श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  751224LE-SANAND--Hindi.MP3
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
हरि कथा
सानंद, 24-दिसंबर-1975
 
 
 
राजा साहब, सज्जनों!

हमारे लिए तो एक मुश्किल है। मैं गुजराती तो बोल ही नहीं सकता हूँ और हिंदी भी कोई विशेष ठीक-ठीक नहीं बोल सकता हूँ। [गला साफ़ करने की आवाज़] आप लोग क्षमा कीजिएगा। यह जो कृष्णभावनामृत संघ हम लोगों ने बनाया है—International Society for Krishna Consciousness—इसका उद्देश्य यही है कि सारी दुनिया में जो सब लोग एक भ्रम में हैं, तो क्या भ्रम है? वह समझते हैं कि इस दुनिया में रुपया-पैसा खूब पैदा करके और भोग करेंगे और उसी में मैं सुखी रहूँगा। यह सब दुनिया में चल रहा है—किसी तरह से रुपया ले आओ और भोग करो। हाँ, पाश्चात्य देशों में इसको कहते हैं Hedonism—"Eat, drink, be merry, and enjoy." मेहरबानी करके रखिए, please. Please, मेहरबानी, शांति से बैठिए। आप लोग बैठ जाइए, बैठ जाओ, बैठ जाओ। तो श्री चैतन्य महाप्रभु आज से 500 वर्ष पहले यह संकीर्तन movement (आंदोलन), संकीर्तन यानी भगवान के नाम का प्रचार... भगवान और भगवान के नाम में कोई प्रभेद नहीं है।

शास्त्र में बताते हैं:
"नाम चिन्तामणिः कृष्णश्चैतन्य-रस-विग्रहः"

जो भगवान का नाम जो कृष्ण है और भगवान का नाम जो राम है, यह स्वयं भगवान हैं। "नाम चिन्तामणिः कृष्णश्चैतन्य-रस-विग्रहः"—जैसे भगवान विग्रह मूर्तिमान पूर्ण चेतन हैं, इसी प्रकार भगवान का जो नाम है, वह भी पूर्ण चेतन है। "नाम चिन्तामणिः कृष्णश्चैतन्य-रस-विग्रहः"। हाँ, उसको और अच्छी तरह से समझाने के लिए शास्त्र कहते हैं:
"पूर्णः शुद्धो नित्य-मुक्तोऽभिन्नत्वान्नाम-नामिनोः"

यह नहीं समझना चाहिए कि भगवान नाम से बहुत बड़े हैं और नाम कुछ छोटा है। नहीं, जैसा नाम, वैसे ही भगवान। जैसे भगवान सर्वशक्तिमान हैं, इसी प्रकार भगवान का नाम भी सर्वशक्तिमान है:
"नाम्नामकारि बहुधा निजसर्वशक्तिस्तत्रार्पिता"

यह भगवान का नाम, भगवान की सब शक्तियाँ उसमें हैं, यदि हम लोग शुद्ध नाम कर सकें।

नाम जपने के लिए तीन अवस्थाएँ हैं: एक नाम-अपराध, दूसरा नामाभास और तीसरा शुद्ध नाम। हाँ, नाम-अपराध... पहले-पहले हमसे अपराध होता है। बहुत से आदमी ऐसा ही समझते हैं कि हरे कृष्ण नाम जपो, या दुर्गा नाम जपो, काली नाम जपो, या और कोई देवता का नाम जपो—सभी एक हैं। यह नाम-अपराध है। शास्त्र में कहते हैं:
"हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्"

वह केवल हरि का नाम है, और कोई नाम नहीं—"हरेर्नाम"। हाँ, आदमी भ्रम से यह समझता है कि कोई भी नाम जप लो, और वे लोग बोलते हैं कि ऐसा नाम जपो। नहीं, यह शास्त्र-विधि नहीं है।
"हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा।।"

कलयुग में सब आदमी बहुत पतित हैं। कलयुग का विशेष वर्णन श्रीमद्भागवतम् के द्वादश स्कंध में बताया गया है। हाँ, सब मिलता-जुलता है। एक शब्द उसमें आया है: "लावण्यं केश-धारणम्"। कलयुग में आदमी समझेगा कि ज्यादा बाल रखने से वह बड़ा सुंदर हो जाएगा। आप लोग देखिएगा, आजकल नौजवान खूब बाल रखते हैं; वे समझते हैं कि हम बहुत सुंदर लगेंगे। "लावण्यं केश-धारणम्"—यह कलयुग की एक पहचान है, लक्षण है।

और भी बहुत से लक्षण हैं: "दाम्पत्ये रतिरेव हि"—स्त्री-पुरुष का जो संपर्क है, पति-पत्नी का जो संपर्क है, वह तब तक ठीक रहेगा जब तक उनकी काम-तृप्ति चलेगी। "दाम्पत्ये रतिरेव हि"—इसका प्रमाण विदेशों में, पाश्चात्य देशों में बहुत है। हाँ, थोड़ा उनका इंद्रिय-तर्पण में गोलमाल हुआ तो divorce कर देते हैं। तो शास्त्र में लिखा है: "दाम्पत्ये रतिरेव हि"।

वैसे ही, "विप्रत्वे सूत्रमेव हि"—ब्राह्मण कैसे रह गए? एक-दो पैसे का सूत (जनेऊ) लगा दिया, और ब्राह्मण के जो सब गुण हैं—"शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्"—जो सब गीता में बताया गया है, आप लोग जानते हैं, वह सब शम-दम सब चूल्हे में गया, बस दो पैसे का सूत लगा दिया और ब्राह्मण बन गए! यह सब कलयुग की पहचान लिखी है। और आयु, मेधा, दया और धर्म—यह सब बिल्कुल चला जाएगा। यह सब कलयुग में है, इसका विस्तृत वर्णन है। आप लोग जब भागवत पढ़ेंगे, द्वादश स्कंध के तृतीय अध्याय में यह सब वर्णन है।

इसलिए चैतन्य महाप्रभु शास्त्र के अनुसार कहते हैं कि:
"हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा।।"

कलयुग में यही एक पंथ है जो कि आपको इस भौतिक जगत से भगवान के पास पहुँचा सकता है। आदमी जानते ही नहीं कि हमारे मनुष्य जीवन का उद्देश्य क्या है, इतने नीच हो गए हैं। "न ते विदुः स्वार्थ-गतिं हि विष्णुम्"। पहले भी था, पर कम था। जैसे पहले भी रावण था, संन्यास-वेश लेकर सीता का हरण करने गया था। तो आजकल यह ज्यादा हो गया है। उस समय एक ही ऐसा संन्यासी रावण मिलता है जो कि संन्यास-वेश धारण करके परस्त्री-हरण करने के लिए गया; आजकल तो ऐसे बहुत मिल जाएँगे। तो यह कलयुग है।

और भी कलयुग के विषय में शास्त्र ने बताया है:
"प्रायेणाल्पायुषः सभ्य कलावस्मिन् युगे जनाः।
मन्दाः सुमन्दमतयो मन्दभाग्या ह्युपद्रुताः।।"

उपद्रव क्या चीज़ है, वह भी बताया है: "दुर्भिक्ष-कर-पीडिताः"—एक तरफ से खाने को चीज़ नहीं मिलेगी और दूसरी तरफ से government खूब tax लगाएगी। "दुर्भिक्ष-कर-पीडिताः" होकर आदमी सब परेशान होकर "अच्छिन्न-दार-द्रविणा गच्छन्ति गिरि-काननम्"। बहुत ही कलयुग की जो दुर्दशा का वर्णन है, शास्त्र में सब दिया हुआ है।

और उपाय भी बता दिया कि कलयुग में जीवन को सफल करने के लिए एक ही उपाय है। यह भी शुकदेव गोस्वामी ने बताया है:
"कलेर्दोष-निधे राजन् अस्ति ह्येको महान् गुणः।
कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्त-सङ्गः परं व्रजेत्।।"

अनेक प्रकार की विवेचना है शास्त्र में। उसी के अनुसार यह Hare Krishna आंदोलन हम लोग सारी दुनिया में फैला रहे हैं और उसका कुछ-कुछ फल भी मिल रहा है, आप लोग देख रहे हैं। ये सब European, American boys, girls, बच्चे भी अब सामने देख रहे हैं, एक वर्ष के बच्चे भी नाच रहे हैं। यह ऐसी चीज़ है, यह कोई artificial नहीं है, natural है, स्वाभाविक है।
"नित्य-सिद्ध कृष्ण-भक्ति 'साध्य' कभु नय।
श्रवणादि-शुद्ध-चित्ते करये उदय।।"

भगवद्-भक्ति, भगवान कृष्ण की भक्ति जो है, वह कोई सिखाने की चीज़ नहीं है; वह भीतर में सबके हृदय में है। नित्य सिद्ध है, perpetually, नित्य काल से है।

क्योंकि भगवान से हम लोगों का बहुत घनिष्ठ संपर्क है। जैसे पिता-पुत्र; पिता से पुत्र का संपर्क बहुत घनिष्ठ है। बहुत दिन पिता चाहे पुत्र परस्पर छोड़कर अगर विदेश में रहा, फिर बहुत दिन बाद जब मिलते हैं, तो वह जो पिता-पुत्र का स्नेह है, वह अटूट रहता है। इसी प्रकार भगवान से हम लोगों का जो संपर्क है, वह अटूट है। बाकी कलयुग में पाप के कारण वह ढका हुआ है, उसको जगाना चाहिए। और कुछ नहीं, "चेतो-दर्पण-मार्जनम्"। वह जगाने के लिए चित्त-दर्पण जो है—दर्पण का अर्थ होता है वह आईना जिसमें आप लोग अपना स्वरूप देखते हैं—वह मैला से ढक गया है, उसको साफ़ करना, चित्त को साफ़ करना। इसलिए हम लोग Krishna Consciousness... भावना तो है हम लोगों को, अनेक विषय हम लोग सोचते हैं, सोचकर काम करते हैं, बिना भावना के एक second भी हम लोग नहीं रह सकते हैं। तो वह भावना को शुद्ध करना चाहिए, केवल कृष्ण की भावना होनी चाहिए, बस जीवन सफल! इसका नाम है कृष्णभावना।

श्रील रूप गोस्वामी बताते हैं:
"कृष्ण-भक्ति-रस-भाविता मतिः क्रियतां यदि कुतोऽपि लभ्यते"

रूप गोस्वामी बताते हैं कि कृष्णभावना यदि कहीं आपको खरीदने को मिले, तो आप बहुत जल्दी खरीद लीजिए—"कृष्ण-भक्ति-रस-भाविता मतिः क्रियतां..."। तो यह चीज़ खरीदने के लिए कुछ दाम देना पड़ेगा? हाँ, वह भी बताया: "तत्र लौल्यमपि मूल्यमेकलम्"—यदि आप कृष्ण के लिए थोड़ा लोभी हो जाएँगे कि इसी जीवन में हमको कृष्ण चाहिए। जैसे हम लोग रुपयों के लिए लोभी हो जाते हैं, सुंदरी स्त्री के लिए लोभी हो जाते हैं, उसी प्रकार यदि कृष्ण में लोभी हो जाएँगे, तो हमारा जीवन... यही पद्धति, यही हम लोग सिखा रहे हैं।

भगवान खुद ही बताते हैं श्रीमद् भगवद्गीता में:
"मय्यासक्त-मनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु।।"

भगवान में लोभ होने का, आसक्ति... जैसे हमारी आसक्ति है दुनिया में, यानी धन में, स्त्री में और पद में, हाँ, यह सब हम लोग चाहते हैं, इसमें आसक्ति है। इसी प्रकार आसक्ति यदि भगवान में हो जाए, तो हमारा जीवन सफल हो जाए। वही चीज़ Krishna... यह जो Krishna Consciousness movement है, किस तरह से दुनिया की आसक्ति कृष्ण में हो, यह हम लोगों का प्रयास है और कुछ नहीं। तो भगवान खुद बताते हैं कि "मय्यासक्त-मनाः पार्थ योगं..."—यह जो योग है, किस तरह से कृष्ण के चरणों में आसक्ति हो, इसका नाम है भक्ति-योग। भक्ति-योग जिस तरह से हो, वह प्रह्लाद महाराज बहुत दिन पहले बताए हैं:
"श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पाद-सेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्म-निवेदनम्।।"
[खांसने की आवाज़]

Now, यह श्रवण है प्रधान—भगवद्-नाम श्रवण। "अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद्ग्राह्यमिन्द्रियैः"—यह नाम श्रवण, हरे कृष्ण, यह श्रवण से हम लोग पहले शुरू करते हैं। केवल श्रवण में यदि हम ध्यान दें, जैसे परीक्षित महाराज; परीक्षित महाराज के मरने में सात रोज़ बाकी थे, तो उन्होंने केवल श्रवण किया श्रीमद्भागवतम् का। "श्रवणं परीक्षिद्"—परीक्षित महाराज ने केवल श्रवण किया, बैठ गए और श्रीमद्भागवतम् सुना। और शुकदेव गोस्वामी ने केवल कीर्तन किया। एक-एक item है—"श्रवणं कीर्तनं विष्णोः"। चाहे भगवान का नाम श्रवण कीजिए... देखिए, यह कलयुग का प्रभाव है, यह नाम श्रवण करने में भी बाधा है। बैठ के थोड़ा शांति से भगवान का नाम कीर्तन श्रवण करें, उसमें भी चित्त नहीं लगा सकते हैं। इसलिए यही श्रवण से ही चित्त-संमार्जन होगा, चेतो-दर्पण-मार्जनम्।

पहले वह ठीक नहीं लगता है। जैसे कोई व्यक्ति को, क्या नाम, jaundice (पित्त रोग) किसी को हो जाता है, तो उसको मिश्री दीजिए, वह बोलता है यह तीता है, कड़वा है। क्योंकि पित्त रोग से... मिश्री सब कोई जानते हैं मीठा है, बाकी उसको जिह्वा में कड़वा लगता है। बाकी वह जो पित्त रोग है, jaundice है, उसको आराम करने के लिए मिश्री ही एकमात्र उपाय है। तो मिश्री खाते-खाते वही मिश्री मालूम होगी कि बड़ी मधुर है, सुमिष्ट है। इसी प्रकार यह भगवान का नाम कीर्तन, यह जो हम लोगों का भौतिक जगत का जो रोग है, इस रोग के कारण अच्छी नहीं लगती। [गला साफ़ करने की आवाज़] बाकी यह रोग मिटाने के लिए यही एकमात्र उपाय है और कुछ नहीं—हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, हरे राम, हरे राम। इसलिए थोड़ा जबरदस्ती मन को बैठाना चाहिए। हाँ, यही है साधना, अभ्यास-योग। जिसका मन बड़ा चंचल है, उसको अभ्यास-योग करना चाहिए। इसका नाम है तपस्या।

मनुष्य जीवन जो है, यह तपस्या करने के लिए है; यह कुत्ता, बिलाव, सूअर जैसा नहीं होना चाहिए। सूअर जैसा दिन भर परिश्रम करता है थोड़ा खाने के लिए। कलयुग में जो यह जो अवस्था आई है कि दो रोटी के लिए आदमी गधे जैसा परिश्रम करता है, ठेला ठेलता है, स्त्री-पुरुष मिलकर के; यह कोई मनुष्य का काम है? बाकी कलयुग में यह सब हो रहा है और भी होगा। दो पैसे के लिए आपका पुत्र आपके वक्षःस्थल में छुरी लगा देगा, यह सब time आता है। दो पैसे के लिए... सब भागवत में लिखा है। [गला साफ़ करने की आवाज़] यह सब क्रमशः time बहुत ही खराब आएगा और इसका एक ही मात्र उपाय है: "हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्..."। यह शास्त्र का वचन है।

इसलिए हम लोगों का अनुरोध यही है कि किसी भी अवस्था में आप रहिए, इस हरिनाम को जपा कीजिए। इसमें आपका कोई नुकसान नहीं है। अगर आप समझें कि कुछ लाभ भी नहीं है—लाभ तो बहुत है, बाकी आपको मालूम नहीं—खैर, नुकसान तो है ही नहीं। आप रास्ते में चल-फिर रहे हैं और यदि:
"हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।"

यह नाम को जपा करें, तो आपको क्या नुकसान हो जाएगा? लाभ जो होगा, वह तो पीछे मालूम होगा, बाकी अभी तो कुछ नुकसान तो नहीं है। और भगवान का नाम कीर्तन करने में कोई परिश्रम भी है नहीं। यही हमारा निवेदन है। कहीं भी रहिए, हाँ, किसी भी अवस्था में रहिए, कोई भी जगह में जाइए। अब देखिए ना, [गहरी सांस लेने की आवाज़] ये लोग सब Europe, America में हैं, ये तो हिंदू भी हैं नहीं और भारतवर्ष के हैं नहीं, इन सबका जन्म तो कहाँ-कहाँ हुआ है, तो क्यों ये लोग नाम करते हैं? कोई नाम करने में कभी मुश्किल है क्या? नहीं, मुश्किल कोई नहीं है, नुकसान भी कोई नहीं है।

बाकी हाँ, यदि आप नाम जपा करेंगे, यह जो हृदय में तमाम गर्दा सब इकट्ठा हो गया है, वह सब साफ़ हो जाएगा—"चेतो-दर्पण-मार्जनम्"। और हमारी जो यह तकलीफ है, इस दुनिया में असल तकलीफ जो है, वह तो हम लोग समझते ही नहीं—"जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि-दुःख-दोषानुदर्शनम्"। यह भगवान... [गला साफ़ करने की आवाज़] "Mind can be controlled... Attention!" [गला साफ़ करने की आवाज़] चेतो-दर्पण-मार्जनम्। जब चित्त-दर्पण मार्जित हो जाएगा, साफ़ हो जाएगा—जैसे आईना है, हम लोग उसमें अगर गर्दा है, वह साफ़ कर दिया जाए, तो आपका जो सुंदर मुख है, वह आप देख सकेंगे। इसी प्रकार जितना आप हरिनाम कीजिएगा—हरे कृष्ण, हरे कृष्ण—आपका चित्त-दर्पण मार्जित हो जाएगा, चेतो-दर्पण-मार्जनम्। और फिर भूल मालूम हो जाएगी कि इस दुनिया में हम इतना परिश्रम कर रहे हैं, इसका क्या कारण है? और हम मरने को नहीं चाहते हैं, क्यों हमारे ऊपर मौत आती है? हम बूढ़े होने को नहीं चाहते हैं, क्यों मैं बूढ़ा हो जाता हूँ? हम रोग नहीं चाहते हैं, क्यों रोग हमारे ऊपर जबरदस्ती आता है? यह सब प्रश्नों का उत्तर आपको मिल जाएगा—चेतो-दर्पण-मार्जनम्।

और जब यह सब प्रश्नों का उत्तर आपको मिल जाएगा, तो "भव-महादावाग्नि-निर्वापणम्"—यह जो भौतिक जगत में आग जल रही है सबके लिए, हाँ, वह जो बड़े-बड़े government minister हैं, उनके लिए भी आग जल रही है, और जो रास्ते में रोजाना नौकरी करके रोटी कमाता है, उसके लिए भी आग जल रही है। यह बात नहीं है कि आपको कोई अच्छी पदवी मिल जाए और पैसा मिल जाए, तो यह आग बुझ जाएगी। नहीं, यह बात नहीं है, यह सब हम लोगों ने साक्षात देखा है। हम नाम लेना नहीं चाहते, वह चलता है। "भव-महादावाग्नि"—इसको नाम क्यों लिया गया है? दावाग्नि का अर्थ होता है वह जो जंगल में आग लगता है, उसका नाम है दावाग्नि। वह जंगल में कोई आग लगाने को नहीं जाता है दुश्मनी करके, बाकी प्रकृति का ऐसा ही नियम है कि जंगल में भी आग लग जाती है। इसी प्रकार आप अपनी परिस्थिति में भौतिक जगत में आप अगर आग लगाना नहीं भी चाहते हैं, तो आग लग जाएगी। जैसे लड़ाई होती है; कभी-कभी लड़ाई हो गई, कौन चाहता है भाई? पर लड़ाई होती है। वज्रपात होता है, रोग होता है, हाँ, बहुत से... एक आपकी मृत्यु है, वह आपका शत्रु हो जाता है, अपना पुत्र भी शत्रु हो जाता है—यह दुनिया का नियम है। इसका नाम है भव-महादावाग्नि। आप आग लगाने को चाहते नहीं, बल्कि आग लग जाती है। हाँ, इसीलिए तो...

इसलिए चेतो-दर्पण-मार्जन होने से, जब हमको समझ में आएगा कि मैं तो कोई भौतिक वस्तु हूँ ही नहीं—उसका नाम है चेतो-दर्पण-मार्जन—मैं तो यह शरीर नहीं हूँ। हाँ, कहेंगे अभी यह जो हमारी भौतिक सभ्यता चल रही है, सब देहात्म-बुद्धि है। हम सोचते हैं हम भारतीय हैं, ब्राह्मण हैं, और यह बंगाली हैं, गुजराती हैं, यह अनेक प्रकार... और भी समझते हैं हम American हैं, हम वह हैं, वह हैं—यह सब हम लोग... यह सब कुछ नहीं है, यह सब जंजाल है। इसलिए चैतन्य महाप्रभु कहते हैं: "चेतो-दर्पण-मार्जनम्"—यह जो सब हम लोग भूल से सोचते हैं कि हम यह हैं, वह हैं, वह हैं, इसका नाम है वह गर्दा। वह मार्जित हो जाए, वह जब जितना जंजाल है, वह सब साफ़ हो जाएगा। उस समय आपकी अवस्था होगी:
"ब्रह्म-भूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति"

जब आप ब्रह्म-भूत हो जाएँगे, आप समझ जाएँगे "अहं ब्रह्मास्मि"—हम ब्रह्म वस्तु हैं, हम भौतिक वस्तु नहीं हैं, शरीर नहीं हैं। इसी को भगवान पहले ही समझाते हैं:
"देहिनोऽस्मिन यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तर-प्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति।।"

चित्त [गला साफ़ करने की आवाज़] दर्पण मार्जित नहीं होने के कारण अनेक जंजाल, अनेक भूल से हम लोग जीवन अतिवाहित करते हैं। और यह मनुष्य जीवन जो हमको मिला है, यह सब जंजाल हटाने के लिए है। बाकी हम जंजाल ज्यों का त्यों रख दिए और बड़ा सेठ बन गए, उसमें क्या लाभ होगा? जंजाल को साफ़ करो, जिसमें जीवन सफल होगा। और जंजाल रखकर थोड़े दिन के लिए, 20-50 वर्ष के लिए बड़ा सेठ बन गए, हाँ, या गरीब बन गए, वह एक ही बात है। कोई समझता है हम बहुत गरीब हैं, किस तरह से हमको धन मिले; और कोई समझता है जब इतना बड़ा सेठ बन गया, तभी हमारी आशा पूर्ण नहीं हुई। तो बात वही रही है। हाँ, सब समान ही है।

यह प्रह्लाद महाराज ने उनके पिता को बताया था। बेटा, तुम क्या चीज़ सीखे, हमको थोड़ा बताओ? तो प्रह्लाद महाराज ने बताया, पिताजी नहीं बोला, "असुर-वर्य" बोला:
"तत्साधु मन्येऽसुर-वर्य देहिनां
सदा समुद्विग्न-धियामसद-ग्रहात्।
हित्वात्म-पातं गृहमन्ध-कूपं
वनं गतो यद्धरिमाश्रयेत।।"

हाँ, पिताजी! आप तो असुरों के श्रेष्ठ हैं। "वर्य" means श्रेष्ठ, बहुत भारी असुर हैं। तो पिता को बोला: "तत्साधु मन्येऽसुर-वर्य देहिनां"—जो यह शरीर लिया है भौतिक शरीर, उसके लिए यही उचित है। क्या? "हित्वात्म-पातं गृहमन्ध-कूपं वनं गतो यद्धरिमाश्रयेत"—यह जो शरीर मिला है भौतिक शरीर, इसके लिए सब समय हमको चिंतित रहना पड़ता है। "तत्साधु मन्येऽसुर-वर्य देहिनां सदा समुद्विग्न-धियामसद-ग्रहात्"—यह जो असद् वस्तु शरीर में धारण किया है, इसके लिए सब समय समुद्विग्न रहना पड़ेगा। और यदि आप इस समुद्विग्नता से छुट्टी लेना चाहते हैं, तो "हित्वात्म-पातं गृहमन्ध-कूपं वनं गतो यद्धरिमाश्रयेत"।

इसलिए हमारी जो वैदिक सभ्यता है—वानप्रस्थ, वन में जाना। "पञ्चाशद् वनं व्रजेत्"—यह शास्त्र के निर्देश हैं। जहाँ 50 वर्ष हो गए, अब वन में जाइए। हाँ, तो वन में जाने का आजकल सामर्थ्य नहीं है, अभ्यास नहीं है, तो इसलिए कम से कम वृंदावन में आइए। हम लोगों का वृंदावन में एक भारी मंदिर बना है और रहने की जगह है। आप लोग जिनका 50 वर्ष से ऊर्ध्व हो गया है, सब आइए, उधर रहिए, भगवद्-चर्चा कीजिए और जीवन को सफल कीजिए। "वनं गतो यद्धरिमाश्रयेत"—खाली वन में जाने से नहीं होगा, वहाँ तो बंदर भी रहते हैं। बंदर नंगे रहते हैं, फल भी खाते हैं, बड़ा सात्विक जीवन है; पर एक-एक बंदर की दो-दो, तीन-तीन दर्जन पत्नियाँ होती हैं। वह वन नहीं चाहिए, उस प्रकार वन में जाने से कुछ फ़ायदा नहीं। वन में जाइए, हरि का आश्रय, भगवान का आश्रय ग्रहण कीजिए—यह शास्त्र का निर्देश है।

तो जहाँ तक हो, हम लोग सब सुविधाएँ देने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं। हाँ, सब आश्रम भी बना रहे हैं और मंदिर भी बना रहे हैं और रहने की जगह भी है। तो कम से कम "पञ्चाशद्"—यह जो सिद्धांत है कि हम कभी घर छोड़ेंगे नहीं, यह ठीक नहीं। तो फिर "सदा समुद्विग्न"—यह वैदिक सभ्यता नहीं है। वैदिक सभ्यता है वर्णाश्रम धर्म। यह असली धर्म है—चार वर्ण, चार आश्रम। हाँ, चार वर्ण—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—यह ज़रूर होना चाहिए, नहीं तो समाज शृंखलाहीन हो जाएगा। ब्राह्मण शम-दम आदि से युक्त होकर सबको सिखाएँगे, क्षत्रिय शासन करेंगे, और वैश्य अन्न उत्पादन करेंगे, अब शूद्र जो कुछ नहीं जानते, नौकरी करेंगे। बस, इसी प्रकार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास—ये सब नियमों का पालन करना चाहिए, तभी सुखी होंगे। और केवल सूअर, गधा जैसा परिश्रम करते रहो—"लाओ पैसा, लाओ रोटी"—यह कोई civilization नहीं है, इसी में दुनिया नाश हो गई।

तो इसलिए हम लोगों का आप लोगों से निवेदन है कि यह जो Krishna Consciousness movement (आंदोलन) है, इसको अच्छी तरह समझिए। यह कोई manufacture नहीं है कि हमारे मगज में कोई बुद्धि आई और लगा दिया। नहीं, यह regular है, scientific (वैज्ञानिक), शास्त्र-सम्मत है। इसको आप लोग अच्छी तरह से समझिए, इसको लीजिए और जिस तरह से आपका जीवन सफल हो सके, उसके लिए कार्य कीजिए। इतना ही आप लोगों से निवेदन है। और वह सब काम बड़ा सुंदर से हो जाएगा, यदि केवल आप:
"हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।"

यह नाम जपें। "चेतो-दर्पण-मार्जनम्" हो जाएगा, चित्त-दर्पण मार्जित हो जाएगा, ब्रह्म-भूतः प्रसन्नात्मा।
"चेतो-दर्पण-मार्जनं भव-महादावाग्नि-निर्वापणं
श्रेयः-कैरव-चन्द्रिका-वितरणं विद्या-वधू-जीवनम्।
आनन्दाम्बुधि-वर्धनं प्रति-पदं पूर्णामृतास्वादनं
सर्वात्म-स्नपनं परं विजयते श्रीकृष्ण-संकीर्तनम्।।"

यदि आप इस line में आएँगे... तो आप आनंद चाहते हैं। "आनन्दमयोऽभ्यासात्"—जीव मात्र ही आनंद चाहते हैं। भगवान भी आनंदमय हैं और भगवान के अंश स्वरूप जो जीव हैं, वे भी आनंद चाहते हैं। तो "सुखम् आत्यन्तिकं"—जो वास्तविक आनंद है, वह तो अतीन्द्रिय वस्तु है, यह भौतिक वस्तु नहीं है।
"रमन्ते योगिनोऽनन्ते सत्यानन्दे चिदात्मनि।
इति राम-पदेनासौ परं ब्रह्माभिधीयते।।"

यह शास्त्र में भगवान रामचंद्र के विषय में बताया है कि राम माने परम ब्रह्म, कृष्ण माने परम ब्रह्म। "परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्"। और भगवान राम और भगवान कृष्ण—हरे कृष्ण, हरे राम—इसमें कोई फ़र्क नहीं है। जब आप शुद्ध नाम कीर्तन करेंगे, तो समझ लीजिए कि भगवान रामचंद्र, ये बलराम, कोई भी राम... भगवान के एक परशुराम हुए, एक बलराम हुए और एक भगवान रामचंद्र हुए, सभी एक हैं। तो वही "नाम चिन्तामणिः कृष्णश्चैतन्य-रस-विग्रहः"—नाम को जप करने से, आप चाहे राम के भक्त हों या कृष्ण के भक्त हों, समझ लीजिए भगवान रामचंद्र और कृष्ण आपकी जिह्वा में आकर नाच रहे हैं। इस भावना से यदि आप नाम कीर्तन कीजिए, तो आपका जीवन सफल होगा। "विद्या-वधू-जीवनम् आनन्दाम्बुधि-वर्धनं प्रति-पदं पूर्णामृतास्वादनं"—यह चैतन्य महाप्रभु का आशीर्वाद है, यह उन्होंने बताया है।

तो आप लोग जिस अवस्था में रहिए, और इसके लिए कोई पैसा खर्च नहीं है, एकदम देख लीजिए। हरे नाम करने से क्या फ़ायदा? "कीर्तनीयः सदा हरिः"। हाँ, यह भी चैतन्य महाप्रभु बताते हैं। अगर नाम जप कर रहे हैं, तो कोई बोलेगा यह पागल है, देखो तो business में अपना बैठा है और नाम जप कर रहा है; कोई बोलेगा यह जुआचोर है, एक ढोंग लगाया है। यह सब सहना पड़ेगा। भगवद्-भक्त होने के लिए बहुत सहन करना पड़ता है। जैसे प्रह्लाद महाराज; अपना पिताजी ही शत्रु हो गया—"मारो इस बेटे को, यह भगवान का नाम करता है, हमारी बात नहीं सुनता।" यह सब शत्रु बन जाएँ, तो यह सब होते हुए भी:
"तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना।
अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः।।"

यह सब सहन करके भगवान का नाम जपा कीजिए, जीवन आपका सफल हो जाएगा।

Thank you very much.
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥