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ओ बज्ञान तिमिनार दिश्चा ग्यानान्यन शलागया चक्षूर मिलितं जेना तश्मैं स्री गुरवेनो
स्री चैतर्न मनो भिष्टम स्थापितं जेन भूतले सैंग्र रूप कदामयं ददाती शपदान्थिकं
एकृष्णा कृणाशंद्धो दीनवंधो जगतपते गोपेश गोपिका कांत राधा कांत नमस्तुते
तप्तकांचन गुणांगी राधे बिन्दावनेश्चरी ब्रिखभानु सुते देवी प्रणमामी हरिप्रिये
बंचा पल्पत रुभश्चा
प्रीपाशेंद्र भईवचा
पतितानां पावनेभ्व वश्णवेभ्व नमानमा
स्री कृष्ण चैतन्य प्रभुनित्तानंद dó स्रिय अध्दैत गधाढाल शिवाशादी गोपय भक्त बिन्दा
हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण, हरे, हरे, हरे राम, हरे राम, राम, राम, हरे
आज बवशुगदें के सिमती राधाराणे, विशमानु नंदिने, उनका आविर्भाव, तिथे
सब वैश्णव लोग, मिन्नावन बाशी, बहुत उल्लासी तो है, राधाराणी के जन्म तिथी दर्शन करने के लिए, देश देशानतर से आप लोग सब आये हैं, इस अवसर में हम लोग और कुछ आगे बढ़ने के लिए चेष्टा कर रहा हूँ,
कि आज वो गुरुकुल की सिलान नयाश करने के लिए प्रजत्न किया है, इसमें आप लोग सामिल होने से बहुत हर्षोभर, तो राधाराणी की सेवा बहुन मुख,
सिर्मती राधाराणी चोर्षट प्रकार की कलाएं सब उनको मालुं था,
किस तरह से कृष्ण को सुखी किया जाएं, ये राधाराणी की कहा जाएं, राधे जय जय माधव दयित, इसलिए कृष्ण भी राधाराणी से बहुत आकृष्ट हो, कृष्ण का अर्थ होता है जो सबको आकर्षन करता है,
कृष्ण,
और कृष्ण का आकर्षन करती है स्रिमती राधाराणी, कृष्ण का नाम है मदन मोहन, जो कृष्ण का सरन में आ जाएंगे, वो मदन का हास्थे सुरक्षित हो जाएंगे,
सिपात जामुनाचार्ज ये स्लोक बताया,
जदवधी ममचित्त कृष्ण पदारविंदय, नवनव धाम रंतमासी, तदवधी बतनारी संगमे स्मर्जमाने भवती मुखविकार शुष्टु निष्टि वर्जू,
सिपात जामुनाचार्ज ये कहते हैं, जब से कृष्ण चरणारविंदय हमारा ध्यान लगा है,
जब से कृष्ण चरणारविंदय हमारा ध्यान लगा है, जब से कृष्ण चरणारविंदय हमारा ध्यान लगा है,
जन्महितु नादि गृहमे दिशुखं मितुच्छं, कंडवने न करयो रिवधुख्ः दुख्खं।
पिप्पन्ते नेह कृपना बहु दुख्ख भाज़, बहु दुख्ख भाज़, कंडवने न करयो रिवधुख्ख दुख्खं।
मनुष्य जीवन का जो उद्देश है, ये संजम, समः दम, सत्यम, सहुचम, ज्ञानं, विज्ञानं, आस्तिक्कं।
इंदिय को दमन करना है, तपश्या, विशब देव बताया है,
जो अपने पुत्र को ज्ञान दे रहा था, कहते हैं, बेटा, ये जो मनुष्य जीवन है, ये सुवर कैसे नहीं होना चाहिए।
नहीं सुवर क्या काम करता है, नहीं दिन भर परिश्चम करके गूख आता है,
और,
जब थोड़ा शरीर मुटा ताजा हो गिया,
और, स्तिरी संगम करते हैं, उसमें कोई विचार नहीं है,
तो ये मनुष्य जीवन इसलिए नहीं है,
तो किसलिए है, तपश्या करने के लिए,
और किसलिए तपश्या, दिव्यम् ...वगवान से संपक्र करने के लिए,
नयता हिरण कशी भी बहुत तपश्या करता है।
राबन भी बहुत तपश्या करता है तपो दिव्यवं ...जेन शुद्धे तो शत्या
दिव्य तप्सा करनी चाहिए
जिसमें हमारा जो सक्ता है उस सुद्ध हो जाए
क्या भी आसुद्ध है क्या हम तो बहुत असनान करते आये हैं
नहीं ये असनान सुद्ध नहीं है
सुद्ध तभी होगा
जब जन्ममित जराब्यादी से मुक्त हो जाए
वो शुद्ध है
ये जो contamination है
कि
भुत्या भुत्या प्रलियते
एक जन्म होता है
फिर ये
खतम हो जाता है
फिर आओर एक जन्म लेने पड़ता है
ये क्या कारण है
अशुद्ध्या
ने तो
जीवात्मा जो है
फर्मात्मा का अंस है
जैसा भगबान कहते है
अजोपी
मैं अजो है
हमारा जन्म नहीं होता
इसी प्रकार जीवात्मा
भगबान का अंस होने का कारण
उनको भी जन्म नहीं होना चाहिए
बाकि जन्म क्यों होता है
अशुद्ध्या, सत्या शुद्ध नहीं हो, तो सत्या शुद्ध करने के लिए हमारा जो बोईदिक सम्मता है, केवल सत्या शुद्ध करने के लिए है, और कुछ नहीं है, ताकि आप तो सब उल्टा सिदा हो गया,
ताकि हम लोग का जो प्रयासा है, ये कृष्ण कॉंशास्नेस मुव्मेंट, किन चित, चेष्टा है, कि किस तरह से बोईदिक सम्मता आदमी ग्रहन करें, और कुछ नहीं है, इसमें कोई आवर लाब उठाने का कोई प्रजत्न नहीं है,
तो आश्टे आश्टे हम लोग आगे बढ़ने के लिए प्रजत्न कर रहा हूँ, तो बिन्नावन में आजई गुरुकूर होने के लिए, उत्गाठन करने के लिए एक प्रयास,
अभी कुछ ठीक नहीं है, कहाँ से क्या रूपी आएगा, क्या होगा, बाखि शिलान नैस्त हो गया, तो गुरुकूर का उद्देशक एही है,
जो बालक, उसको शुरू से भागवत धर्म सिखाया जाता है,
अभी अध्रुबम, अर्थदम, पुर्णाद माराज, अपना विद्धालाय में, जब मौका मिलता था, वो अशुर लोग बीच में, कभी-कभी भगवान के कथा सुना देता है,
तो सब बालक है, वो सब बोलते थे, पुर्णाद, अभी आओ, हम लोग खेलें, खुदें, अभी भगवान का बात सुनने का तो समय नहीं है,
बाकि वो कहते है, नहीं, नहीं, नहीं, मित्रा, ये जो कोमार वाचरेत प्राध्या, बिल्कुल, कोमार अवस्थासे, यहने चार-पांच बरस, उमर जब हुआ, वहीं से, भागवध्धन शुक्न चलें,
क्यों, इतना जल्दी, यह जो मनुष्टर सरी मिला है, यह दुर्लव है, और अधुरूब है, यह भी ठीक है लोग,
बाकि अर्थदम, अर्थदम का अर्थ होता है, जो कुछ माल मिलने के लिए है, वो क्या चीज है, भगवान को मिलने के लिए है,
और सब जनम में नहीं मिलेगा, शेर होता है बड़ा तेजी, मलवान, बगि उसको भगवान मिलेगा नहीं, पर मनुष्य चाहिए जितना दुर्बल होई, उसको ज़िदी सिखाया जाए, शुरू से तो उसको भगवान मिल सकता है, इसलिए दुर्ल भंग जनम, शुरू से शि
दुनिया में कहीं भी है नहीं, जहाँ सिखाया जाता है जो तुम शरीर नहीं हो, सब जगय सिखाया जाता है, तुम शरीर हो, तुम आमेरिकान हो, तुम इंडियन है, तुम हिंदू है, तुम मुसल्मान है, बस शरीर का परिचा, जश्यात्मवुध्धी कुनपेतिधातु
ये गदा और गाई की सिविलीजिशन होती है, तो इस से सभी दुखी है, सब दुखी है, ये गोखरत सिविलिजिशन का वजह से, कोई सुखी नहीं है, इसलिए ये लोग उल्टा सीधा एक पार्टी बनाते, वो पार्टी बनाते, वो पार्टी बनाते, वाकि उसमें काम क्या
इसलिए कुछ उपकार नहीं होगा, उपकार तभी होगा, वो जब समझेंगे कि मैं ये शरीर नहीं है, तथा देहंतर प्राप्ती, हमको देहंतर प्राप्ती करने आए, उसको बिलीवी नहीं करता है, जब शरीर छुट जाने से, और एक शरीर मिलेगा,
और जब तक शरीर मिलेगा, हमको दुग भोगने होगा, चाहे हम रहीश होए, चाहे गरीब होए, शरीर मिलना ही माने दुग होगा, ये एजुकेशन है ये नहीं, इसलिए ज़्यादा समय आपलोग को नहीं लेंगे, एक और एक प्रयास, इसकान, इंटरनेशनल सुसाइटी �
प्रोग्रेश हो रहा है, इबन एजुकेशन, मेंबर और दे गौर्मेंट, वो आखे सर्टिफिकेट दिया, जि इधर बालोग लोग जैसे सुखी है, ऐसे कोई स्कूल, कॉलेज में हम देखा है, सुखी क्यों नहीं होगा, ये कृष्ण कॉंशासन जैसी चीज है, बहुत स
से हवाई जा रहा था, तो एक पादरी साहर, आखर के, सामी जी के नहीं टॉक ही थी, येस, नहीं, वाई आई सी यो स्टूडेंट सो ब्राइट फेसेट हो, उनका एक आश्चर जोग है, जिनका उधर में, वेस्टर्न कंट्री में, तो सभी फुल अब एंजाइटी है, वे
भोवतिक जगत में जो कोई है, वो फुल अब एंजाइटी है, हाँ, हाँ, ये देरी भर्ष, एक स्लोक है, पुरलाद महाराज की, तत्सादु मन्ने असुरवर्ज देहिना, सदा समद्विगन धियाम असत ग्रहात, ये असत बस्तो, जो ग्रहन क्या है, असतोमा सद्गमा,
असत में नहीं रहो, सद बस्तो में जाओ, ओम तत्सत, हाँ, तो पुरलाद महाराज बताया है, असत ग्रहात, ये जो मेटिरियल बॉडी हम लोग ग्रहन क्या, और इसको इंदिर्य तरपण करके लिए हम लोग प्रजत्म कर रहे हैं, इसमें केवल एंजाइटी बढ़ेगा
एंजाइटी कैसे जाएगा, इसलिए पुरलाद महाराज अड़भाईस किया था, हित्यान, हित्यात्म घातम ग्रिह अंदकूपं बनंगतो जद हरिमास्रेता, तीये साब है, शास्त्र में तो सभी उपदेश है, बाकि हम लोग लेते रहे हैं, ये ही दुख की बात है,
तो हम लोग जो टेक्सास में गुरुकुल किया है, बनाया है, उसका तश्वीर्षा मौजूत है, आप लोग चाहते देखीगा, तो इट इस प्रॉग्रेस्ट बेरी माँच,
तो हम लोग चाहते दे इधर भी भिर्णावन में एक गुरुकुल हो जाए, और गुरुकुल का विशय, जो शास्त्र में बताया गिया है, वो हमारा एक पंडिज्जी पुंडरिज्जे है, थोड़ा पढ़के सुना देजिए, आप पढ़के सुना देजिए,
अब इधर आईए, इस पंडिज्जी को हम टेक्सास में भेज रहा हूँ,
इस बहुत नाईस टीचर, उसके लिए पर्मिट और पासपोर्ट के लिए बवस्था किया जाता है, जस्ट गिवें,
पर्मिट और पासपोर्ट के लिए बवस्था किया जाता है, जस्ट गिवें,
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥