तो भगवान सबके लिए हैं, परन्तु विशेषता है वृन्दावन, मथुरा और द्वारका की। इसलिए हम सबका कर्तव्य है कि भगवान से जो हमारा गहरा संपर्क है, उस कृष्ण-भक्ति-रस-भाविता को सारी दुनिया में किस तरह से प्रचार किया जाए, इसके लिए आप लोग कोशिश ज़रूर कीजिए। यह आपका अधिकार है, और इसमें भगवान कृष्ण अत्यंत संतुष्ट होंगे।
भगवान ने श्रीमद् भगवद्गीता में बताया है:
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥
"जो भगवान के नाम और गुण का प्रचार करते हैं दुनिया में, उससे बढ़कर प्रिय मनुष्य-समाज में मेरा कोई नहीं है।" ऐसे भगवान कहते हैं। तो भगवान का यदि आप प्रिय होना चाहते हैं, तो यही कार्य करना चाहिए; यही जीवन की सफलता है।
देखिए, गोपी लोग; वो कोई ब्राह्मण-कन्याएं नहीं थीं। गाँव की ग्वाल-बालिकाएं थीं। बाह्य दृष्टि से उन्होंने वेदांत नहीं पढ़ा था, परन्तु कृष्ण की वो अपने से बढ़कर प्रिय बन गईं! इसलिए उनका नाम इतना है, उनका गौरव इतना है। और उनकी जो उपासना है, चैतन्य महाप्रभु कहते हैं:
आराध्यो भगवान् व्रजेश-तनयस्तद्धाम वृन्दावनं
रम्या काचिदुपासना व्रजवधू-वर्गेण या कल्पिता।
शास्त्रं भागवतं प्रमाणममलं प्रेमा पुमर्थो महान्
श्रीचैतन्य-महाप्रभोर्मतमिदं तत्रादरो नः परः॥
भगवान जैसे आराध्य वस्तु हैं, वैसे ही उनका धाम वृन्दावन आराध्य है; और उपासना—गोपी लोगों ने जैसी उपासना की थी, उससे बढ़कर कोई उपासना नहीं है। देखिए, गोपी लोग क्या करती थीं? केवल भगवान को ही जानती थीं, उनका और कुछ काम ही नहीं था। भगवान गोचारण के लिए वृन्दावन के बाहर चले गए, और गोपियाँ घर में चिंता कर रही हैं कि भगवान के चरण-कमल कितने कोमल हैं:
"जिन चरण-कमलों को हम अपने वक्षस्थल पर भी रखते हुए डरती हैं कि कहीं हमारे कठोर स्पर्श से उन्हें चोट न लगे, उन्हीं सुकोमल चरणों से आप कांटों और पत्थरों से भरे जंगलों में घूम रहे हैं! न जाने आपके चरणों में कितनी कंकड़-पत्थर चुभ रहे होंगे!" यह सोच-सोच कर गोपियाँ घर में रोती थीं। इसका नाम है कृष्ण-भावनामृत!
कृष्ण कहीं बाहर रहें, कुछ बात नहीं; सब समय कृष्ण-चिंतन करना, वही सबसे बड़ा योग है। श्रीमद् भगवद्गीता में ऐसे बताया गया है:
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥
"जितने बड़े-बड़े योगी हैं, उन सब योगियों में सबसे बड़ा योगी कौन है? जो सब समय अपनी अंतरात्मा में मेरा चिंतन करता है।" जैसे गोपी लोग करती थीं। यह सबसे बड़े योगी हैं, यह शास्त्र का विचार है।
और इस प्रकार भगवद्-चिंतन में यदि आप समाधिस्थ हो जाएँगे... यह नहीं कि गोपी लोग जाकर कोई आसन, प्राणायाम, ध्यान करती थीं; नहीं, स्वाभाविक तौर से केवल कृष्ण-चिंतन! जीवन ऐसा बना लीजिए कि स्वाभाविक तौर से कृष्ण-चिंतन हो। चाहे आप business में रहिए, कारखाने में रहिए, factory में रहिए, चाहे engineering कीजिए, चाहे politics कीजिए। जैसे अर्जुन; लड़ाई भी करते थे और कृष्ण का चिंतन भी करते थे:
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
कृष्ण ने यही उपदेश दिया था। कृष्ण ने ऐसी बात नहीं कही कि तुम युद्ध छोड़-छाड़ कर जंगल में चले जाओ और मेरा चिंतन करो। जो सच्चा चिंतन करने वाला होगा, वो कहीं भी रहेगा, कृष्ण-चिंतन करेगा।
तो यह कृष्ण-चिंतन, कृष्ण-भावना, Krishna consciousness, यह दुनिया में प्रचार हो रहा है और उसका फल भी मिल रहा है। देखिए, सारी दुनिया में लोग कृष्ण-चिंतन करने लगे हैं। सब समय:
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हमारा यह जो प्रतिष्ठान है, प्रत्येक मंदिर में कम से कम 25 से 50, कहीं-कहीं और ज़्यादा ऐसे समर्पित भक्त हैं। और इनका कार्यक्रम सवेरे 4:00 बजे से शुरू होता है। आप लोग जानते हैं सूरत में हम लोग हैं, हम लोगों का काम शुरू हो जाता है सवेरे 4:00 बजे और रात 10:00 बजे तक, और कभी-कभी उससे भी ज़्यादा चलता रहता है। यही कृष्ण-सेवा, और कोई काम नहीं है। रोजाना दो-चार जगह मीटिंग हो रही है। सवेरे मंगला आरती, दोपहर में आरती, शाम को आरती; हम लोगों को फुर्सत भी नहीं।
फिर Editorial Department है; यह बड़ी-बड़ी भारी-भारी किताबें जो छपी हैं, आपके सामने मौजूद हैं, और भी किताबें छपनी हैं। 5 लाख 'Back to Godhead' पत्रिकाएं छपती हैं। बहुत काम है, हमारे पास आदमी भी बहुत हैं और काम भी बहुत है। कृष्ण का कार्य है, और भगवान जो unlimited हैं, उनके भक्त भी unlimited हो सकते हैं। आप लोग अगर सब इसमें योगदान करें, तो आप देखिएगा कि आपके पास 24 घंटे कृष्ण का काम रहेगा। ऐसा सुंदर यह आंदोलन है!
इसलिए हमारा निवेदन है कि आप लोग:
प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेय-आचरणं सदा।
प्राण से, अर्थ से, बुद्धि से और वचन से—इस Krishna consciousness movement में सहयोग कीजिए। इसमें दुनिया का सुख होगा, आपका सुख होगा और भगवान भी सुखी होंगे। भगवान जब देखेंगे कि हमारे भक्त हमारे नाम, गुण, लीला और वैशिष्ट्य का प्रचार करने में लगे हैं, तो भगवान ज़रूर प्रसन्न होंगे। भगवान तो खुद कहते ही हैं: न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः। भगवान का प्रिय होना ही मनुष्य-जीवन का एकमात्र उद्देश्य है।
और यह सरल उपाय है: कृष्ण-भक्ति का प्रचार कीजिए—अपने जीवन से, धन से, वचन से, बुद्धि से। देखिए, आपका जीवन सफल हो जाएगा। यही हमारा निवेदन है।
Thank you very much. हरे कृष्ण।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥