श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  701218BS-SURAT [Hindi]
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
ब्रह्म संहिता
सूरत, 18-दिसंबर-1970
 
 
 
[Chanting]
गोविन्दम् आदिपुरुषं तमहं भजामि।
गोविन्द बोलिए, गोविन्दम् आदिपुरुषं तमहं भजामि...
[संगीत]
...आलोल-चन्द्रक-लसद्-वनमाल-वश्यं प्रणयाभिरामम्... गोविन्दम् आदिपुरुषं तमहं भजामि।
...पन्थास्तु कोटि-शत-वत्सर-सम्प्रगम्यो... गोविन्दम् आदिपुरुषं तमहं भजामि।
...अद्वैतम् अच्युतम् अनादिम् अनन्तरूपं पुराणपुरुषं नवयौवनं च... गोविन्दम् आदिपुरुषं तमहं भजामि।
...यस्य प्रभा प्रभवतो जगदण्ड-कोटि-कोटिष्वशेष-वसुधादि-विभूति-भिन्नम्... गोविन्दम् आदिपुरुषं तमहं भजामि।
[संगीत]
जय श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानन्द श्री अद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौर भक्तवृन्द।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।

तो हम लोग कृष्ण भक्ति संघ—अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भक्ति संघ, International Society for Krishna Consciousness—हैं। तो हमारा उपास्य वस्तु है गोविन्दम् आदिपुरुष। आदिपुरुष भगवान श्री कृष्ण हैं, जैसा श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान कहते हैं: "अहम् आदिर्हि देवानाम..."। जितने देवता हैं, केवल भौतिक देवता—ब्रह्मा आदि, रुद्र आदि—भौतिक देवता ही नहीं, और भी जो नारायण, श्याम, अयोध्यापति (राम), वासुदेव आदि जो विष्णु-मूर्तियाँ हैं, उनके भी आदि भगवान श्री कृष्ण हैं। इसलिए वेदान्त-सूत्र में कहते हैं... जो अब है, भगवान कौन हैं? ठीक है, फिर बोलिए: गोविन्दम् आदिपुरुषं तमहं भजामि।

[Chanting]
...यस्य प्रभा प्रभवतो जगदण्ड-कोटि... गोविन्दम् आदिपुरुषं तमहं भजामि।
...आनन्द-चिन्मय-रस-प्रतिभाविताभिस्... गोविन्दम् आदिपुरुषं तमहं भजामि।
...प्रेमाञ्जन-च्छुरित-भक्ति-विलोचनेन सन्तः सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति यं श्यामसुन्दरम् अचिन्त्य-गुण-स्वरूपं... गोविन्दम् आदिपुरुषं तमहं भजामि।

यह जो सूत्र आप लोग गाए हैं, यह नाम है 'ब्रह्म-संहिता' का। ब्रह्मा जी ने सृष्टि के समय जब भगवान का साक्षात्कार (उपलब्ध) किया, उस समय ब्रह्मा जी ने इसकी रचना की, उसका नाम है 'ब्रह्म-संहिता'। तो इसमें भगवान का परिचय देते हैं: "चिन्तामणि-प्रकर-सद्मसु कल्पवृक्ष..."। भगवान गोविन्द, श्री कृष्ण, उनका धाम चिन्तामणि धाम है, प्राकृत धाम नहीं है, अप्राकृत धाम है। 'चिन्तामणि' आप लोग सुने होंगे, शायद देखे नहीं होंगे। चिन्तामणि एक मणि होती है, जो लोहा को स्पर्श करने से लोहा सोना हो जाता है, जिसे Philosopher's stone कहा जाता है। शास्त्र बताता है कि भगवान का जो धाम है, उधर जो मकान हैं, वे पत्थर-बालू के नहीं होते हैं। वे चिन्तामणि पत्थर के होते हैं, और चिन्तामणि पत्थर कोई जड़ नहीं है, इसीलिए नाम है चिन्तामणि।

उदाहरणतः, भगवान का नाम, भगवान का धाम, भगवान का रूप, भगवान का गुण, भगवान का वैशिष्ट्य—सब चिन्मय हैं, जड़ नहीं हैं। सब सच्चिदानन्द विग्रह हैं। "ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द-विग्रहः। अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्॥" भगवान का शरीर जैसे आनन्दमय, चिन्मय, ज्ञानमय और नित्य है, इसी प्रकार भगवान की सब चीजें हैं। भगवान का नाम और भगवान में कोई फर्क नहीं होता। जैसे भगवान में शक्ति है, उसी प्रकार भगवान के नाम में भी उसी प्रकार की शक्ति है। चैतन्य महाप्रभु कहते हैं: "नाम्नामकारि बहुधा निजसर्वशक्तिस्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः..."। महाप्रभु कहते हैं, "हे भगवान! आपका नाम ही सब कुछ है, आपके नाम में आपकी सर्वशक्ति है।" जैसे भगवान सर्वशक्तिमान हैं, इसी प्रकार भगवान का नाम भी सर्वशक्तिमान है। और भगवान के नाम भी अनेक हैं, जैसे 'विष्णु सहस्रनाम' है, तो ये सब नाम हैं। भगवान की शक्ति सब उसमें अर्पित है।

और वह नाम स्मरण करने के लिए कोई नियम या काल नहीं है कि "इसी काल में, इसी समय में भगवान का नाम करना है।" कोई नियमित स्मरण काल नहीं है। भगवान का नाम स्मरण करने के लिए कोई कालाकाल विचार नहीं है। और सब जो भगवान की पद्धति है, उसमें कालाकाल विचार है; जैसे सवेरे मंगल आरती, भोग, शाम को शृंगार—जैसे काल का विचार है, उसी प्रकार काल के अनुसार भगवान की सेवा की जाती है। लेकिन नाम को स्मरण करने के लिए कोई कालाकाल विचार नहीं है। जैसे भी हो, आप नाम को स्मरण कर सकते हैं। किसी भी अवस्था में चल रहे हैं, और:
"हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे"
स्मरण करने में आपको कोई दिक्कत नहीं है, कोई खर्च नहीं है, कोई नुकसान नहीं है।

देखिए, ये European और American, ये जो नौजवान सब हैं आपके सामने, सब समय नाम की जो माला है, उस पर जप कर रहे हैं। इनको कोई लज्जा नहीं है कि "हम European हैं, हम कृष्ण का नाम लेंगे तो आदमी क्या कहेंगे, हँसेंगे?" नहीं, जब भगवान में प्रेम हो जाता है, तो उसको यह बाह्य ज्ञान नहीं रहता है कि "लोग हमारे ऊपर हँसेंगे।" हँसने दीजिए, यह सब विचार नहीं रहता। यह भगवान के प्रेम का लक्षण है। भगवद्-भक्त प्रेम से अधीर होकर पागल जैसे हो जाते हैं, उनको बाहर का कोई विकार नहीं रहता। तो यह भगवान की शक्ति है। इसलिए चैतन्य महाप्रभु कहते हैं: "नाम्नामकारि बहुधा निजसर्वशक्तिस्तत्रार्पिता..."। नाम में भगवान की सब शक्ति निहित है। तो आप यदि शुद्ध नाम लेंगे, तो आपको भगवान की तरफ से सब शक्तियों के द्वारा रक्षा होगी, माया का कोई डर नहीं रहेगा। भगवान श्रीमद् भगवद्गीता में कहते हैं: "दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥" यदि आप माया के हाथ से बचना चाहते हैं, तो सब समय:
"हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे" का जप कीजिए।

आख़िर में चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि भगवान इतने कृपालु हैं, जो कलयुग के मनुष्य हैं, उनकी दुर्दशा देख करके उनको एकमात्र उपाय बताया गया है: "हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥" तो भगवान की ऐसी कृपा है कि भगवान नाम रूप से हमारे जीभ पर सब समय वास करते हैं। तो चैतन्य महाप्रभु हमारे पक्ष से खेद प्रकट करते हैं कि "भगवान! आपकी इतनी कृपा है, तब भी नाम में हमारी रुचि नहीं है, ऐसे हम दुर्भाग्यशाली हैं।" तो जो शास्त्र कहते हैं: "अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्..."। जिसका भाग्य में भगवान का नाम उच्चारित होता है, वह चाहे चांडाल कुल में ही क्यों न जन्मा हो, वह पूज्य होता है।

तो यह कृष्ण भक्ति रस धारा, दुनिया में इस नाम का प्रचार कर रही है। और आप लोगों से क्या कहें, आप लोग सहयोग करें भगवान की महिमा का प्रचार करने के लिए। मनुष्य जीवन में यही एकमात्र कर्तव्य है: "प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेय-आचरणं सदा..."। प्राण, अर्थ, बुद्धि एवं वचन से भगवान की सेवा करना। आप लोगों से निवेदन है, ये जो विदेशी भक्त लोग आए हैं, ये चार लाख रुपए खर्च करके आए हैं, इतना खर्च करके आए हैं, क्यों? वे चाहते हैं कि आप लोग भी इस संकीर्तन यज्ञ में सहयोग करें। और यह जो उपाधि-ग्रस्त हमारा परिचय है—"मैं American हूँ, मैं भारतीय हूँ, मैं जापानी हूँ, मैं हिन्दू हूँ, मैं मुसलमान हूँ"—यह सब भूल जाइए। भूल कर सब कोई यह चिंतन कीजिए कि "मैं भगवान का नित्य दास हूँ।" जब हम लोग यही चिंतन करेंगे कि हम भगवान के दास हैं, तो फिर हम मुक्त पुरुष हैं। मुक्ति का अर्थ और कुछ नहीं, अपने वास्तविक स्वरूप को उपलब्ध करना ही मुक्ति है। इस भगवद्-कीर्तन से वह स्वरूप उपलब्ध हो जाता है। इसलिए चैतन्य महाप्रभु कहते हैं: "चेतो-दर्पण-मार्जनं भव-महादावाग्नि-निर्वापणम्..."। दुनिया में जो कुछ झगड़ा-झंझट है, वह सब एकमात्र हरि-नाम संकीर्तन से ही समाधान हो सकता है। इसमें आप लोग सहयोग कीजिए।

Thank you.

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥